कोटा: जेके लोन अस्पताल में 48 घंटों में 10 बच्चों की मौत, कारणों का पता नहीं

मौत के कारणों का पता नहीं चल सका है. देर रात मीडिया द्वारा मामले की सूचना मिलते ही अस्पताल प्रशासन भी हरकत में आ गया. शिशु रोग विभागाध्यक्ष ने पिछले दस दिनों का रिकॉर्ड मंगवाया है. 

कोटा: जेके लोन अस्पताल में 48 घंटों में 10 बच्चों की मौत, कारणों का पता नहीं
24 दिसंबर को शाम 7 बजे तक अस्पताल के रिकॉर्ड के अनुसार, 4 बच्चों की मौत हुई.

मुकेश सोनी, कोटा: जेके लोन अस्पताल में पिछले 2 दिन में 10 बच्चों की मौत होने का मामला सामने आया है. ये सभी पीआईसीयू (Pediatric intensive care unit) और एनआईसीयू (Neonatal intensive care unit) में भर्ती थे. इनमें 4 बच्चे एक से चार दिन के थे, वहीं 3 बच्चे डेढ़ से पांच, एक बच्चा नौ महीने और एक बच्चा 1 साल का था. 

फिलहाल मौत के कारणों का पता नहीं चल सका है. देर रात मीडिया द्वारा मामले की सूचना मिलते ही अस्पताल प्रशासन भी हरकत में आ गया. शिशु रोग विभागाध्यक्ष ने पिछले दस दिनों का रिकॉर्ड मंगवाया है. उसकी जांच के बाद ही पता चल सकेगा कि आखिर बच्चों की मौतों की वजह क्या है? 

आम दिनों में रोजाना 2 बच्चों की मौत का औसत रहता है लेकिन अचानक से इस तरह 48 घंटे में 10 बच्चों की मौत समझ से परे है.  अस्पताल के रिकॉर्ड के मुताबिक, 23 दिसंबर को 6 बच्चों की मौत हुई थी.

एनआईसीयू में इन बच्चों ने तोड़ा दम
- बेबी रेखा पुत्री टोनू - 3 दिन (4:30 Minute AM)
- बेबी कांता पुत्री बुधराम - 2 दिन (5:40 Minute AM)
- बेबी नरगिस पुत्र बिल्लू - 1 दिन (9:20 Minute AM)

पीआईसीयू में इन बच्चों ने तोड़ा दम
- बेबी जोगेंद्र पुत्र ननंद बिहारी (12:15 Minute AM)
- बेबी तेजस पुत्र संजय - 5 माह (10 PM)
- बेबी पायल पुत्री मनीष - 9 माह (10:45 Minute PM)

वहीं 24 दिसंबर को शाम 7 बजे तक अस्पताल के रिकॉर्ड के अनुसार, 4 बच्चों की मौत हुई.

एनआईसीयू रिपोर्ट
बेबी तोली पुत्र कमलेश - 1 दिन (3:50 Minute PM)

पीआईसीयू
- बेबी रजनीश पुत्र दीपक - डेढ़ माह (1:30 Minute AM)
- बेबी धनुष पुत्र विक्रम - 2 माह (4:10 Minute PM)
- बेबी भरत सिंह पुत्र सागर - 1 साल (5:15 Minute PM)

क्या कहना है शिशु रोग विभागाध्यक्ष का
शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ. अमृतलाल बैरवा ने बताया कि मुझे भी सूचना मिली है. दस दिन का रिकॉर्ड मंगवाया है. उसकी जांच की जाएगी. उन्होंने कहा कि यह अस्पताल रैफरल सेंटर है. शहर के निजी अस्पताल और नर्सिंग होम से गंभीर बच्चे सीधे यहीं आते हैं. ऐसे में यहां रोजाना 1 से 3 बच्चों की मृत्यु होती है. कभी नहीं भी होती है. इनमें न्यू बोर्न की मृत्यु होती है. नेशनल एनआईसीयू रिकॉर्ड के अनुसार, 20 प्रतिशत तक स्वीकार करते हैं जबकि हमारा 10 से 15 प्रतिशत तक रहता है. वैसे हर महीने रिव्यू और डेथ ऑडिट भी करते हैं. इससे मौत के कारणों का पता चलता है. इसकी रिपोर्ट ऑनलाइन होती है. सरकार के स्तर पर भी इसकी मॉनिटरिंग होती है.