डियर जिंदगी : हम खुद को कितना जानते हैं...

हमारा मूल क्‍या है, मेरी सबसे बड़ी खूबी क्‍या है, यह समझना बहुत ही मुश्किल है. लाखों में से कोई एक जिंदगी की अलसभोर में अपनी राहों को पहचान पाता है.

दयाशंकर मिश्र | अंतिम अपडेट: Sep 15, 2017, 07:38 AM IST
डियर जिंदगी : हम खुद को कितना जानते हैं...

हम खुद को कितना जानते हैं. उसके हिसाब से अपने लिए रास्‍ते चुनते हैं. अपनी मंजिलों की ओर रुख करते हैं. हमारा मूल क्‍या है, मेरी सबसे बड़ी खूबी क्‍या है, यह समझना बहुत ही मुश्किल है. लाखों में से कोई एक जिंदगी की अलसभोर में अपनी राहों को पहचान पाता है.

आपको एक पुरानी कहानी सुनाता हूं. जो लेखक, पत्रकार और भाषा, सरोकार के सारथी राकेश दीवान ने एक बार सुनाई थी. इसलिए इसका कॉपीराइट उनका ही बनता है.

नदी किनारे एक गांव था. गांव जंगल से सटा था. इसलिए हाथी भी खूब थे. हाथी हर दिन सपरिवार नदी नहाने आते. खूब मौज करते. इसी गांव में एक पहलवान का घर था. घर में पहलवान की पत्‍नी और उनका इकलौता बेटा रहता था. पहलवान कई बरस पहले एक दुर्घटना में गुजर गए थे.

मां और बेटे के पास जीवन आराम से गुजारने के सारे साधन थे. कोई चिंता की बात नहीं थी. बच्‍चा एकदम पहलवान साहब पर गया था. चुस्‍त दुरुस्‍त और दिमाग से भी तेज़. घर में दूध-दही पर्याप्‍त था. पास में स्‍कूल था. बच्‍चा सुबह-सुबह उठ जाता. नदी किनारे सैर करता. धीरे-धीरे हाथियों से उसकी दोस्‍ती हो गई. हाथियों के बच्‍चों के साथ उसकी खूब पटने लगी. वह उसे हवा में उछालते रहते, जमीन पर पटकते, खूब दौड़ाते. कई बार अपने साथ जंगल की सैर भी करा लाते. इस तरह वह जंगल से भी परिचित हो गया. कई जड़ी-बूटियों का जानकार हो गया.

सुबह की इस धमाचौकड़ी के बाद वह दोपहर पढ़ने जाता. और शाम को फि‍र वह कहानी दोहराई जाती. बच्‍चे और उसकी मां की जिंदगी आराम से गुजरती रही. इसी तरह दस बरस बीत गए.

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बच्‍चा अब युवा होने की ओर बढ़ रहा था. हाथियों के साथ सत्‍संग और साफ हवा, शिक्षा ने उसे एकदम बहादुर, निडर बना दिया. लेकिन उसकी दिनचर्या कभी न टूटती. अब तो वह इतना शक्तिशाली हो गया कि कई बार हाथियों को पूछ पकड़कर पटक देता. उनके बच्‍चों को हवा में उछाल देता. हाथी उसके साथी, शिक्षक बन गए थे.

अब यह बच्‍चा 'बल' की नई कहानी लिख रहा था. जिंदगी एकदम तनावमुक्‍त थी. तभी एक दिन नदी किनारे जल विहार के लिए रुके राजा की बच्‍चे पर नजर पड़ गई. वह उसका कौशल देखकर डर गया. वहकम डरा. उससे अधिक उसका सेनापति डर गया. उसे लगा कि यह तो किसी भी दिन मेरी जगह ले सकता है. उसने राजा को कुछ सलाह दी. जिसका परिणाम यह हुआ.

बच्‍चे को राजा ने बुलाया. उसके साहस की सराहना करते हुए कहा कि वह कल ही राजमहल पहुंचे. यहां उसकी प्रतिभा का उपयोग नहीं हो पा रहा है, इसलिए उसे राजधानी आकर राज्‍य के लिए सेवाएं देनी चाहिए.

जैसे ही वह घर पहुंचा. मां को तब तक गांव से इसकी खबर मिल चुकी थी. मां सेनापति और राजा दोनों से परिचित थी. वह समझ गई कि उसके बच्‍चे की जिंदगी से आजादी छूमंतर होने वाली है. उसने बच्‍चे को समझाने की कोशिश की. लेकिन उस पर राजा का 'ऑफर' सवार हो चुका था. कुछ दिनों बाद वह राजधानी पहुंच गया.

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वहां उसके लिए भव्‍य महल तैयार था. जिसमें खूब सारे नौकर-चाकर थे. स्‍वादिष्‍ट व्‍यंजन के लिए खास हलवाई थे. उसे ऐसे काम दिए गए थे कि वह 'फाइलों' में दिनभर उलझा रहे. उसके जीवन से नदी, हाथी, साफ हवा, वर्जिश सब गायब कर दिए गए. कुछ ही बरस बाद वह एक थुलथुला अधेड़ था. जिसका पेट इतना विशाल हो गया था कि उस पर चाय की प्‍याली रखी जा सकती थी.

उसे उठने के लिए एक सहायक की जरूरत होती. वह फाइलों में इतना डूबा रहता कि शायद ही कभी नदी, मैदान की ओर जा पाता. मां उसके सपने में आती, उसे समझाती कि बेटा यहां से चला जा, जिससे तेरी जिंदगी सलामत रहे. लेकिन सपना टूटते ही वह राजकाज में डूब जाता. क्‍योंकि उसे बेहतर भविष्‍य की चिंता थी. मां बोल नहीं सकती थी, कुछ कह नहीं सकती थी, वह जहां चली गई थी, वहां से कोई बोलकर कुछ नहीं कह सकता. बस सपने में आ सकता है.
कथा समाप्‍त.

जैसे ही हम अपने सूत्र दूसरे को सौंपते हैं, वह अपने ढंग से हमें संचालित करने लगता है. इससे शायद हमारी जिंदगी कुछ बेहतर हो, लेकिन अंतिम लक्ष्‍य केवल सूत्रधार जानता है. इसलिए अपने निर्णय खुद करें, दूसरे को न करने दें.

इस कहानी में बच्‍चे की जगह खुद को रखें. उसके बाद राजा, सेनापति और फाइलों की जगह कहां कंपनी, प्रबंधन और जिंदगी को रखना है, यह आप खुद तय करें.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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