डियर जिंदगी : अपने स्‍वभाव की ओर लौटिए...

'बैंक' बैलेंस जिंदगी के लिए बहुत जरूरी साधनों में से एक है, लेकिन वह अंतिम और सबकुछ नहीं है. 'धन' जहां आकर हार जाता है, प्रेम वहीं से अपनी यात्रा पर निकल जाता है.

दयाशंकर मिश्र | Updated: Sep 25, 2017, 02:19 PM IST
डियर जिंदगी :  अपने स्‍वभाव की ओर लौटिए...
जब कोई हमें हमारे स्‍वभाव में आने वाले बदलाव के बारे में कुछ बताने की कोशिश करता है, अक्‍सर हम उसकी बातों को महत्‍व नहीं देते.

तुम कैसे थे! कैसे हो गए! तुम कितने बदल गए! वह तुम तो नहीं हो, जिसकी तलाश में मैं थी/था. यह बातें ताउम्र सबसे ज्‍यादा कही/सुनी जाने वाली बातों में से एक हैं. पति-पत्‍नी, दोस्‍तों, प्रेमी-प्रेमिका के बीच इस तरह के संवाद सामान्‍य हैं. पहले यह शिकायतें कुछ बहसों तक सिमट जाती थीं लेकिन अब यह प्रसंग कड़वाहट की ओर बढ़ रहा है.

रिश्‍तों की चौखट पर तनाव की दस्‍तक हो रही है. मन के भीतर उठे सवाल भीतर ही भीतर कुंठा में बदल गए हैं. हम बाहरी चीजों की तलाश में भीतर का सौंदर्य खो बैठे हैं. कामयाबी के लिए संघर्ष के रास्‍तों का हमसफर होते हुए भी निजी जिंदगी में अपनी कोमल भावनाओं का संरक्षण भी उतना ही जरूरी काम है.

हम क्‍या होना चाहते हैं और हो क्‍या जाते हैं.

'बैंक' बैलेंस जिंदगी के लिए बहुत जरूरी साधनों में से एक है, लेकिन वह अंतिम और सबकुछ नहीं है. 'धन' जहां आकर हार जाता है, प्रेम वहीं से अपनी यात्रा पर निकल जाता है. प्रेम कभी दिवालिया नहीं होता. वह कभी कम नहीं पड़ता. घटना उसका स्‍वभाव नहीं है. उसका स्‍वभाव केवल उदारता और अनंत है. प्रेम के बदले में केवल प्रेम दिया जा सकता है.

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हम ही हैं, जो प्रेम में अपेक्षा का घोल मिलाकर उसका गाढ़ा रंग फीका कर देते हैं. उसके बाद दूसरों के स्‍वभाव के रूखेपन और प्रेम की कमी पर चिंतन में जुट जाते हैं. प्रेम सबसे पहले अगर कहीं कम होता है, तो वह हमारे अपने भीतर होता है. हम बाहरी दुनिया की व्‍यस्‍तता में कुछ ज्‍यादा ही घुलमिल जाते हैं. वही दुनिया हमें प्रिय लगने लगती है.

जैसे ही कोई हमें हमारे स्‍वभाव में आने वाले बदलाव के बारे में कुछ बताने की कोशिश करता है, अक्‍सर हम उसकी बातों को महत्‍व नहीं देते. उल्‍टे हमें लगता है कि वह हमें ठीक से समझ नहीं पा रहा. हमारी व्‍यस्‍तता को ठीक से पढ़ नहीं पा रहा. हमारी तरक्‍की को वह कम आंकने की कोशिश कर रहा है. हमारे सपनों के पंखों को मजबूत करने की जगह वह हमें डरा रहा है. इस तरह के विचार मन को अक्‍सर घेर लेते हैं. हम सुलझने की जगह मनोविकार की गली में उलझने लगते हैं. हम प्रसन्‍नता, प्रेम और एक-दूसरे के साथ बिताए जाने वाले समय को मिथ्‍या मान लेते हैं.

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हमारे एक मित्र हैं. जो अक्‍सर घर से भागने का मौका तलाशते हैं. अपने बच्‍चों के साथ कुछ पल बिताने, पत्‍नी के साथ संवाद की जगह वह चैटिंग, दोस्‍तों के साथ गपशप को प्राथमिकता देते हैं. इसे उन्‍होंने बड़ी खूबसूरती से परिवार के लिए 'बेहतर जीवन का प्रबंध' नाम दे दिया है. परिवार को समझा दिया कि उनके लिए कड़े परिश्रम का ही एक रूप उन लोगों के साथ समय बिताना है, जो उनकी मदद कर रहे हैं. परिवार ने इसे समझ लिया है, स्‍वीकार कर लिया है. क्‍योंकि उसे भी सुविधाएं मिल रही हैं. उनके सुखों की 'सप्‍लाई' हो रही है. लेकिन क्‍या यह प्रेम का मार्ग है! इससे तो संबंध में स्‍नेह शून्‍य हो जाएगा. रिश्‍तों में निस्‍वार्थ की जगह एक बार शर्त शामिल हो गई तो उसे लौटाना संभव नहीं.
 
इसलिए, अगली बार अगर आपसे कोई यह कहने का साहस करे कि तुम बदल गए हो. तुम्‍हारे भीतर कुछ ऐसा घट गया है, जो तुम्‍हारे स्‍वभाव से मेल नहीं खाता. तो इन बातों को टालें नहीं, उसकी 'नजर' में कमी की जगह उसे नजरिए को बस प्रेम के कोण से समझने की कोशिश करें. इस भागती-दौड़ती दुनिया में कोई तो है, जो आपसे इस कदर प्रेम करता है कि आपकी भावनाओं की कद्र कर रहा है. आपको प्रेमी, कोमल बनाए रखने में मददगार होना चाहता है. ऐसे लोग दुनिया में कम होते जा रहे हैं, इसलिए जहां मिलें, उनके साथ स्‍नेह से पेश आएं. ऐसे रिश्‍तों को सहेजें, यह जीवन की धूप में आपकी छांव बनेंगे.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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