कश्मीर: बच्चों को पढ़ाने के लिए इंजीनियर ने निकाला नया रास्ता, ऐसे दे रहे शिक्षा

कोरोना वायरस के दौरान सारे शिक्षा केंद्र बंद पड़े हैं, ऐसे में एक इंजीनियर से शिक्षक बने युवा ने श्रीनगर में दर्जनों छात्रों को उम्मीद दी है. 

कश्मीर: बच्चों को पढ़ाने के लिए इंजीनियर ने निकाला नया रास्ता, ऐसे दे रहे शिक्षा
बच्चों को पढ़ाते मुनीर

श्रीनगर: कश्मीर (Kashmir) में कोरोना के चलते धार्मिक स्थलों पर एकजुट होने पर प्रतिबन्ध है लेकिन श्रीनगर के ईदगाह धार्मिक स्थल पर एक अलग किस्म की इबादत जारी है.  

कोरोना वायरस के दौरान सारे शिक्षा केंद्र बंद पड़े हैं, ऐसे में एक इंजीनियर से शिक्षक बने युवा ने श्रीनगर में दर्जनों छात्रों को उम्मीद दी है. सूर्योदय के साथ ही हर दिन सुबह 5 बजे श्रीनगर के डाउनटाउन इलाके के मशहूर मैदान  ईदगाह में मुफ्त कक्षाएं शुरू हो जाती हैं. 

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इंजीनियर से गणित के शिक्षक बने मुनीर आलम, ईदगाह के हरे-भरे मैदान में चालीस छात्रों को पढ़ाने के लिए आगे आए हैं. मुनीर कक्षा 11 और 12 के छात्रों को दो सप्ताह से अधिक समय से पढ़ा रहे हैं और उनका विचार अन्य इलाकों के शिक्षकों को भी इसी तरह के कदम उठाने के लिए प्रेरित करना है. वह कोरोना के चलते सभी नियमों का भी पालन कर रहे हैं.

चालीस वर्षीय मुनीर कहते हैं, 'शिक्षा को भी आवश्यक सेवाओं के तहत लाया जाना चाहिए और अब सरकार को संस्थानों को खोलने के लिए कदम उठाना चाहिए.'

शिक्षक मुनीर आलम कहते हैं, 'आवश्यकता, आविष्कार की जननी है. पिछले अगस्त से अब तक 15 दिनों से ज्यादा बच्चे स्कूल नहीं आए होंगे, इससे बच्चों में डिप्रेशन आया. बंद के दौरान आवश्यक सर्विस खुली रहीं लेकिन मार हमारे बच्चों पर पड़ी.'

उन्होंने कहा, ' मेरा काम है कि बच्चे अपने घर से निकलें लेकिन वह अपनी सेहत से कोई समझौता न करें. इसीलिए मैंने पूरा प्लान बनाया और इन बच्चों को पढ़ाने के लिए इतना बड़ा मैदान चुना.'

मुनीर ने कहा कि ऑनलाइन पढ़ना, कश्मीर में किसी के लिए मजाक के सिवाय कुछ नहीं है. जब मैं आगे आया तो मुझे काफी लोगों से प्रतिक्रिया मिली और अब ये काम आगे बढ़ रहा है. यह ईदगाह एक इबादत का मैदान है और इससे (शिक्षा) बड़ी इबादत क्या हो सकती है. 

यहां हर रोज सुबह 5 बजे कक्षा 11 और 12 के लगभग 40  छात्र आते हैं और कोरोना के नियमों का पालन करते हुए पढ़ाई करते हैं. इस दौरान मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ध्यान रखा जाता है. इस पाठशाला में कक्षा सुबह 8 बजे तक चलती है क्यूंकि फिर इस खुले मैदान में धूप में बैठना मुश्किल होता है. हालांकि अगर बादल छाए हों तो कक्षा एक घंटे तक और चलती है.

मुनीर पेशे से सिविल इंजीनियर हैं और सालों से ट्यूशन करते आए हैं. वह समझते हैं कि शिक्षा का एक छात्र के लिए क्या अर्थ है. 

छात्र इस कदम को अपने लिए बेहद लाभदायक मानते हैं. इससे उनका तनाव भी कम हुआ है और इंटरनेट धीमा होने से जो परेशानी होती थी, वह भी दूर हुई है. 

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छात्र आफद कहते हैं, 'इस क्लास को ज्वाइन करने से हमें बहुत फायदा है और बाकी लोगों को भी मिलेगा. ऑनलाइन क्लास में कुछ पता भी नहीं लगता और नेट भी बहुत धीमा आता है. इन क्लासों में काफी ख्याल रखा जाता है.'

वहीं सीमा हमीद कहती हैं, 'हमारे टीचर ने जो कदम उठाया है वो बेहद अच्छा है. क्योंकि ऑनलाइन क्लास के नतीजे अच्छे नहीं आ रहे थे. हम बहुत ज्यादा डिप्रेशन में चले गए थे. अब अगर बाकी टीचर भी ऐसा कदम उठाएंगे तो बहुत अच्छा होगा. यह बहुत फायदेमंद है हमारे लिए.'

कश्मीर में सर्दियों की छुट्टियों के बाद जब स्कूल खुले तो केवल दो हफ्ते ही चल पाए और कोरोना के कारण जब लॉकडाउन हुआ तो सबसे पहले कश्मीर के सभी शिक्षा केंद्र बंद किए गए. कश्मीर में तो छात्र वर्ष 2019 के अगस्त  में जब अनुच्छेद 370 हटा था, तब से शिक्षा से वंचित थे और अब लॉकडाउन से उन पर दोहरी मार पड़ी. सरकार ने ऑनलाइन क्लास शुरू कीं लेकिन सुरक्षा कारणों से यहां 2जी इंटरनेट सेवा ही दी जा रही है, जिससे ऑनलाइन क्लास बेमकसद होगी.  

छात्र माहिरा शबीर कहती हैं, 'ऑनलाइन क्लासेस में कनेक्टिविटी की समस्या है. वहां बार-बार नेट डिसकनेक्ट हो जाता है. ऐसे में समझ ही नहीं आता था कि टीचर क्या पढ़ा रहा था.'

वहीं मुहीम मुश्ताक कहते हैं, 'शिक्षा एक इबादत की तरह है जो ऑनलाइन क्लास होती थी वो इबादत नहीं थी. यहां हमें वो माहौल मिलता है. टीचर के साथ भी इंटरैक्ट होता है. यह हमारे लिए फायदेमन्द है.'  

2004 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआईटी) श्रीनगर के पासआउट मुनीर पिछले दो दशकों से गणित पढ़ा रहे हैं. मुनीर ने अपने मौजूदा छात्रों के साथ विचार-विमर्श किया और उन्हें बताया कि कैसे कोरोना के खतरे में वो शिक्षा देंगे.