MP: ऑडी और BMW कार छोड़ लोग यहां करते हैं बैलगाड़ी की सवारी, जानिए क्या है पूरा मामला

शहर के प्राचीन जैन तीर्थ बिबड़ोद में हर साल की तरह इस साल भी मेले का आयोजन किया गया. मेले का खास आकर्षण बैलगाड़ी और लकड़ी के झूले रहे, जो सालों से यहां की परम्परा है. 

MP: ऑडी और BMW कार छोड़ लोग यहां करते हैं बैलगाड़ी की सवारी, जानिए क्या है पूरा मामला

चंद्रशेखर सोलंकी/रतलाम: आज गांव-गांव तक पहुंचने के लिए पक्की सड़कें हैं, परिवहन के लिए वाहन है. इन सबके बावजूद रतलाम में आज भी हजारों लोग बैलगाड़ियों में परिवार के साथ 12 किलोमीटर का सफर तय कर मेले में पहुंचते हैं. यह कोई प्रदर्शन या मार्ग न होने की मजबूरी नही है. इन लोगों के पास एक से बढ़कर एक महंगे वाहन भी है फिर ये लोग बैलगाड़ी में क्यों. 

दरअसल, यह एक परंपरा है जिसके चलते रतलाम के बिबडोद में जैन समाज के प्राचीन धार्मिक स्थल पर लोग आज भी बैलगाड़ी में सफर तय कर भगवान के दर्शन के लिए जाते है. वहीं, इस मेले को प्रदूषण मुक्त मेला भी कहा जाता है. क्योंकि वाहनों की आवाजाही कम होने से तो प्रदूषण कम होता है. वहीं, मेले में आज भी पुराने समय के लकड़ी के हाथ से चलने वाले झूले ही लगाए जाते हैं. डीजल मोटर या बिजली के अत्याधुनिक झूले आज भी इस  मेले में नजर नही आते. 

शहर के प्राचीन जैन तीर्थ बिबड़ोद में हर साल की तरह इस साल भी मेले का आयोजन किया गया. मेले का खास आकर्षण बैलगाड़ी और लकड़ी के झूले रहे, जो सालों से यहां की परम्परा है. आधुनिक युग में जहां मेले और बैलगाड़ी अपना अस्तित्व खो रहे हैं. वहीं, शहर की युवा पीढ़ी बैलगाड़ी में सफर कर बिबड़ोद मेले में पहुंच कर परंपरागत झूलो का आनंद ले रही हैं. हर साल पौष मास की अमावस्या के दिन इस मेले का आयोजन किया जाता है. जहां शहर के एक से बढ़कर एक गोल्ड के व्यापारी भी महंगे वाहनों को घर पर ही छोड़कर बैलगाड़ियों में सवार होकर मेले में पहुंचते हैं.

इस दिन धर्मावलंबियों का सैलाब रतलाम से 12 किलोमीटर दूर  बिबड़ोद पर उमड़ता है. ऋषभदेव भगवान अर्थात केसरियानाथ के दर्शन के लिए न सिर्फ जैन धर्मावलंबियों बल्कि अन्य धर्मावलंबियो का जमघट यहां लगता है. रतलाम के बिबड़ोद में भगवान ऋषभदेव का प्राचीन मंदिर है. जहां हर साल मेले का आयोजन किया जाता है. मान्यता है कि भगवान ऋषभदेव का चिन्ह बैल है. इसीलिए लोग बैलगाड़ी की सवारी कर यहां पहुंचते हैं. जैन समाज के ही नही बल्कि रतलाम शहर के अन्य लोग भी इस परंपरागत प्राचीन मेले में बड़ी संख्या में पहुंचते हैं. इस खास मेले में बैलगाड़ी की सवारी और लकड़ी के झूलों में झूलने के लिए दूर-दूर से लोग यहां पहुंचते हैं. इस बार भी मुंबई, पुणे और बैंग्लुरु के लोग इस मेले में पहुंचे हैं.

ग्रामीण क्षेत्र से भी विलुप्त हो रहे बैल और बैलगाड़ी के दर्शन इस दिन रतलाम में हो जाते हैं. बैलगाड़ी की सवारी के लिए युवाओं में खास उत्साह देखने को मिलता है. आधुनिक युग में इस तरह के आयोजन पुरानी परम्परा को जीवित रखने में सहायक साबित हो रहे हैं. रतलाम में इस दिन करीब आस-पास के गांव की सौ बैलगाड़ियां यहां चलती हैं और इनका किराया करीब 3 से 5 हजार का होता है.

वर्षों पुरानी परंपरा के चलते इस मेले में बैलगाड़ी से ही जाने की इस परंपरा का आज भी जैन समाज निर्वाह कर रहा है. दरअसल, पहले यह रास्ता संकरा था और मार्ग भी ठीक नही था. ऐसे में पुराने समय में लोग बैलगाड़ी और पैदल यात्रा कर इस धार्मिक स्थल तक पहुंचते थे. अब यह रतलाम से बिबड़ोद मार्ग फोरलेन में तब्दील हो गया है और पुराने समय में बैलगाड़ी का सफर परम्परा बन गया है.