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असम: ताई आहोम समुदाय ने पूर्वजों की याद में मनाया 'मे-दम- में- फि' धार्मिक उत्सव

ताई आहोम समुदाय (जनगोष्ठी) के लोगों का सबसे बड़ा त्यौहार है. हर वर्ष 31 जनवरी के दिन यह पर्व ताई अहोमो के पारंपरिक रीति -रिवाजों के साथ मनाया जाता है.

असम: ताई आहोम समुदाय ने पूर्वजों की याद में मनाया 'मे-दम- में- फि' धार्मिक उत्सव

अंजनील कश्यप, गुवाहाटी: असम में ताई आहोम समुदाय (जनगोष्ठी) के लोगों ने अपने पूर्वजों को स्मरण कर श्रद्धा सुमन अर्पित करने धार्मिक और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना कर उत्सव-  'मे-दम- में- फि' मनाया. यह पर्व विशेषकर ऊपरी असम के जिलों - गोलाघाट, जोरहाट, सरायदेव, सिवसागर, तिनसुकिया और  डिब्रूगढ़ और उत्तरी असम के धेमाजी, लखीमपुर जिलों में अधिसंख्य तादाद में रहने वाले ताई आहोम समुदाय (जनगोष्ठी) के लोगों का सबसे बड़ा त्यौहार है और हर वर्ष 31 जनवरी के दिन ये पर्व ताई अहोमो के पारंपरिक रीति -रिवाजों के साथ मनाई जाती है.

'मे-दम- में- फि' ताई अहोम लोगों के अर्थानुसार  - 'मे' का अर्थ चढ़ावा होता है, 'दम' का अर्थ पूर्वज होता है और 'फि'  का मतलब भगवान होता है. 'मे-दम- में- फि का मतलब  बलिदान हुए पुरखों के पुण्य आत्माओं को याद कर श्रद्धा सुमन चढ़ावा भगवन को अर्पित करना. ताई आहोम समाज मे 'मे-दम- में- फि पर्व सामूहिक रूप से मनाई जाती है और ताई आहोम के युवा, युवतियां, प्राचीन असम के प्रथम आहोम राजा चुकाफा की याद में सैन्य भेषभूषा में सज धज कर शहर में झांकियां निकालती हैं और पारंपरिक रंगारंग कार्यकर्म प्रस्तुत करती हैं.

ताई आहोम जंगोष्ठी के लोगों में यह धारणा हैं कि उनके समाज के लोग मृत्यु उपरांत परिवार के 'दम' यानी पूर्वज के श्रेणी में कुछ दिनों तक ही रहते हैं, कुछ दिनों के बाद वे 'फि' यानी भगवान् बन जाते हैं.

आज लखीमपुर में असम के मुख्यमंत्री सर्बानंदा सोनोवाल ने इस अवसर पर ताई आहोम समाज द्वारा आयोजित 'मे-दम- में- फि' उत्सव में भाग लिया. उन्होंने ताई आहोम राजा की भेषभूषा पहनकर हाथ में तलवार पकड़ रस्मों की अदायगी की और 'मे-दम- में- फि की पूजा अर्चना किया.       

आपको बता दें कि 31 जनवरी को मनाई जाने वाली  'मे-दम- में- फि' उत्सव के अवसर पर आज के दिन असम में सरकारी अवकाश रहता है और ये पर्व ताई आहोम समाज के विभिन्न उपाधियां (सरनेम्स) के लोग - गोगोई, बरगोहाईं , बुराहगौहैं, बरुआ, बोरा, फूकन, सैकिया, कुंवर, राजकुंवर, गोहाय आदि लोगों के बीच सबसे प्रमुख उत्सव बतौर मनाई जाती है.

 

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