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रानी लक्ष्‍मीबाई के ल‍िए लड़ा था व‍िदेशी वकील, वही याच‍िका PM मोदी ने दी थी ऑस्‍ट्रेलियाई प्रधानमंत्री को

1857 में रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध लड़ा था. भारत के स्वतंत्रता संग्राम का ये पहला युद्ध माना जाता है. उसी युग में हम वापस चलें तो इस युद्ध से 3 साल पहले रानी लक्ष्मीबाई ने ब्रिटिश कंपनी ईस्ट इंडिया के खिलाफ लड़ने के लिए एक ऑस्ट्रेलियाई वकील को नियुक्त किया था.

रानी लक्ष्‍मीबाई के ल‍िए लड़ा था व‍िदेशी वकील, वही याच‍िका PM मोदी ने दी थी ऑस्‍ट्रेलियाई प्रधानमंत्री को

नई दिल्‍ली : रानी लक्ष्‍मीबाई के जीवन पर आधारित फिल्म‍ मणि‍कर्ण‍िका सुनहरे पर्दे पर आ चुकी है. कंगना रणौत के अभिनय से सजी इस फिल्म को हर वर्ग के लोगों का प्यार मिल रहा है. 1857 में रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध लड़ा था. भारत के स्वतंत्रता संग्राम का ये पहला युद्ध माना जाता है. उसी युग में हम वापस चलें तो इस युद्ध से 3 साल पहले रानी लक्ष्मीबाई ने ब्रिटिश कंपनी ईस्ट इंडिया के खिलाफ लड़ने के लिए एक ऑस्ट्रेलियाई वकील को नियुक्त किया था.

जॉन लांग ने 1854 में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के वकील के रूप में काम किया और ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ कानूनी लड़ाई में रानी लक्ष्मीबाई का प्रतिनिधित्व किया. हालांकि इस लड़ाई में वह रानी लक्ष्मीबाई को कानूनी तौर पर जीत नहीं दिला सके. जैसे ही लांग ने ये याचिका दाखिल की. 7 दिन में ब्रिटिशर्स ने इस याचिका को खारिज कर दिया.

2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर गए तो उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई पीएम टोनी एबॉट को रानी लक्ष्मीबाई की ओर से ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ लिखी ऑस्ट्रेलियाई वकील जॉन लांग की वही याचिका भेंट की. मोदी ने इसे द्विपक्षीय वार्ता से ठीक पहले एबॉट को भेंट किया. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैय्यद अकबरूद्दीन ने ट्वीट किया, 'प्रधानमंत्री ने ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री को ऑस्ट्रेलियाई जॉन लांग द्वारा झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की ओर से ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ 1854 में लिखी याचिका की मूल प्रति भेंट की.

मोदी की ओर से एबॉट को दिए गए इस उपहार के जरिये भारतीय इतिहास में जॉन लांग का योगदान दिखाई देता है. लांग का जन्म 1816 में सिडनी में हुआ था और उन्हें ऑस्ट्रेलिया का पहला मूल उपन्यासकार माना जाता है. 

लांग 1842 में भारत गए और उसे अपना घर बना लिया. उन्होंने भारतीय भाषा सीखी और वकालत के पेशे को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया. उन्होंने मेरठ से ‘द मुफस्सीलाइट’ और बाद में मसूरी से भी अखबार भी शुरू किया. इस अखबार में ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों की आलोचना भी होती थी जिसके लिए उन्हें कुछ समय के लिए जेल में भी रहना पड़ा.