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कोटा में भगवान जगन्नाथ हुए बीमार, जड़ी-बूटियों से हो रहा इलाज

पूर्णिमा के दिन स्नान के बाद आम के रस का सेवन करने से कोटा के रामपुरा के जगदीश मंदिर में भगवान जगन्नाथ बीमार हो गए हैं. वैध उनका इलाज कर रहे हैं. 

कोटा में भगवान जगन्नाथ हुए बीमार, जड़ी-बूटियों से हो रहा इलाज
12 जुलाई को भगवान का शयनकाल पूरा होगा.

कोटा: राजस्थान के कोटा में बीमार भगवान हो गए हैं. भगवान का इलाज चल रहा है. वैधजी भगवान का इलाज लौंग तुलसी और जड़ी बूटियों से कर रहे हैं. भगवान शयनकाल में हैं. यहां तक कि भगवान जगन्नाथ डिस्टर्व न हो इसके लिए मंदिर की घंटियों को भी कपड़ो से बांध दिया गया है. अब अगले 15 तक भगवान भगवान का विश्राम करेंगे भगवन का इलाज चलेगा.

पूर्णिमा के दिन स्नान के बाद आम के रस का सेवन करने से कोटा के रामपुरा के जगदीश मंदिर में भगवान जगन्नाथ बीमार हो गए हैं. वैध उनका इलाज कर रहे हैं. भगवान डिस्टर्ब न हो इसके लिए मंदिर की घंटियों को कपड़ों से ढक दिया है. शोर-शराबे पर प्रतिबंध लगा है. भक्तजन मंदिर में तेज आवाज में बातें भी नहीं कर सके दरअसल ये सब परंपरा का हिस्सा है. 

ये 15 दिन भगवान एकांत में रहेंगे. इन दिनों में न तो मंदिर में पट खुलेंगे और न ही किसी तरह की कोई पूजा अर्चना होती 15 दिन बाद स्वस्थ होने पर मंदिर में आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा के दिन यानी 12 जुलाई को भगवान् सोलह कलाओ से परिपूर्ण विशेष दर्शन 15 मिनिट के लिए होंगे 13 जुलाई को पंचामृत स्नान ,शुद्दिकरण और हवन होगा 14 जुलाई को भगवान को चंदन रथ में विराजित कर रथयात्रा निकाली जाएगी.  

आदिकाल से चल रही है परंपरा, बच्चों की तरह होती है भगवान की सेवा, वेद, उपनिषदों के अनुसार यह परंपरा आदि-अनादिकाल से चल रही है. भगवान जगन्नाथ को सृष्टि का पालनहार भी कहा है. भगवान जब थक जाते हैं तो उन्हें आराम की जरूरत होती है. इस दौरान इनकी बच्चों की तरह सेवा होती है. 15 दिन बाद 12 जुलाई को भगवान के सिंहद्वार में विराजित के दर्शन देंगे.

मंदिर के महंत  ने बताया कि पुरी के जगन्नाथ की तरह कोटा में भी लंबे समय से यह परंपरा चल रही है. पहले दिन 5 मिनट नेत्र उत्सव, दूसरे दिन हवन और तीसरे दिन मंदिर में रथयात्रा निकलेगी. भगवान को सुबह-शाम ठंडा दूध और सूखे मेवे का भोग लगाया जा रहा है. यहां पर  भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की नीम के तने से बनी मूर्तियां जगन्नाथपुरी से लाई गई है. बता दें कि 12 जुलाई को भगवान का शयनकाल पूरा होगा और फिर शुरू होगा उत्सव.