फिर उठी मांग, Rajasthan की तरह पूरे देश में मिले 'दिव्यांगों को सत्ता में भागीदारी'

राजस्थान देश का ऐसा पहला राज्य है, जहां दिव्यांग जनों को राजनीति में आरक्षण मिला. राजस्थान के अलावा ऐसा कोई राज्य नहीं है, जहां पर दिव्यांग जनों को राजनीति में भागीदारी मिले. 

फिर उठी मांग, Rajasthan की तरह पूरे देश में मिले 'दिव्यांगों को सत्ता में भागीदारी'
प्रतीकात्मक तस्वीर.

Jaipur: राजस्थान (Rajasthan) में दिव्यांग जनों को सत्ता में भागीदारी मिलने के बाद में अब पूरे देश में यह मांग उठने लगी है कि सभी राज्यों में दिव्यांग जनों को राजनीति (Politics) में भागीदारी मिलनी चाहिए. 

यह भी पढ़ें- Rajasthan में दिव्यांगों की स्कूटी वितरण योजना पर विवाद, आयु सीमा को लेकर संग्राम

देश में राजस्थान पहला ऐसा राज्य है, जहां दिव्यांग जनों को सत्ता में भागीदारी मिली राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार (Ashok Gehlot Government) ने दिव्यांग जनों को शहरी और और ग्रामीण राजनीति में सीधी नियुक्तियां देकर ऐतिहासिक कदम बढ़ाया है लेकिन अब दूसरे राज्यों में भी इस व्यवस्था को लागू करने की मांग तेजी से आगे बढ़ रही है. 

यह भी पढ़ें- गहलोत सरकार का क्रांतिकारी कदम, राजस्थान की सत्ता में दिव्यांगों की भागीदारी पक्की

राजस्थान देश का ऐसा पहला राज्य है, जहां दिव्यांग जनों को राजनीति में आरक्षण मिला. राजस्थान के अलावा ऐसा कोई राज्य नहीं है जहां पर दिव्यांग जनों को राजनीति में भागीदारी मिले. इसीलिए अब यह मांग तेजी से आगे बढ़ रही है कि पूरे देश में दिव्यांग जनों को समान दर्जा दिया जाए.

क्या कहना है दिव्यांगजन अधिकार महासंघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का
दिव्यांगजन अधिकार महासंघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हेमंत भाई गोयल (Hemant Bhai Goyal) ने केंद्रीय दिव्यांगजन आयुक्त को पत्र लिखकर यह मांग की है कि विधानसभा, पंचायती राज और निकाय चुनाव में जब एससी एसटी ओबीसी महिला वर्ग को आरक्षण दिया जा सकता है तो दिव्यांग जनों को इस व्यवस्था से क्यों दूर रखा जा रहा है. इसलिए देश में दिव्यांगों को समान दर्जा देते हुए यह व्यवस्था करनी चाहिए.

पूर्ण भागीदारी देने की मंशा अभी भी दूर की कौड़ी साबित हो रही
दिव्यांगजनों के अधिकारों के लिए चिंता और चिंतन रखते हैं लेकिन संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा पारित प्रस्तावों और दिव्यांग अधिकार अधिनियम के परिप्रेक्ष्य में हम चिंतन करें तो हमें दिव्यांग कल्याण से निकलकर दिव्यांग सबलीकरण की तरफ शिफ्ट होने की महती आवश्यकता है. दिव्यांगजनों को समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी देने की मंशा अभी भी दूर की कौड़ी साबित हो रही है.

देशभर में मिले दिव्यांगों को राजनीति में भागीदारी
देशभर की प्रत्येक ग्राम पंचायत पंचायत समिति जिला परिषद और नगर पालिका नगर परिषद नगर निगम में एक दिव्यांग महिला और एक दिव्यांग पुरुष को बतौर पार्षद मनोनीत करने का निर्णय राष्ट्रीय स्तर पर किया जाए, क्योंकि निर्वाचन के तहत संपादित प्रकिया में पंचायती राज, शहरी निकायों के लिए निर्वाचित होने वाले दिव्यांगजनों की संख्या समूचे देश में लगभग शून्य है. कम से कम स्थानीय सत्ता में तो दिव्यांगजनों को मनोनीत कर सत्ता में भागीदारी दी जानी चाहिए. छत्तीसगढ़ सरकार ने पंचायती राज अधिनियम में संशोधन कर हरेक ग्राम पंचायत में दो दिव्यांग को मनोनीत करने का फैसला किया है.

राजस्थान में ये व्यवस्था
राजस्थान सरकार (Rajasthan Government) ने प्रदेश की प्रत्येक नगरपालिका बोर्ड, नगरपरिषद एवं नगर निगम में एक दिव्यांग व्यक्ति को पार्षद मनोनीत करने का कानून बनाया है और सभी शहरी निकायों में दिव्यांग पार्षद मनोनीत किए जा रहे हैं. यदि भारत सरकार के स्तर पर इस विषय में कोई मजबूत निर्णय लिया जाता है तो स्थानीय सत्ता में दिव्यांगजनों को सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित हो सकती है. 

भारत सरकार (Indian Government) के स्तर पर इस विषय में निर्णय लिया जाता है तो दिव्यांग संगठनों को अलग-अलग प्रदेश में अलग-अलग मांग करने की आवश्यकता नहीं होगी. दिव्यांग अधिकार अधिनियम 2016 के प्रावधानों एंव  राष्ट्र महासभा द्वारा पारित प्रस्तावों के अनुसार दिव्यांगजनों को भी अन्य व्यक्तियों के समान समता, गरिमा के साथ जीवन के और उसकी सत्यनिष्ठा के लिए सम्मान के अधिकार का उपभोग करने का विषय शामिल है.