Tandav Review: Dimple Kapadia हैं असली 'हीरो', Saif Ali Khan हैं थोड़े फीके

Tandav Review: सैफ अली खान की वेब सीरीज 'तांडव' (Tandav) रिलीज हो गई है. आप भी इसे देख सकते हैं, वैसे इसे देखने से पहले ये जरूर जान लें कि ये सीरीज कैसी है. 

Tandav Review: Dimple Kapadia हैं असली 'हीरो', Saif Ali Khan हैं थोड़े फीके
तांडव पोस्टर, सौ. इंस्टाग्राम

स्टार रेटिंग: 3
निर्देशक: अली अब्बास जफर
कलाकार: सैफ अली खान, डिंपल कपाड़िया, मोहम्मद जीशान अयूब, सुनील ग्रोवर, सारा जेन डायज, कृतिका कामरा, तिग्मांशु धूलिया

'तांडव' (Tandav), जैसे फिल्म का नाम प्रभावशाली है, वैसा ही सीरीज में अभिनय भी, लेकिन नाम के विपरीत कहानी धीमी है. ये वेब सीरीज एक राजनीतिक ड्रामा है. सीरीज में पूरी तरह से ये दिखाया गया है कि कैसे राजनीतिक समीकरण समय-समय पर बदलता है. राजनीति में धोखा और फरेब हर मोड़ पर कैसे होता है, ये इस कहानी में मुख्य तौर पर दिखाया गया है. नेताओं का कुर्सी के लिए प्यार और फिर कुर्सी के लिए चाल चलने का खेल इस फिल्म में बखूबी दिखाया गया है. सीरीज देख ये साफ होता है कि कुर्सी का ये खेल सही या गलत नहीं होता है, ये राजनीति है और ये ऐसे ही सत्ता और ताकत के लिए होती है. 

अब बताते हैं कि कहानी कैसे शुरू होती है. सीरीज (Tandav) के शुरू होते ही स्क्रीन पर लिखा दिखाई देता है, 'भाई हम तो धोखा खा गए...' कहानी जैसे ही शुरू होती है देश में दक्षिणपंथी पार्टी जन लोक दल (जेएलडी) (JLD) का राज दिखाया जाता है. जन लोक दल तीसरी बार आम चुनाव जीतने वाली है और इस बार भी ये लगभग तय है कि देवकी नंदन (तिग्मांशु धूलिया) (Tigmanshu Dhulia) प्रधानमंत्री बनेंगे, लेकिन चुनाव के नतीजे आने से ठीक पहले देवकी नंदन की मौत की खबर आती है. ऐसे में अब प्रधानमंत्री पद का दावेदार देवकी नंदन का बेटा समर प्रताप सिंह (सैफ अली खान) (Saif Ali Khan) है. मगर कहते हैं कि राजनीति में ऊंट किस करवट बैठेगा ये किसी को नहीं पता. राजनीतिक समीकरण ऐसे बदलता है कि तीस साल से देवकी नंदन की 'खास' रहीं अनुराधा किशोर (डिंपल कपाड़िया) (Dimpla Kapadia) पीएम बन जाती हैं.

कहनी यहीं से पलट जाती है. कैसे राजनीतिक खेल चलता है, इसी के इर्द-गिर्द सीरीज खूमती है. इसके साथ ही सीरीज में देश की स्थिति को दिखाने का प्रयास किया गया है. सीरीज में देश के दो पहलुओं को दिखाया गया है. पहला पहलू, जहां शाइनिंग इंडिया यानी नेता और उद्योगपतियों की साठ-गांठ को दिखाया गया है. वहीं दूसरी तरफ वो देश है, जहां आम जनता, किसान और मजदूर जूझ रहे हैं. 

इसके साथ ही सीरीज (Tandav) में छात्र राजनीति पर जोर दिया गया है. दिखाया गया है कि यूनिवर्सिटी की गलियों में लोग कैसे अपनी आवाज बुलंद करते हैं और उसकी गूंज देशभर में पहुंचती है. फिल्म में देश की हालिया राजनीति को दिखाया गया है, जहां आप फिल्म में एक पुलिस अधिकारी को कहते सुनेंगे, 'अब टेररिस्ट बॉर्डर पार से न आ रहे. ये इन यूनिवर्सिटीज में तैयार हो रहे हैं.' इस छात्र राजनीति में शिव शेखर (मोहम्मद जीशान अयूब) (Mohammed Zeeshan Ayyub) का सिक्का चमकता दिखाया गया है, जिससे लोग काफी उम्मीदें बांध बैठते हैं. 

ये तो बात हो गई कि कहानी किस तरह की है. अब आते हैं कि इस सीरीज में क्या खामियां हैं. 'तांडव' राजनीति की उथल-पुथल तक ही सीमित रही, ज्यादा गहराई में कहानी नहीं जाती है. देश का आम आदमी भी सीरीज में दिखाई गई राजनीति पहले से ही समझता है. शुरुआती भाग सीरीज का काफी स्लो है. पांच-छह एपिसोड के बाद सीरीज में रोमांच आता है. इसलिए इसे देखने के लिए लोगों में काफी धैर्य चाहिए, लेकिन जब एक बार कहानी फ्लो पकड़ती है तो आप नजर नहीं हटा पाएंगे क्योंकि कहानी भले ही थोड़ी सुस्त हो, लेकिन अभिनय अच्छा है. कुछ-कुछ घटनाएं ऐसी हैं, जिसे आप असली घटनाओं से रिलेट कर पाएंगे. 

सीरीज (Tandav) में मुस्लिम नागरिकों को सत्ता का सॉफ्ट टार्गेट दिखाया गया है. वहीं छात्र राजनीति का एंगल कहीं पटरी पर चल रहा है तो कहीं पटरी से उतरता लगता है. वहीं किसान आंदोलन भी कहानी में दिखाया गया है. एक कमी ये जरूर है कि सभी घटनाएं एक-दूसरे से बिल्कुल जुदा हैं और एक दर्शक के लिए सभी को रिलेट करके देखना संभव नहीं है, क्योंकि असल में ये चीजें अलग-अलग टाइम फ्रेम में हुई हैं. कुछ किरदार और घटनाएं डॉक्युमेंट्री के अंदाज में दिखाए गए हैं. ये महज संयोग है कि आपको कुछ चीजें सत्य घटनाओं से प्रेरित लगेंगी, लेकिन कहानी पूरी तरह से फिक्शनल है.

सभी कलाकरों में सबसे ज्यादा प्रभावी डिंपल कपाड़िया (Dimple Kapadia) हैं. उनके किरदार से आप जुड़ाव महसूस करेंगे और नजरें नहीं हटा पाएंगे. वहीं सैफ अली खान (Saif Ali Khan) का काम भी अच्छा है. उन्हें मेल लीड होने का काफी फायदा मिला है, लेकिन वो एक तानाशाह के रूप में नहीं जम रहे हैं, लेकिन सीरीज के आखिरी हिस्सों में उनका किरदार निखर के सामने आता है और वे किंग मेकर की भूमिका निभाते नजर आते हैं. सुनील ग्रोवर (Sunil Grover) का किरदार भले ही बहुत बड़ा नहीं, लेकिन उनका काम शानदार है. बाकी कलाकारों का काम भी काफी अच्छा है. इसके साथ ही सीरीज में बैकग्राउंड में पटौदी पैलेस की झलक दिख रही है. कैमरावर्क और किरदारों के आउटफिट काफी अच्छे हैं. 

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