बारां: संरक्षण के अभाव में जीर्ण-शीर्ण हुआ शाहबाद का किला, प्रशासन बेखबर

मुगल शैली में बने इस किले का इतिहास हमीर वंशीय राजाओं से जुड़ा है. बाद में राजा मुकुटमणी देव हुए जिन्होंने 16 वीं सदी (1512 ईस्वी) में घाटी के ऊपर किले का निर्माण करवाया था. 

बारां: संरक्षण के अभाव में जीर्ण-शीर्ण हुआ शाहबाद का किला, प्रशासन बेखबर
सुरक्षा के लिए किले के चारों ओर 20 फीट ऊंचा परकोटा बना हुआ है.

राम मेहता/बारां: कोटा को बारां में शाहाबाद में इतिहास को अपने गर्भ में समेटे जिले के शाहबाद का ऐतिहासिक किला संरक्षण के अभाव में जीर्ण-जीर्ण हो रहा है. देख-रेख के अभाव में इतिहासिक किला अपनी पहचान खो रहा है. शाहाबाद के एतिहासिक किले में स्थित महल, छतरियां व बावड़ियां तो अब खंडर में तबदील हो चुके हैं. कस्बे को हैरिटेज दर्जा तो मिला लेकिन संरक्षण नहीं मिला. ऐसे में किला धीरे-धीरे प्राकृतिक सौंदर्य को खोता जा रहा है. ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन सिर्फ किले का नाम ही इतिहास बन कर रह जाएगा.

मुगल शैली में बने इस किले का इतिहास हमीर वंशीय राजाओं से जुड़ा है. बाद में राजा मुकुटमणी देव हुए जिन्होंने 16 वीं सदी (1512 ईस्वी) में घाटी के ऊपर किले का निर्माण करवाया था. 17 वीं सदी तक किला मुगलों के अधीन रहा. बाद में मराठों व खांडेराव के अधीन चला गया. कोटा के शासक महाराव भीमसिंह ने इस किले को 1714 ईस्वी में तीस हजार रुपए में खरीद लिया. इतिहास से किले का अंतिम शासक नवल खांडेराव होने की जानकारी मिलती है.

सुरक्षा के लिए किले के चारों ओर 20 फीट ऊंचा परकोटा बना हुआ है. यूं तो यहां 1960 तक लोगों के रहने की जानकारी मिलती है. यहां के बुर्जग लोगों का कहना है कि उस समय यहां 56 हजार की बस्ती थी, जब कोटा में महज 56 घरों की बस्ती थी. 1961 से किला राज्य पुरातत्व विभाग के अधीन है. यह 400 बीघा में वन विभाग की भूमि पर फैला हुआ है. किले के बुर्जो पर तोपों रखी हुई है. पूर्व में यहां लगभग 10 तोपों थी.

वहीं, साल 2010 में मुख्य सचिव एस अहमद के आदेश पर मनरेगा के तहत यहां साफ-सफाई करवाई गई. इस दौरान यहां 6 तोपें थीं. बाद में कुछ तोपों को बारां कलेक्ट्रेट में भिजवा दिया गया.  यहां राज्य की दूसरी सबसे बड़ी तोप नवल वान है (सबसे बड़ी जयवाण है जो जयपुर में है). यह तोप किले के बुर्ज पर रखी हुई है. कहते हैं कि इस तोप को दोनों ओर से नापने में अंतर आता है. सुरक्षा व निगरानी के अभाव में यहां रखी तोपों से समाज कंटकों द्वारा लोहा चोरी किया जा रहा है. लोहा चोरी के चलते किले में बने बड़े दरवाजे भी क्षतिग्रस्त हो गए है. 

यहां तक कि यहां से मिले अवशेषों से प्राचीन मंदिरों होने की जानकारी मिलती है. यहां लक्ष्मण मंदिर के साथ दो अन्य मंदिर होने के प्रमाण मिले हैं. इसके अलावा हनुमान जी की एक विशाल मूर्ति भी मिली है जो अब कस्बे के तहसील कार्यालय में बने मंदिर में स्थापित है. हनुमान जी के पुत्र मकरद्वज की मूर्ति अभी भी किले में है. आनंदी माता का मंदिर भी यहां बना हुआ है. 

इसके अलावा और भी मंदिर यहां थे लेकिन अब खंडर बन गए है, सिर्फ कहने के लिए मंदिर है. बाकि तो संरक्षण के अभाव में खंडर के अलावा और कुछ नहीं है. किले में बना पुराना तहसील कार्यालय यहां की प्रशासनिक व्यवस्था को बयान करता है. किले में राजा-रानियों के महल, बावड़ियां, क्षार बाग आदि कई प्राचीन स्थल है जिसे जानवरों ने इसे अपना आश्रयस्थल बना लिया है. रख-रखाव के अभाव में सब कुछ नष्ट होते जा रहे है. हालांकि, किले की लोकप्रियता ऐसी है कि यहां सैलानियों का तांता लगा रहता है. 

वहीं, बारिश के मौसम में स्थानीय लोग किले की प्राकृतिक सौंदर्य का लुप्त उठाते है. उन दिनों में वनों की हरियाली किले के प्राकृतिक सौंदर्य में चार चांद लगा देती है. स्कूली बच्चों के लिए किला आज भी पिकनिक स्थल है. किले के नीचे की ओर प्राकृतिक स्थल कुंडा खो व माधो खो है. पहाड़ को काटकर कुंड तक पहुंचने के लिए एक सकरा रास्ता है. रास्ते में चट्टानों से घिरा हुआ भगवान गणेश जी का मंदिर है. पहाड़ों के बीचों बीच नीचे एक प्राकृतिक कुंड बना हुआ है जो काफी गहरा है. कुंड के पास गौ मुख व भगवान शंकर का छोटा सा एक प्राचीन मंदिर है. गौ मुख से 12 माह पानी बहता है जो शिवलिंग पर गिरता है. 

अभी भी कई महल, छतरियां, भवन, बावड़ियों को जीर्णाद्धार कर किले के सौंदर्य को निखार सकते है, फिर भी किला उपेक्षा का शिकार हो रहा है. किला पुरातत्व विभाग के अधीन है लेकिन वन विभाग की भूमि पर बना हुआ है. अब यह देखने वाली बात ये होगी कि शाहाबाद के इस इतिहासिक किलें पर प्रशासन कब ध्यान देते है और कब इस किले को पहचान मिल पाती है.