ग्राउंड रिपोर्ट मध्य प्रदेश: जनता भी सटीक भविष्यवाणी करने के मूड में नहीं

मध्य प्रदेश में सभी 230 विधानसभा सीटों पर वोटिंग हो चुकी है. नतीजे 11 दिसंबर को आएंगे.

ग्राउंड रिपोर्ट मध्य प्रदेश: जनता भी सटीक भविष्यवाणी करने के मूड में नहीं
ग्राउंड रिपोर्ट मध्य प्रदेश: 2018 कम से कम 2013 जैसा तो बिल्कुल नहीं है.

भोपाल: मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान हो चुका है. नतीजे ईवीएम के स्मृति पटल पर दर्ज हो चुके हैं. मझे हुए न्यायाधीश की तरह ईवीएम ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. जब 11 दिसंबर को यह फैसला पढ़ा जाएगा, तो उससे देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी के मुकद्दर का फैसला होगा और भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान स्वरूप का.

कांग्रेस के लिए यह चुनाव इसलिए बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि अगर वह मध्य प्रदेश जीती तो हिंदी पट्टी में बट्टे खाते में जा चुका उसका अकाउंट एक बार फिर चालू हो जाएगा. वहीं भारतीय जनता पार्टी के लिए यह जीत उसकी जीतों के सिलसिले में एक नया अध्याय भर होगा. अगर बीजेपी हारती है, तो किसी भी रूप में यह उसके वजूद का संकट नहीं होगा.

भोपाल
जाहिर है इस चुनाव को बहुत करीब से देखा जाना जरूरी था. इसलिए मैंने भोपाल के श्यामला हिल्स पर बने मुख्यमंत्री बंगले से आदिवासी बहुल बैतूल जिले तक वोटिंग के दिन सफर शुरू किया. सफर का पहला पड़ाव भोपाल दक्षिण-पश्चिम सीट थी. श्यामला हिल का इलाका इसी के अधीन आता है. इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी का लंबे समय से कब्जा है. शिवराज सरकार में मंत्री उमाशंकर गुप्ता एक बार फिर इस सीट से भाग्य आजमा रहे हैं. उनके सामने एक बार फिर उनके चिर प्रतिद्वंद्वी पीसी शर्मा खम ठोक रहे हैं. जब दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, उस समय पीसी शर्मा आखिरी बार विधायक बने थे. उसके बाद से वह हर चुनाव में जोर आजमाते हैं. पूरे चुनाव के दौरान जनता उनकी दावेदारी को खारिज नहीं करती, लेकिन अंत में वह हार जाते हैं. इस चुनाव में उनकी दावेदारी को फिर से से गंभीरता से लिया जा रहा है. हालांकि उमाशंकर गुप्ता को पटखनी दे पाएंगे यह दावे से कोई नहीं कह सकता.

इस सीट से आगे बढ़े, तो कुछ ही मील के फासले पर भोपाल मध्य सीट आ गई. यहां कांग्रेस के आरिफ मसूद चुनाव मैदान में हैं. भोपाल में आरिफ अकील की भोपाल उत्तर सीट के अलावा जिस सीट से कांग्रेस को सबसे ज्यादा उम्मीदें हैं वह सीट भोपाल मध्य ही है. इस सीट को पार करते करते हम गोविंदपुरा सीट की सरहद में दाखिल हो गए.

गोविंदपुरा सीट को मध्य प्रदेश की राजनीति में इस तरह भी समझा जा सकता है कि पिछली ढाई पीढ़ी को यही पता है कि बाबूलाल गौर यहां के विधायक हैं. अब करीब 30 साल बाद उनकी बहू कृष्णा गौर चुनाव मैदान में हैं. इस कहानी में बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है कि इस सीट पर अपने परिवार की दावेदारी बरकरार रखने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर को खासे दांवपेच दिखाने पड़े थे. उनकी इस अदा से उन्हें यह सीट तो मिल गई, लेकिन मध्य प्रदेश के भाजपा संगठन ने इस सीट पर प्रचार-प्रसार में बहुत दिलचस्पी नहीं दिखाई. ऊपर से कांग्रेस ने यहां बाबूलाल गौर के ही एक पुराने चेले को मैदान में उतार दिया. इससे मामला थोड़ा सा पेचीदा हो गया है.

भोपाल शहर की इन तीन सीटों को पार करते समय तक मतदान बहुत धीमा था. शहर के बाजारों से आसानी से गुजरा जा सका. वहां कांग्रेस और बीजेपी के झंडे समानुपात में लगे हुए थे. इस एक समान दृश्य को पार करके हम होशंगाबाद रोड पर आगे बढ़ गए.

भोजपुर
यहां सबसे पहली सीट जो सामने आई वह थी भोजपुर. भोजपुर वैसे तो अपने विशाल शिवलिंग के लिए मशहूर है, जिसके अधूरे मंदिर की छत सैकड़ों वर्षो से खुली हुई थी और मेघराज सावन के महीने में सीधे शिव का जलाभिषेक किया करते थे. लेकिन जब प्रदेश में शिवराज आए, तो शिव को भी छत नसीब हो गई. अब मेघदूत उनका जलाभिषेक नहीं कर पाते. यह काम मनुष्यों के पास ही बचा है. इस पौराणिक महत्व की सीट पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुरेश पचौरी चुनाव मैदान में हैं और उनका सामना मौजूदा विधायक और भारतीय जनता पार्टी के पितृ पुरुष सुंदरलाल पटवा के भतीजे सुरेंद्र पटवा से है.

पचौरी भले ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हों और एक जमाने में संजय गांधी के वैसे ही करीबी रहे हों जैसे कि कमलनाथ हुआ करते थे, लेकिन उन्हें चुनावी जीत का मुंह देखे अरसा बीत गया है. लोकसभा और विधानसभा के चुनाव लगातार हारते रहे हैं. ऐसे में वह एक जीत के लिए बेताब हैं और खासकर ऐसे समय पर जबकि कांग्रेस पार्टी खुद के लिए एक बेहतर भविष्य की कल्पना कर रही है. लेकिन मतदान के दिन तक इस सीट पर पटवा का पलड़ा ही भारी रहा.

बुदनी
इस सीट को पार करने के बाद हम सीहोर जिले में दाखिल हो गए और सबसे पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की बुदनी सीट का जायजा लिया. बुदनी सीट का जायजा लेना हो तो जैत गांव से बेहतर और क्या जगह हो सकती है, जहां मुख्यमंत्री का जन्म हुआ था और जहां उनका पैतृक आवास है. जब हम वहां पहुंचे तो गांव के इकलौते मतदान केंद्र पर अच्छी खासी कतार लग चुकी थी. मुख्यमंत्री अपना वोट डालकर और नर्मदा मैया की आराधना करके वापस निकल चुके थे. बूथ पर जब लोगों से यहां के चुनाव के मुद्दे पूछने की कोशिश की, तो ज्यादातर लोगों ने कन्नी काट ली. वे संकोच कर रहे थे कि मुख्यमंत्री के गांव में भी सरकार के कामकाज पर क्या टिप्पणी करें. इस सवाल को तो सबने सुनने से इनकार कर दिया कि जैत गांव तक आने वाली सड़क आखिर इस कदर उखड़ी क्यों है और अगर उसे चौड़ा करना है और नए सिरे से बनाया जाना है तो उस पर काम क्यों नहीं चल रहा है. एक उत्साही नौजवान ने सीधा यह कहा कि यहां कोई मुद्दा नहीं है, शिवराज ही सबकुछ हैं.

इस चर्चा के बीच मुख्यमंत्री के माता-पिता भी अपनी गाड़ी से उतरते दिखाई दिए. वे अपना वोट पहले ही डाल चुके थे. इस समय तो वे नर्मदा मैया की आराधना करने जा रहे थे, ताकि अपने लाड़ले की चौथी जीत के लिए मां का आशीर्वाद हासिल कर सकें. यह देखकर बहुत अच्छा लगा कि मुख्यमंत्री के माता-पिता के साथ सुरक्षा का बहुत बड़ा लाव लश्कर नहीं था, बल्कि यह कहें कि उनके साथ किसी तरह की खाकी वर्दी वाली सुरक्षा नहीं थी. वे गांव किनारे नर्मदा तट पर पहुंचे, जहां गांव की बहुत सी महिलाएं नहा रही थीं और बच्चे नदी में गोते लगा रहे थे. वहीं उन्होंने सूर्य को अर्घ्य दिया, अगरबत्ती जलाई, नर्मदा मैया को नारियल अर्पित किया और करवद्ध प्रार्थना की.

इस बीच शिवराज को चुनौती दे रहे मध्य प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और मध्य प्रदेश के उप मुख्यमंत्री रह चुके सुभाष यादव के पुत्र अरुण यादव भी बुदनी क्षेत्र में नर्मदा की आराधना कर चुके थे. अरुण यादव यहां शिवराज को हराने की जो लड़ाई लड़ रहे हैं वह तो ठीक है, लेकिन उनकी असली लड़ाई अपनी पार्टी के भीतर खुद को वीर बालक साबित करने की है. कमलनाथ और सिंधिया के मध्य प्रदेश की राजनीति में इस कदर सक्रिय होने के बाद उन्हें अपनी भूमिका को नए सिरे से व्याख्यायित करना है. ऐसे में अगर वह गरिमापूर्ण तरीके से हार भी जाते हैं तो पार्टी में उन्हें शहीद का दर्जा मिलेगा और अगर कहीं वह जीत गए तो मुख्यमंत्री की दावेदारी में खुद को झोंक देने से उन्हें कोई नहीं रोक पाएगा.

होशंगाबाद
बुदनी के बाद सीधे होशंगाबाद का रुख किया. होशंगाबाद मध्य प्रदेश का एक पुराना और सरसब्ज जिला है. यह इलाका इतना ज्यादा उपजाऊ है कि यहां की खेती की मिसाल पूरे देश में दी जाती है. यहीं का गेहूं असल में पूरे देश में मध्य प्रदेश के गेहूं के नाम से बिकता है. इस इलाके को खेती-बाड़ी में अव्वल बनाने में एक बहुत बड़ी भूमिका पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए सिख परिवारों ने निभाई थी. यह लोग अब मालवीय सरदार हैं और यहां की राजनीति का स्थाई चरित्र सरताज सिंह लंबे समय से उनके नेता और इलाके में भारतीय जनता पार्टी का चेहरा रहे हैं. लेकिन इस चुनाव में 80 साल के सरताज सिंह को टिकट देने से भारतीय जनता पार्टी ने इनकार कर दिया. नतीजा यह हुआ कि चौथेपन में जन्म के भाजपाई सरताज सिंह गले में पंजा छाप तिरंगा पटका डालकर घूम रहे हैं. उनका मुकाबला भारतीय जनता पार्टी के विधानसभा अध्यक्ष शर्मा से है. 

 

जाहिर है दोनों पुराने योद्धा हैं और लड़ाई का हर हुनर जानते हैं, लेकिन मैं तब चौंक गया जब शहर के मुख्य बाजार में बने एक पोलिंग स्टेशन के बाहर कांग्रेस और बीजेपी के बस्ता का मुआयना किया. जब मैं बीजेपी के बस्ता पर बैठे कार्यकर्ताओं से चर्चा कर रहा था तो उन्होंने खुलकर कहा कि यहां सरताज सिंह को टिकट न देकर बीजेपी ने गलती की है. उन्होंने कहा कि वे यहां बैठे हैं लेकिन उनका मन सरताज सिंह के साथ है. खुले और चौंकाने वाले बयान के बाद कई और लोगों ने भी कहा कि होशंगाबाद की लड़ाई सरताज सिंह को ताज पहना सकती है. पिछले विधानसभा चुनाव में होशंगाबाद जिले की सभी 4 सीटें जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी के लिए इस बार चार की जगह 2 सीटें आ सकती हैं. जाहिर है यह सब कयास ही हैं, लेकिन राजनीति में कयासों को दरकिनार करने का चलन नहीं होता.

MPC 1

चुनाव आयोग का प्रबंधन
होशंगाबाद दर्शन करते करते मतदान केंद्रों पर अच्छी खासी भीड़ लग चुकी थी. निर्वाचन आयोग ने भले ही कतारमुक्त बूथ बनाने के बड़े-बड़े वादे किए थे, लेकिन लोकतंत्र में अपनी आहुति डालने को उतावले लोग जल्द ही लंबी कतारों की शक्ल में बूथों पर नजर आने लगे. सबसे अच्छी बात यह थी कि कतारें लंबी लंबी होने के बावजूद मौसम सुहावना था और लोगों के चेहरे पर न तो कोई तनाव था और न ही वे एक-दूसरे से झगड़ने पर उतारू थे, इसीलिए मामूली सुरक्षा बंदोबस्त के साथ भी ज्यादातर बूथों पर शांतिपूर्ण मतदान हो रहा था. कई बूथ बहुत खूबसूरत ढंग से सजाए गए थे.

शहर के सारे बूथ देखना तो संभव नहीं था, लेकिन निर्वाचन आयोग ने जिस तरह से अपने बूथ मैनेजमेंट को लेकर बड़े-बड़े होर्डिंग लगाए थे, उससे लगा कि चुनाव जीतने की लड़ाई सिर्फ राजनीतिक दल नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि निर्वाचन आयोग भी जनता के दिल में व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ता दिख रहा है. निर्वाचन आयोग चुनावों की ऐसी छवि गढ़ने की कोशिश कर रहा है जो लोगों में उत्साह भरे, उन्हें मतदान प्रक्रिया के करीब लाए और इस पूरी प्रक्रिया पर उनका भरोसा भी बढ़े.

ईवीएम हुईं खराब
भोपाल से भोजपुर और बुदनी होते हुए होशंगाबाद तक का सफर करने में दोपहर के डेढ़ बज चुके थे. इस दौरान मध्य प्रदेश के बाकी इलाकों से जो समाचार मिल रहे थे, उनसे पता लगने लगा था कि बड़ी संख्या में ईवीएम धराशायी हो रही हैं और वीवीपैट मशीन कई बार काम करने से इंकार कर रही हैं. चंबल और ग्वालियर के इलाकों से छिटपुट हिंसा की बातें भी व्हाट्सएप मैसेज के जरिए हम तक पहुंच रही थीं और यह भी पता चल रहा था कि प्रदेश में मतदान की गति तेज होती जा रही है. चुनाव आयोग एक ओर जहां 80 फ़ीसदी मतदान का लक्ष्य लेकर चल रहा था, वही भारतीय जनता पार्टी ने मतदान के दिन अखबारों में जो विज्ञापन छापे उसमें 90 प्रतिशत मतदान करने की अपील की गई. इस अपील में कुछ लोगों ने एक तंज भी देखा जो कमलनाथ के अल्पसंख्यक वोटरों से 90 प्रतिशत वोटिंग करने की अपील के जवाब जैसा लग रहा था.

बैतूल
होशंगाबाद से बैतूल की ओर बढ़े तो विकास जरासंध की तरह दिखाई देने लगा. एनएच 47 दो लेन रास्ते की तरह आगे बढ़ा जा रहा था और उसके बगल में 2 लेन का समानांतर रास्ता अपने बनने की बाट जोह रहा था. पूरे रास्ते इस अधूरे रस्ते को देखना ऐसा लग रहा था जैसे लोकतंत्र मुकम्मल होने में अभी बहुत वक्त लेने वाला हो.

इस पूरे रास्ते पर भी दोनों तरफ बीजेपी और कांग्रेस के झंडे समानुपात में थे. वे इतने नए और कोरे लग रहे थे कि लगता था कि हमने वाकई लोकतंत्र का संपूर्ण चुनावीकरण कर दिया है, जिसमें पार्टियां जनता के नाम का झंडा 4 साल तक कहीं छुपा कर रखती हैं और पांचवें साल कोरा झंडा लेकर जनता के बीच में वोट मांगने उतर जाती हैं.

यहां की घोड़ाडोंगरी विधानसभा सीट के बूथों पर लोग भारतीय जनता पार्टी को लेकर ज्यादा बातें करते दिखे. वहीं बैतूल जिला मुख्यालय की सीट पर कांग्रेस की चर्चा रही. पिछले विधानसभा चुनाव में बैतूल जिले की सभी 5 सीटें बीजेपी के पास थीं. वोटरों का मिजाज देख कर लग रहा है इस बार वह कुछ सीटें गंवा सकती है.

कहां जाएगा चुनाव
इस इलाके में दिनभर वोटिंग के दौरान घूमने और जनता की नब्ज लेने के बाद शाम को दूसरे इलाकों में बैठे लोगों से बात की. ग्वालियर, चंबल, बुंदेलखंड, बघेलखंड, मालवा हर तरफ से लोगों ने यही कहा कि 2018 कम से कम 2013 बिल्कुल नहीं है. इस चुनाव में कांग्रेस का कुछ आगे बढ़ना तय है. जाहिर है 5 करोड़ वोटर और 230 विधानसभा के परिणामों को कोई जल्दबाजी के आकलन में सटीक ढंग से नहीं बता सकता. 

कांग्रेस को उम्मीद है यह बदलाव कुछ बड़ा होगा. मतदान खत्म होते ही कांग्रेस नेता कमलनाथ ने कांग्रेस को 140 सीटें मिलने का बढ़-चढ़कर दावा किया. दिलचस्प बात यह है कि अब तक विधानसभा चुनाव में सबसे पहले सीटों की घोषणा भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह किया करते थे, लेकिन इस बार उन्होंने धैर्य से काम लिया. बीजेपी मानकर चल रही है कि वह चौथी बार आएगी और कांग्रेस को यकीन है कि जनता ने पांसा पलट दिया है. 11 दिसंबर तक दोनों पार्टियों को अपनी राय पर कायम रहने का पूरा अधिकार है और पूरा मौका भी है. उसके बाद कौन आदमी श्यामला हिल्स के मुख्यमंत्री बंगले में बैठेगा सबको पता चल जाएगा.