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अयोध्या केस में मुस्लिम पक्ष ने माना, विवादित ढांचे के नीचे था स्‍ट्रक्‍चर

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान, रामलाल के वकील सीएस वैजनाथ ने कहा था कि 'नमाज़ सड़क पर पढ़ी गई तो क्या वह मस्जिद बन जायेगी'

अयोध्या केस में मुस्लिम पक्ष ने माना, विवादित ढांचे के नीचे था स्‍ट्रक्‍चर
चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संविधान पीठ कर रही है अयोध्‍या मामले की सुनवाई (फाइल फोटो)

नई दिल्‍ली: अयोध्‍या मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 8वें दिन की सुनवाई आज जारी है. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संविधान पीठ में रामलला विराजमान की तरफ से एक बार फिर पक्ष रखा जा रहा है. रामलला के वकील सीएस वैद्यनाथन ने कोर्ट में अपनी दलीलें पेश करते हुए कहा कि जहां मस्जिद बनाई गई थी उसके नीचे एक विशाल निर्माण था. ASI की खुदाई के दौरान जो चीजें मिली, उससे स्‍पष्‍ट है कि वह हिंदू मंदिर था. 

सीएस वैधनाथन ने कहा कि बाबरी मस्जिद के नीचे जिस तरह का स्ट्रक्चर था, उसकी बनावट, उसके निर्माण के तरीके और उसमे भगवान के चिन्ह बताते हैं कि वहां पहले से मंदिर था. उन्‍होंने कहा कि पहले मुस्लिम पक्ष मंदिर के स्ट्रक्चर को ही मना करता था, लेकिन बाद में वो कहने लगे कि स्ट्रक्चर तो था, लेकिन वो एक इस्लामिक स्ट्रक्चर की तरह था. 

रामलाल के वकील ने कहा कि संस्कृत वाले शिलालेख को विवादित ढांचा विध्वंस के समय पांचजन्य के एक पत्रकार ने गिरते हुए देखा था, इसमें साकेत के राजा गोविंद चंद्र का नाम है. साथ ही लिखा है कि ये विष्णु मंदिर में लगी थी. सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या संस्कृत वाले शिलालेख जैसी चीजों को एएसआई ने इकट्ठा किया गया था? रामलला के वकील वैद्यनाथन ने कहा कि ये एएसआई रिपोर्ट में नहीं था, क्योंकि एएसआई काफी बाद में आई थी.

 उल्‍लेखनीय है कि पिछली सुनवाई में रामलला के वकील सीएस वैद्यनाथन ने कोर्ट को विवादि ज़मीन के नक्शे और फोटोग्राफ दिखाते हुए कहा था कि खुदाई के दौरान मिले खंभों में श्रीकृष्ण, शिव तांडव और श्रीराम की बालरूप की तस्वीरें नजर आती हैं. वैद्यनाथन ने कहा था कि 1950 में वहां हुए निरीक्षण के दौरान भी तमाम ऐसी तस्वीरे और ढांचे मिले थे, जिनके चलते उसे कभी भी एक वैध मस्ज़िद नहीं माना जा सकता. किसी भी मस्जिद में इस तरह के खंभे नहीं मिलेंगे.

रामलला के वकील सीएस वैधनाथन की तरफ से कहा गया था कि 1950 में निरीक्षण के दौरान वहां मस्जिद का दावा किया गया, लेकिन उसके बावजूद ये पाया गया कि वहां कई ऐसी तस्वीरें, नक्काशी और इमारत थीं, जो साबित करता है कि वो मस्जिद वैध नहीं थी. इस पर मुस्लिम पक्ष की तरफ से वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने हस्‍तक्षेप करते हुए कहा था कि कई पहलुओं को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है, जो स्पष्ट नहीं हैं. 

रामलला विराजमान की तरफ से कहा था कि हमारी तरफ से सही उदाहरण और तथ्य पेश किए जा रहे हैं. पुरातात्विक विभाग (ASI) की रिपोर्ट वाली अल्बम की तस्वीरें, मेहराब और कमान की तस्वीरें भी वैद्यनाथन ने कोर्ट को दिखाई थी, जो 1990 में खींची गई थी. उसमें कसौटी पत्थर के स्तंभों पर श्रीराम जन्मभूमि उत्कीर्ण है. तस्वीरों में भी साफ साफ दिखता है. कमिश्नर की रिपोर्ट में पाषाण स्तंभों पर श्रीराम जन्मभूमि यात्रा भी लिखा है.

वहीं, श्रीराम जन्मभूमि पुनरोद्धार समिति (याचिका 9) शंकराचार्य की ओर से कहा गया था कि वो प्रिंस ऑफ वेल्स की यात्रा की याद में लिखा गया शिलालेख था. स्तंभों और छत पर बनी मूर्तियां, डिजाइन, आलेख और कलाकृतियां मंदिरों में अलंकृत होने वाली और हिन्दू परंपरा की ही हैं. मस्जिदों में मानवीय या जीव जंतुओं की मूर्तियां नहीं हो सकतीं.

रामलाल विराजमान ने ये भी कहा था कि पुरातत्व की रिपोर्ट के मुताबिक 17 कतारें थी. हरेक कतार 5 खंभों पर टिकी हुई थी. इस रिपोर्ट में इतनी सामग्री है जिससे साफ होता कि मस्जिद का निर्माण धार्मिक नहीं कुदृष्टि से दूसरे धर्म को कुचलने के लिए किया गया था. बड़ा ढांचा था विवादित मस्जिद के नीचे. 2003 में दो खंडों में दाखिल की गई पुरातत्व कि रिपोर्ट में सभी विशेषज्ञों ने विवादित स्थल पर मस्जिद की मौजूदगी से पहले उसके नीचे मौजूद ढांचे होने का तथ्य दिया जिसमें पूरा ढांचे के दीवार दर दीवार और खंभों का जिक्र किया गया.

कोर्ट ने कहा था कि चिड़िया, खंभे कहां स्पष्ट करते हैं कि कोई धार्मिक ढांचा था. रामलला विराजमान ने कहा था कि बहुत सामग्री इस निष्कर्ष पर पहुंचाती हैं जो विशेषज्ञों ने रिपोर्ट में स्पष्ट किया. रामलला विराजमान के वकील ने कोर्ट को बताया था कि आईएसआई की रिपोर्ट के बाद वो गवाहों के बयान अदालत में रखेंगे. उसके बाद उनकी बहस पूरी हो जाएगी और इसमें करीब 4 घंटे लग सकते हैं.