आंदोलन वाले भ्रम का भंडाफोड़, भारतीय किसान यूनियन के अध्‍यक्ष नरेश टिकैत पर बड़ा खुलासा

किसान आंदोलन (Farmers Protest) के नाम पर भ्रम फैलाने वाले राकेश टिकैत (Rakesh Tikait) के भाई व भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत (Naresh Tikait) पर बड़ा खुलासा हुआ है. जो नरेश टिकैत किसानों को जमीन छिन जाने का डर दिखा रहे हैं वो अपनी जमीन मुनाफे के लिए लीज पर देने को तैयार हैं.

आंदोलन वाले भ्रम का भंडाफोड़, भारतीय किसान यूनियन के अध्‍यक्ष नरेश टिकैत पर बड़ा खुलासा
ऑपरेशन टिकैत.

नई दिल्ली: आज (सोमवार) किसान संगठनों ने कृषि कानूनों (Farm Laws) के खिलाफ बंद बुलाया था. सड़क से रेल की पटरियों तक किसान संगठनों के नेता और कार्यकर्ताओं ने धरना दिया. किसान आंदोलन का नारा देकर देश को ठप करने की कोशिश की गई. ये सब हुआ देश के अन्नदाता के नाम पर और ये पहली बार नहीं हुआ है. नवंबर 2020 से लगातार यानी 10 महीने से किसान आंदोलन चल रहा है. दिल्ली बॉर्डर को किसान संगठनों ने घेर रखा है लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिन किसान नेताओं के भरोसे भोले भाले किसान धूप, सर्दी और बारिश में सड़कों पर खड़े होकर आंदोलन करते हैं, उन नेताओं का असली चरित्र और चेहरा क्या है? ऑपरेशन टिकैत में अन्नदाताओं के साथ छल करने वाले किसान नेताओं का असली चेहरा देश के सामने उजागर हो गया है.

 राजधानी की सीमाएं 10  महीने से बंद 

आजादी के 75 साल में पहली बार देश की राजधानी की सीमाएं 10  महीने से बंद हैं. दिल्ली के बॉर्डर किसान आंदोलन के नाम पर बंधक हैं. सैकड़ों फैक्ट्रियां, दुकान और दूसरे कारोबार बंद पड़े हैं. हजारों लोगों के घरों में चूल्हे नहीं जले लेकिन आंदोलनजीवियों ने बुझे चूल्हों की राख से भी किसानों को उकसाने की चिंगारी ढूंढ़ निकाली. किसानों की रहनुमाई का दावा करने वाले लोगों ने नेशनल हाईवे पर हठ के खूंटे गाड़ कर विरोध के तंबू लगा दिए. रेल की पटरियों को आंदोलन का अखाड़ा बना दिया. फिर 26 जनवरी को किसानों की दुहाई देने वालों ने दिल्ली में उपद्रव किया. लाल किले पर चढ़कर गणतंत्र का अपमान किया. और ये सब हुआ केंद्र सरकार के नए कृषि कानूनों के विरोध के नाम पर, जिन्हें किसान विरोधी बता कर पूरे देश में आंदोलन खड़ा करने की कोशिश की गई. अन्नदाताओं को सरकार के खिलाफ एकजुट करने की मुहिम चलाई गई. किसान आंदोलन के नाम पर देश को बदनाम करने की कोशिश तक की गई.

ये हैं अघोषित ब्रांड एम्बैसेडर 

राकेश टिकैत इस आंदोलन का बड़ा चेहरा हैं. राकेश टिकैत भारतीय किसान यूनियन यानी बीकेयू के प्रवक्ता हैं. राकेश टिकैत को आप किसान आंदोलन का अघोषित ब्रांड एम्बैसेडर कह सकते हैं, वो कृषि कानून वापस लेने के लिए सरकार को बेधड़क चेतावनी देते हैं. भारतीय किसान यूनियन किसान आंदोलन की अगुवाई करने वाले संगठनों में प्रमुख है. टिकैत परिवार इस संगठन का सर्वेसर्वा है. राकेश टिकैत के बड़े भाई नरेश टिकैत भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष हैं. नरेश टिकैत भी सरकार को कृषि कानून खत्म करने का अल्टीमेटम देते रहे हैं. नरेश टिकैत की अगुवाई में भारतीय किसान यूनियन ने पांच सितंबर को मुजफ्फरनगर में कृषि कानूनों के खिलाफ बड़ी महापंचायत की. 

खुल गया किसान आंदोलन के नाम भ्रम और सत्य का भेद

राकेश टिकैत और नरेश टिकैत जैसे नेताओं का दावा है कि नए कृषि कानूनों से किसान बर्बाद हो जाएंगे और वो देश के अन्नदाताओं को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन क्या वाकई ऐसा है. सवाल उठता है कि किसानों के हितों का दम भरने वाले और कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले टिकैत बंधु अपने विचारों को लेकर कितने ईमानदार हैं, कितने प्रतिबद्ध हैं. क्या जो उनकी जुबान पर है वो उनके दिल में भी है. स्टिंग ऑपरेशन में इन सभी सवालों के जवाब सामने आ गए. किसान आंदोलन के नाम पर चल रहे भ्रम और सत्य का भेद खुलकर सामने आ गया. 

MSP पर प्रोटेस्ट दिखावा?

जी न्यूज की अंडरकवर टीम टिकैत परिवार के पैतृक गांव मुजफ्फरनगर के सिसौली पहुंची. राकेश टिकैत वहां नहीं मिले. यहां उनके बड़े भाई और भारतीय किसान यूनियन के प्रमुख नरेश टिकैत से मौजूद थे. नरेश टिकैत ने खुफिया कैमरे के सामने जो कहा, वो चौंकाने वाला था. जो टिकैत बंधु न्यूनतम समर्थन मूल्य के नाम पर कृषि कानून का विरोध कर रहे हैं. किसानों को एमएसपी खत्म होने का डर दिखा कर सरकार के खिलाफ लामबंद कर रहे हैं वे ही नरेश टिकैत अपने इलाके के किसानों का गन्ना सरकार द्वारा तय न्यूनतम कीमत से कम पर दिलवाने का ऑफर दे रहे थे.

ये है कथनी और करनी में फर्क

नरेश टिकैत गन्ने को कम दाम पर ही प्राइवेट कंपनी को बेचने के लिए राजी होते हुए कहते हैं, 'अजी, बढ़िया है यहां तो...यहां तो इतना गन्ना है...और गन्ना बहुत ही ठीक रेट में मिल जाएगा...इतना गन्ना है...मिल इतना गन्ना नहीं ले पाता...इतना गन्ना नहीं ले पाता मिल...बढ़िया है, अच्छा गन्ना लो...पेमेंट नगद करो...मिल से भी कम रेट में मिल जाएगा....जो मिल का रेट है, जो मिल का 325 रु. (प्रति क्विंटल) का रेट है...वो तो उसकी बात है...तो कोल्हू का रेट 225 रु. मिल जाए, 250रु. मिल जाए...275रु. मिल जाए... ऐसी कोई बात नहीं.'

किसानों को डरा रहे और खुद जमीन लीज पर देने को तैयार 

आंदोलन के नाम पर किसानों को जमीन छिन जाने का डर दिखाने वाले नरेश टिकैत फायदे के लिए खुद की जमीन लीज पर देने के लिए तैयार हो गए.

रिपोर्टर- सर, लीज मिनिमम (कम से कम) कितने साल का होगा?
नरेश टिकैत- लीज में थोड़ा सा ये हो जाता है कि आदमी डर रहे हैं. लोग डर रहे हैं कि उनकी जमीन चली जाएगी.
रिपोर्टर- अरे वो तो आप भी जानते हैं कि जमीन नहीं जाएगी.
रिपोर्टर- नहीं तो फिर उसका कुछ रास्ता निकालिए. क्योंकि इनका ये कहना है कि अगर डेढ़ करोड़ की फैक्ट्री डालें. 1.10 करोड़ रु. या 1.15 करोड़ रु. जो भी लगे....मान लीजिए 2 साल बाद बोले कि मेरा (जमीन) खाली करो...क्योंकि जो हम लागत लगाएंगे, उससे 4 साल लगेगा प्रॉफिट कमाने में.
नरेश टिकैत- अच्छा
रिपोर्टर- मार्केटिंग है उसकी, तामझाम है उसका
नरेश टिकैत- चलो, घर चलकर गौरव से करना बात...हमारे पास ही है जमीन. बेलूर गांव में है.

किसानों को डराने की मुहिम की असलियत उजागर

इस बीतचीत से साफ है, भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत अपनी जमीन एक ऐसे व्यक्ति को लीज पर देने के लिए तैयार हैं, जिसे वो उद्योगपति समझ रहे हैं. बस उन्हें मनचाही कीमत चाहिए. टिकैत बंधु किसान आंदोलन के मंच से कहते हैं कि नए कृषि कानूनों के तहत बड़े कारोबारी और उद्योगपति किसानों की जमीन हड़प लेंगे. हालांकि नए कृषि कानूनों में एक भी लाइन ऐसी नहीं है, जो किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करती हो फिर भी टिकैत जैसे किसान नेता भोले भाले किसानों को डराने की मुहिम में जुटे हैं. लेकिन खुद नरेश टिकैत अपनी जमीन एक उद्योगपति को देने के लिए फटाफट राजी हो गए. 

कैसे हुआ खुलासा?

असल में सिसौली पहुंचकर ज़ी न्यूज़ के दो अंडरकवर रिपोर्टर्स ने नरेश टिकैत से मुलाकात की. नरेश टिकैत के साथ उनका एक सहयोगी भी था. जी न्यूज़ के अंडरकवर रिपोर्टर्स ने नरेश टिकैत से अपना परिचय  उद्योगपतियों के रूप में दिया, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुड़ की फैक्ट्री लगाना चाहते हैं. बातचीत कुछ ऐसे शुरू हुई-

नरेश टिकैत- चलो तुम बताओ अपना अब..
रिपोर्टर- ऐसा है ये जो हैं ना, ये जा रहे हैं सहारनपुर, ये बात किए हुए थे. संयोग से साथ में आए. किस्मत वाली बात है. मैंने कहा कि मैं जा रहा हूं, चलिए आपको उनसे मिलवाता हूं. आपका नाम सुनकर खुशी के मारे पागल हो गए. इनकी कहानी ये है कि इनका ढाई-तीन करोड़ का बजट है. ये गुड़ की फैक्ट्री डालना चाह रहे हैं. कोल्हू नहीं, फैक्ट्री डालेंगे. इसके लिए इनकी सिंगापुर की कंपनी से बात हुई है तो करीब एक से डेढ़ करोड़ बजट लगेगा फैक्ट्री डालने का. इनको एक से डेढ़ एकड़ जमीन चाहिए.

नरेश टिकैत- एकड़?
रिपोर्टर- हां, एक से डेढ़ एकड़
नरेश टिकैत- ठीक
रिपोर्टर- उसमें ये पूरी फैक्ट्री बिठाएंगे. उतनी जमीन तो खरीद नहीं सकते. इसीलिए ये सहारनपुर जा रहे हैं, जिससे इनकी बातचीत हुई है, वहां पर कोई बड़ा प्रॉपर्टी डीलर है. उसने कहा है जमीन दिलवाएगा. तो ये गुड़ बनाएंगे. इस पूरे इलाके में कोल्हू तो है, गन्ना भी है. सब यहीं है. पूरे देश को सप्लाई यहीं से जा रही है. पर व्यवस्थित सिस्टम नहीं है तो इनकी प्लानिंग ये है कि हम गुड़ बनाएंगे...उसको ढंग से पैक करेंगे और उसे सप्लाई करेंगे. यही इनकी प्लानिंग है...तो इनका ढाई से तीन करोड़ का बजट है...एक फैक्ट्री डालना है 20-25 लोगों को उस में रोजगार देना है.
नरेश टिकैत- अच्छा
रिपोर्टर - ये इनकी प्लानिंग है.

 

 

मौका पड़ने पर तुरंत बदल लिया रंग

कृषि कानूनों को लेकर सरकार पर हमला बोलने वाले, महापंचायत बुलाकर सरकार को चुनौती देने वाले नरेश टिकैत के साथ ज़ी न्यूज़ के अंडरकवर रिपोर्टर्स की बातचीत खुफिया कैमरे में रिकॉर्ड हो रही थी. हम ये जानना चाहते थे कि टिकैत जैसे किसान नेता आंदोलन के मंच से जो बड़े बड़ी बातें करते हैं. कृषि कानून को लेकर जिस तरह के दावे करते हैं, क्या वो खुद उसे लेकर ईमानदार हैं, या मौका पड़ने पर वो रंग बदल लेते हैं. रिपोर्टर ने नरेश टिकैत से कहा कि गुड़ की ऑटोमेटिक फैक्ट्री लगाने के लिए सिंगापुर की एक कंपनी के साथ हमारा करार है. इतना सुनते ही नरेश टिकैत ने इस प्रोजेक्ट में दिलचस्पी दिखानी शुरू कर दी.

नरेश टिकैत- बढ़िया... बहुत बढ़िया और जो बनी बनाई मिल जाए तो?
रिपोर्टर- नहीं, सिंगापुर की कंपनी से जो बात हुई है वो अपना पूरा सेटअप लाकर लगाएगा ना सर. पूरा अलग सेटअप लगेगा. फैक्ट्री लगेगी पूरी वो.. सब काम मशीन से होगा, हाथ से कुछ नहीं.
नरेश टिकैत का सहयोगी - कितने बीघा जमीन की बात कह रहे हैं?
रिपोर्टर- एक-डेढ़ एकड़. जैसे हमारे यहां एक एकड़ होता है साढ़े तीन-चार बीघे का यहां कितने का होता है?
नरेश टिकैत - हां, यहां भी वही है. साढ़े पांच बीघे का एकड़ है.
रिपोर्टर - सॉरी, हमने इनको बता दिया था कि 12 बीघे का एकड़ होता है यहां.
रिपोर्टर 2- दो एकड़ काफी है.
नरेश टिकैत- 10 बीघा
रिपोर्टर 2-  हां, ये है कहानी.
नरेश टिकैत- तो जमीन का भी एग्रीमेंट होगा.
रिपोर्टर- तो इनको मैंने ये कहा है कि आप इतनी दूर क्यों जा रहे हैं सहारनपुर... यहां लगाओ, गन्ना बेल्ट तो ये है.
नरेश टिकैत- बहुत बढ़िया.. ठीक है.
रिपोर्टर- इसीलिए सोचा आप से मिलवा दूं एक बार. अगर लगता है ठीक है, अगर आपका आशीर्वाद हुआ तो कर लेंगे.
नरेश टिकैत- नहीं आशीर्वाद, कोई वो नहीं है... जो तय हो जाएगी.. जो जमीन की तय हो जाएगी कि भाई, इतना किराया दिया जाएगा..
रिपोर्टर- किराया तय हो जाए. पांच-पांच साल का लीज हो जाए.
नरेश टिकैत- ठीक है.

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 रिपोर्टर - तो मान लीजिए 2 एकड़ जमीन लेते हैं. तो कितना बजट आ जाएगा सर उसका लीज अगर करें?
 नरेश टिकैत- नहीं, यहां तो (अपने सहयोगी से) मास्टर जी... यहां तो कम से कम दस हजार रु/बीघा मान कर चलो एक साल का. कम से कम है 10 हजार रुपये बीघा. नहीं, जो ठेके पर यहां (जमीन) देते हैं आदमी.. .नहीं, मैं कह रहा हूं, जो लोग ठेके पर देते हैं.
 रिपोर्टर - मतलब कि अगर दस हजार रुपए बीघा हुआ तो 12 बीघा लेते हैं तो साल का एक लाख बीस हजार रु?
 नरेश टिकैत- हां.
 रिपोर्टर - मतलब कि एक लाख बीस हजार रु. एक साल का रेंट हो गया.
 नरेश टिकैत का सहयोगी- हां, 1 साल का.
 रिपोर्टर - उसमें ये है कि इनका जो फैक्ट्री का सेटअप लग रहा है 1.10 (करोड़ रु.) या 1.20 (करोड़ रु.)...कितना बताया था?
 रिपोर्टर - 1.10 करोड़ (रु.) के आस-पास मान लीजिए
 रिपोर्टर - एक करोड़ दस पंद्रह लाख रु. फैक्ट्री के सेटअप में लगेगा. मान लीजिए हम लगाएं सहारनपुर में... इसीलिए डर रहे हैं ये.. लगाएं मान लो अगला बोले कि भाई, खाली करो.
 नरेश टिकैत - नहीं, ऐसी कुछ बात नहीं है. जो तय हो जाता है... तो ठीक है... महंगाई के हिसाब से साल भर में बढ़ता रहे... जो जमीन का किराया है वो बढ़ता रहे.

आखिर कौन सच्चा है? 

इस बातचीत को पढ़ने के बाद हर किसी के मन में ये सवाल जरूर उठेगा कि आखिर कौन सच्चा है? क्या वो टिकैत बंधु सच्चे हैं जो किसान आंदोलन और महापंचायत के मंच से सरकार को ललकारते हैं और दावा करते हैं कि नए कृषि कानून किसानों के खिलाफ हैं और उद्योगपतियों की तिजोरी भरने के लिए बनाए गए हैं. या फिर नरेश टिकैत सच्चे हैं जो अपनी जमीन लीज पर लेने वाले उद्योगपतियों का स्वागत करने को तैयार बैठे हैं.

खौफ की खेती सच आया सामने 

असल में इस खुलासे से साफ हो गया है कि डर के इस खेल में नरेश टिकैत जैसे किसान संगठनों के नेता रस्सी को सांप बताकर किसानों को डराते हैं. वो खौफ की खेती कर नेतागीरी की फसल काटते हैं. टिकैत भी इस तथ्य को जानते और समझते हैं कि नए कृषि कानूनों से देश के करोड़ों अन्नदाताओं का फायदा होगा. किसानों की जमीन भी सुरक्षित रहेगी और और उनकी आमदनी भी बढ़ेगी. लेकिन वो किसानों को उल्टा पाठ पढ़ाकर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं. शायद उन्हें लगता है कि किसान डरेगा तभी उनकी नेतागीरी चलेगी. इसलिए वो किसानों को जमीन खोने का भय दिखाते हैं, किसानों को गुमराह कर सरकार के खिलाफ भड़काते हैं.

(नोट- जी न्यूज के इस स्टिंग ऑपरेशन का मकसद किसी भी संस्था या व्यक्ति का चरित्र हनन करना नहीं है. हम सिर्फ सच सामने लाना चाहते हैं और सच ये है कि भारतीय किसान यूनियन के प्रमुख नरेश टिकैत ने खुफिया कैमरे के सामने जो कहा, वो कानूनी तौर पर ठीक है क्योंकि कोई किसान नियमों और प्रक्रिया का पालन करते हुए अपनी जमीन उद्योग लगाने के लिए दे सकता है. इसमें कोई गलती नहीं है. नरेश टिकैत कानूनी तौर पर सही हो सकते हैं लेकिन नैतिक रूप से नहीं. किसान आंदोलन के मंच से नरेश टिकैत और उनके भाई राकेश टिकैत डर दिखाते हैं कि नए कृषि कानून लागू हुए तो किसानों की जमीन उद्योगपति हड़प लेंगे लेकिन नरेश टिकैत खुद एक कारोबारी को जमीन लीज पर देने के लिए तैयार हैं.)

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