DNA ANALYSIS: अफगानिस्‍तान से सैनिकों को रातोंरात वापस बुलाया, हर युद्ध से क्‍यों भाग जाता है अमेरिका?
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DNA ANALYSIS: अफगानिस्‍तान से सैनिकों को रातोंरात वापस बुलाया, हर युद्ध से क्‍यों भाग जाता है अमेरिका?

अमेरिका खुद को दुनिया में लोकतंत्र और मानव अधिकारों का चैम्पियन बताता है और अपनी इसी छवि को मजबूत करने के लिए उसने कई देशों में युद्ध लड़े और अपनी सेना को वहां भेजा. लेकिन इनमें ये किसी भी संघर्ष से उसे कुछ हासिल नहीं हुआ.

DNA ANALYSIS: अफगानिस्‍तान से सैनिकों को रातोंरात वापस बुलाया, हर युद्ध से क्‍यों भाग जाता है अमेरिका?

नई दिल्ली: अफगानिस्तान (Afghanistan) के इन हालात के लिए सबसे ज्यादा आलोचना अमेरिका (America) की हो रही है, जिसने चुपचाप रातोंरात चोरों की तरह अपने सैनिकों को अफगानिस्तान से वापस बुला लिया, और वहां के लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया. इसलिए आज हम अमेरिका के चरित्र के बारे में भी आपको बताएंगे.

  1. अफगानिस्तान से सैनिकों को रातोंरात वापस बुलाया
  2. हर बार युद्ध छोड़कर क्यों भाग जाता है अमेरिका?
  3. करोड़ों खर्च करके भी खाली रह गए US के हाथ

संघर्ष से US को क्या मिला?

अमेरिका खुद को दुनिया में लोकतंत्र और मानव अधिकारों का चैम्पियन बताता है, और अपनी इसी छवि को मजबूत करने के लिए उसने कई देशों में युद्ध लड़े और अपनी सेना को वहां भेजा. लेकिन इनमें ये किसी भी संघर्ष से उसे कुछ हासिल नहीं हुआ. वर्ष 1950 का कोरियाई युद्ध (Korean War) जब सोवियत संघ और चीन ने उत्तर कोरिया की कम्युनिस्ट ताकतों का साथ दिया तो अमेरिका ने इसके खिलाफ दक्षिण कोरिया के समर्थन का ऐलान किया था. कम्युनिस्ट ताकतों के खिलाफ अमेरिका ने अपनी सेना वहां भेजी और ये युद्ध लगभग 3 वर्षों तक चला. इसमें अमेरिकी सेना के 36 हजार 574 सैनिक मारे गए. इस युद्ध पर अमेरिका ने लगभग 400 बिलियन डॉलर यानी आज के हिसाब से 29 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे. लेकिन इसके बावजूद इस युद्ध से अमेरिका को कुछ हासिल नहीं हुआ.

वियतनाम में फिर दोहराई वही गलती

अमेरिका ने जो गलती कोरिया में की, वही गलती उसने वियतनाम में भी दोहराई. वियतनाम को गृह युद्ध से बाहर निकालने और वहां की कम्युनिस्ट ताकतों को उखाड़ फेंकने के लिए उसने 1965 में अपने सैनिकों को वियतनाम में भेजा. अमेरिका ने लगभग 8 वर्षों तक वियतनाम में युद्ध लड़ा, जिसमें उसके लगभग 60 हजार सैनिक मारे गए. इस युद्ध पर उसने कोरियाई युद्ध के मुकाबले दोगुना खर्च किया. ये खर्च था, लगभग 850 बिलियन डॉलर्स यानी आज के हिसाब से 64 लाख करोड़ रुपये. अपने हजारों सैनिकों और लाखों करोड़ों रुपये बर्बाद करने के बाद भी अमेरिका को वियतनाम से भी कुछ हासिल नहीं हुआ. बड़ी बात ये है कि अफगानिस्तान की तरह वियतनाम युद्ध में भी अमेरिका दक्षिण वियतनाम के लोगों को मरने के लिए छोड़ कर चला गया था. ये बात 1973 की है. लेकिन जब 1975 में दक्षिण वियतनाम पर कम्युनिस्ट ताकतों ने कब्जा किया तो जिस तरह से आज काबुल में अमेरिका ने अपने नागरिकों को एयरलिफ्ट किया है, ठीक उसी तरह Saigon में उसने अपनी खुफिया एजेंसी (CIA) के अधिकारियों को एयरलिफ्ट किया था.

जब US ने 7 सालों तक लड़ी जंग

अमेरिका ने इराक में भी युद्ध लड़ा और ये युद्ध लगभग साढ़े 7 वर्षों तक चला. इस युद्ध पर अमेरिका ने लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर्स यानी आज के हिसाब से 76 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. लेकिन इसके बावजूद अमेरिका अपने मकसद में कामयाब नहीं हुआ. अमेरिका चाहता था कि इराक गृह युद्ध के दौर से बाहर निकले और वहां लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार का शासन हो. आज इराक में सरकार तो है लेकिन ये देश आज भी गृह युद्ध से संघर्ष कर रहा है, और इस देश के कई हिस्सों पर ISIS जैसे आतंकवादी संगठनों का प्रभाव है. 

इसे ही इराक युद्ध की शुरुआत माना गया

इराक युद्ध की तरह खाड़ी युद्ध में भी अमेरिका ने खुद को चैम्पियन की तरह दिखाने की कोशिश की. दरअसल, इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन (Saddam Hussein) ने अगस्त 1990 में कुवैत पर हमला कर दिया था, जिसके बाद गल्फ वॉर शुरू हुआ. उस समय अमेरिका के नेतृत्व में नाटो यानी नॉर्थ एथलेटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन समेत कुल 42 देशों ने इराक पर हमला कर दिया था. इस युद्ध में अमेरिका कुवैत को इराक के कब्जे से छुड़ाने में कामयाब हुआ, लेकिन सद्दाम हुसैन इराक की सत्ता में बने रहे, जिसके लिए 13 साल बाद अमेरिका को फिर से इराक पर हमला करना पड़ा, इसे ही इराक युद्ध की शुरुआत माना गया.

करोड़ों खर्च करके भी खाली हाथ रहा US

इस गल्फ वॉर में अमेरिका के 383 सैनिक मारे गए और उसने इस युद्ध पर 116 बिलियन डॉलर यानी 9 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. नतीजा बाकी युद्ध और संघर्षों की तरह ही रहा और अमेरिका को ज्यादा कुछ हासिल नहीं हुआ. समझने वाली बात ये है कि अमेरिका दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दखल देकर युद्ध तो शुरू कर देता है. लेकिन वो इसे कभी भी अंतिम रूप नहीं दे पाता, जहां उसे लगता है कि अब उसके लिए कुछ नहीं बचा है तो वो उस देश से निकल जाता है, जैसा उसने आज अफगानिस्तान में किया है. अफगानिस्तान में 20 वर्षों तक अमेरिका की सेना तैनात रही और इस दौरान उसने 910 बिलियन डॉलर्स यानी 68 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. लेकिन इसके बावजूद वो बुरी तरह फेल हुआ.

अमेरिका को सिर्फ अपने हितों की चिंता

हालांकि इतिहास की किताबों में अगर आप इन सभी युद्ध के बारे में पढ़ेंगे तो आपको ऐसा ही लगेगा कि लोकतंत्र और मानव अधिकारों को बचाने में अमेरिका ने एक जिम्मेदार देश की भूमिका निभाई है. लेकिन अगर आप इनका विश्लेषण करेंगे तो आपको समझ आएगा कि अमेरिका ने अपने फायदे और अपनी विदेश नीति को साधने के लिए ये सारे युद्ध लड़े और अपने हितों को पूरा करने के बाद वो इन देशों को उनके हाल पर छोड़ कर वापस चला गया. अमेरिका ने अफगानिस्तान से ना सिर्फ अपनी सेना को वापस बुलाया, बल्कि तालिबान को समझने में भी उसने भूल की. इसी साल 8 जुलाई को अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि तालिबान के 75 हजार आतंकवादी अफगानिस्तान की सेना के 3 लाख जवानों का मुकाबला नहीं कर पाएंगे, और हालात तालिबान के पक्ष में कभी नहीं जाएंगे. लेकिन अमेरिका गलत साबित हुआ और तालिबान ने सभी अमेरिकी सैनिकों की वापसी से पहले ही काबुल पर कब्जा कर लिया. इससे पता चलता है कि अमेरिका भी भी अफगानिस्तान और उसके लोगों के बारे में नहीं सोच रहा था. उसे तो सिर्फ अपनी हितों की चिंता थी.

अफगानी सेना ने क्यों किया सरेंडर?

आज एक बड़ा सवाल ये भी है कि अफगानिस्तान की जिस सेना को अमेरिका ने 20 वर्षों तक ट्रेनिंग दी, इस ट्रेनिंग पर 83 बिलियन डॉलर्स यानी 6 लाख 20 हजार करोड़ रुपये खर्च किए, आधुनिक हथियार दिए, सैन्य अड्डे बनाए वो सेना तालिबान के 75 हजार आतंवादियों से कैसे हार गई? इसे चार Points में समझिए

1. भ्रष्टाचार 
अधिकारिक तौर पर अफगानिस्तान की सेना में कुल जवानों की संख्या लगभग 3 लाख है, जबकि सच ये है कि इनमें से हजारों सैनिक केवल कागजों पर मौजूद हैं. इनके नाम पर मिलने वाला वेतन और दूसरी सुविधाएं बड़े कमांडिंग ऑफिसर्स भ्रष्टाचार के रूप में लूट लेते हैं. इस तरह के सैनिकों को घोस्ट सोल्जर्स (Ghost Soldiers) कहा जाता है.

2. जुनून की कमी
जिस तरह से तालिबान के आतंकवादी अफगानिस्तान पर अपना शासन बहाल करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं और खून खराबा कर सकते हैं, वो जुनून और प्रतिबद्धता अफगानिस्तान के सैनिकों में नहीं है. अफगानिस्तान के सैनिक मैदान में जाने से पहले ही तालिबान के आंतकवादियों से हार गए.

3. विद्रोह नहीं होना 
तालिबान ने पिछले एक महीने में एक-एक करके अफगानिस्तान के ज्यादातर प्रांतों पर कब्जा कर लिया, और कब्जे की इस लड़ाई में उसके खिलाफ कोई विद्रोह नहीं हुआ. न तो सेना की तरफ से संघर्ष हुआ, न स्थानीय स्तर पर सुरक्षा बल ने लड़ाई लड़ी और न ही वहां के लोगों ने तालिबान के आंतकवादियों का विरोध किया. इसकी सबसे बड़ी वजह है तालिबान का डर. वर्ष 1996 में जब अफगानिस्तान में तालिबान का शासन आया तो कई प्रांतों में उसका विरोध हुआ था. लेकिन अपना शासन आने के बाद इन प्रांतों में उसने विरोध करने वाले लोगों की क्रूरता से हत्या कर दी थी. लोगों को ये संदेश दिया गया कि जो विरोध करेगा वो जिन्दा नहीं रहेगा. ये डर आज 25 वर्षों के बाद भी अफगानिस्तान के लोगों में है. जबकि बड़ी बात ये है कि तालिबान के आतंकवादियों के पास इस समय ना तो आधुनिक हथियार हैं और ना ही ज्यादा पैसा है.

4. तालिबान की रणनीति
तालिबान के पास अपनी वायु सेना नहीं है, जबकि अफगानिस्तान के पास अपनी वायु सेना है. जिसे देखते हुए तालिबान ने वहां के पायलटों को मारने के लिए एक टॉरगेट ऑपरेशन शुरू किया था, जिसका मकसद था, वायु सेना के पायलटों को मार देना ताकि कब्जे की लड़ाई के दौरान अफगानिस्तान वायु सेना का इस्तेमाल नहीं कर पाए. इस ऑपरेशन के तहत इसी साल अफगानिस्तान के 9 पायलटों को मार दिया गया. जब तालिबान के खिलाफ वायु सेना के इस्तेमाल की बात उठी तो मारे जाने के डर से कई पायलटों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और कई पायलटों ने ये कह दिया कि वो तालिबान पर हवाई हमलों से जुड़े सैन्य ऑपरेशन में हिस्सा नहीं लेंगे.

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