जयपुर के गोविंददेवजी मंदिर में बरसा अबीर-गुलाल और फूलों के बीच प्रेमरस

आराध्यदेव गोविंददेवजी मंदिर में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की ऐसी अनूठी छटा बिखरी कि मौजूद दर्शक अपलक ही इन दृश्यों को निहारते रह गए.

जयपुर के गोविंददेवजी मंदिर में बरसा अबीर-गुलाल और फूलों के बीच प्रेमरस
मंदिर से जुड़े श्रद्धालु कहते हैं यह ढाई सौ साल से भी ज्यादा पुरानी परंपरा है

दीपक गोयल/जयपुर: छोटी काशी कही जाने वाली पिंकसिटी के आराध्यदेव गोविंददेवजी मंदिर इन दिनों बृजधाम जैसी छटा नजर आने लगा है. होली के मौके पर गोविंददेवजी मंदिर में अबीर गुलाल और फूलों के बीच ऐसा प्रेमरस बरसा कि श्रद्धालु श्याम रंग में सराबोर हो गए. 'नंदलाला मोय बिगार गयो री, अति की शर्मिली गोरी रंग में ऐसी बोरी' जैसे गीतों के बीच जब रंग व गुलाल के साथ फूल बरसाए गए तो श्रद्धालु भक्ति के रंग में रंग गए.

आराध्यदेव गोविंददेवजी मंदिर में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की ऐसी अनूठी छटा बिखरी कि मौजूद दर्शक अपलक ही इन दृश्यों को निहारते रह गए. चाहे मयूर नृत्य हो या दीपक नृत्य, चरकुला हो या घड़ा नृत्य, रसिया गायन पर ब्रज का मनोहारी नृत्य हो या होली की हंसी ठिठोली, सभी ने दर्शकों को लगभग तीन घंटे तक एक ही स्थान कैद कर रखा. अंत में फूलों की होली हुई तो ठाकुरजी का आशीर्वाद लेने की होड़ लग गई. कलाप्रेमियों और कलाकारों के समूहों की एक के बाद एक प्रस्तुति दी. 

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गोविंददेवजी मंदिर में 'हो-हो.. होरी है, नंदगांव को छोरा और बरसाने की छोरी है', 'उड़त गुलाल लाल भये बदरा' आदि गीतों के साथ होली की रंगीली छटा नजर आई. जब भक्तों ने भगवन के साथ फूलों की होली खेली तो मंदिर की छटा इंद्रधनुषी हो गई. रोज़ अलग-अलग कलाकार अपने फ़न का मुज़ाहिरा कर अपने प्रिय कान्हा के साथ होली खेलने का चित्रण करते हैं.

वैसे कान्हा का वृन्दावन तो जयपुर से दूर है मगर गोविंद देव मंदिर में जब फाग उत्सव का आयोजन किया गया तो वहां बरसाना भी था. मंदिर से जुड़े श्रद्धालु कहते हैं यह ढाई सौ साल से भी ज्यादा पुरानी परंपरा है और रियासत काल से चली आ रही है. ठाकुर जी (भगवान) को रिझाने के लिए फाग उत्सव शुरू किया गया था जो अब भी जारी है. गोविंददेवजी मंदिर में फागोत्सव में राज्य भर के करीब तीन सौ कलाकार अपनी कला का भक्ति भाव से प्रदर्शन करते हैं. इसमें जात-पात या मजहब का कोई सवाल नहीं है.

श्रद्धालुओं की माने तो कई मुस्लिम कलाकार भी इसमे भाग लेते हैं. वहीं मुस्लिम कलाकार ने कहा कि इबादत में क्यों फर्क किया जाए. हम पीढ़ियों से इससे जुड़े है. गोविंद के दरबार में आते हैं और अपने साज से इबादत करने वालों का साथ देते हैं. कलाकार कहते हैं यह भगवान की बंदगी है यह समर्पण है. हमने जो कुछ भी सीखा है, उसे इश्वर के चरणों में समर्पित कर दिया. कृष्ण कथानक और होली का गहरा रिश्ता है. कत्थक और गोविंद देव अलग-अलग नहीं हैं. श्रीकृष्ण को कत्थक का आराध्य देव मना जाता है. होली आती है तो कृष्ण को याद किया जाता है.

बहरहाल, परंपरा बहुत पुरानी है. लोग शिव को भी रंग-गुलाल चढ़ाते हैं लेकिन कृष्ण को लोग सखा मानते है. उनके साथ लोग होली खेलते हैं. जब से रंग की शुरुआत हुई है. तब से मुस्लिम कलाकार आते हैं, फाग गाते हैं. गोविंददेव जी मंदिर का फाग उत्सव नेक इबादत का समागम था न कोई मजहब-मिल्लत या धर्म-संप्रदाय की श्रेष्ठता का सवाल उठा और न किसी ने पूछा की ख़ुदा बड़ा है या भगवान.