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20 लाख पेंसिल बनाने में चढ़ती है 8 लाख पेड़ों की बलि, सामने आई रद्दी से बनी ईको-फ्रेंडली पेंसिल

वे लोग 6000 रद्दी अखबारों से 10000 पेंसिल (pencil) बना रहे हैं. इन पेंसिल (pencil) को बनाने के लिए उन्हें किसी पेड़ को काटने की जरूरत नहीं पड़ती बल्कि पढ़ने के बाद कबाड़ी में बेच दिये गए अखबार (News Paper) इस कमी को पूरा कर रहे हैं.

20 लाख पेंसिल बनाने में चढ़ती है 8 लाख पेड़ों की बलि, सामने आई रद्दी से बनी ईको-फ्रेंडली पेंसिल
इको फ्रेंडली ये पेंसिल (pencil) आम पेंसिल (pencil) की ही तरह है

बेंगलुरु: क्या आप जानते हैं कि एक साल में सिर्फ 20 लाख पेंसिल (pencil) बनाने के लिए 8 लाख पेड़ों को काट दिया जाता है. हम हमेशा पर्यावरण को बचाने की बात करते हैं पर यदि हम अपनी तरफ से पेड़ों को बचाने के लिए कुछ न करें तो ये बातें सिर्फ बातों तक ही सीमित लगती हैं. बेंगलुरु (Bengaluru) के एक पढ़े-लिखे जोड़े (अक्षिता और राहुल) ने इस दिशा में बहुत ही सफल प्रयास किए हैं. वे रद्दी अखबारों से पेंसिल (pencil) बना रहे हैं.

आपको बता दें कि वे लोग 6000 रद्दी अखबारों से 10000 पेंसिल (pencil) बना रहे हैं. इन पेंसिल (pencil) को बनाने के लिए उन्हें किसी पेड़ को काटने की जरूरत नहीं पड़ती बल्कि पढ़ने के बाद कबाड़ी में बेच दिये गए अखबार (News Paper) इस कमी को पूरा कर रहे हैं. पेड़ों को काटने के बजाए ये जोड़ा लोगों को ईको फ्रेंडली प्रोडक्ट्स के लिए जागरुक बना रहा है. इसके साथ ही इस बात का भी ख्याल रख रहा है कि प्रोडक्ट्स पॉकेट फ्रेंडली भी हों. वे लोगों को अधिक से अधिक पेड़ (tree) लगाने के लिए भी प्रेरित कर रहे हैं.

एक अच्छा वक्त इंडोनेशिया में बिता कर जब ये जोड़ा भारत (India) लौटा तो पाया कि देश में पर्यावरण को लेकर जागरुकता तो खासी है पर इस दिशा में व्यवहारिक तरीके के प्रयासों की कमी है. ऐसे में दोनों ने तय किया कि वो इस दिशा में कोशिश करेंगे. जल्दी ही कुछ रिसर्च के बाद उन्हें शुरुआत की प्रेरणा भी मिल गई. जिसके तहत वे कुछ ऐसी चीज़ें बना सकते थे जो रोजाना के तौर पर इस्तेमाल में आती हैं और सीधे तौर पर जिनका असर पर्यावरण की सुरक्षा पर पड़ता हो.

रद्दी अखबार से पेंसिल (pencil) का निर्माण इसी दिशा की पहल है. बेंगलुरु से लगभग 350 किलोमीटर दूर धाड़वार में मशीनें लगाई गईं और पेन्सिल बनाने का काम शुरू हुआ. आप इसे एक व्यवसाय कह सकते हैं पर अक्षिता कहती हैं कि उनकी ये कोशिश एक संस्थान है. वो चीज़ों को छुपाती नहीं बल्कि चाहती हैं कि इस दिशा में और लोग भी आगे आएं और जुड़ें. धीरे-धीरे वे सारी चीज़ें खत्म हो जाएं जो हमारे पर्यावरण (environment) को प्रभावित करती हैं. उनकी जगह हमें उन साधनों को अपनाना होगा जो किसी तरह का खतरा पैदा ना करें, साथ में वो हमें महंगी भी ना लगें. शुरुआत में अपने प्रोडक्ट के प्रति लोगों को समझाने में थोड़ा वक्त जरूर लगा पर एक बार इस्तेमाल के बाद इसकी मांग बढ़ती जा रही है. राहुल और अक्षिता दोनों ही चाहते हैं कि निर्माण या व्यवसाय कोई भी करे पर जब पेंसिल (pencil) की लकड़ी का सब्स्टीट्यूट मौजूद है तो लकड़ी का इस्तेमाल बिल्कुल बंद हो जाना चाहिए.

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इको फ्रेंडली ये पेंसिल (pencil) आम पेंसिल (pencil) की ही तरह है और हर तरह की है. आम इस्तेमाल आने वाली से लेकर ड्राइंग करने के लिए, साथ ही बच्चों की पसंदीदा रंगीन पेंसिल (pencil) भी. पेंसिल (pencil) के अलावा  वे ऐसी कई वस्तुओं का भी निर्माण कर रहे हैं जो रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल में आती हैं जैसे रिसायकल पेपर से बने झोले, शगुन देने के लिए रिसायकल पेपर के लिफाफे और हर अवसर पर दिए जाने वाले ग्रीटिंग और वेडिंग कार्ड. राहुल धाड़वार की फैक्ट्री संभालते हैं जबकि अक्षिता घर के एक छोटे से कमरे में बैठ कर ऑनलाइन मिलने वाले ऑर्डर को भिजवाने का काम देखती हैं. धीरे-धीरे मांग बढ़ रही है. इन सामग्रियों को खास पसंद किया जा रहा है. उत्साह से भरा ये जोड़ा बहुत आशावान है. उम्मीद है कि एक के बाद एक अल्टरनेटिव ढूंढते हुए एक दिन ऐसा आएगा जब इस्तेमाल में आने वाली हर चीज़ें इको फ्रेंडली होंगी.

प्रधानमंत्री मोदी (PM Modi) से खासी प्रभावित अक्षिता के मुताबिक मोदी जैसी शख्सियत जब इन विषयों पर गंभीर चर्चा करते हैं तो लोग भी इसके प्रति गंभीर होते हैं. वक़्त है जब युवाओं को आगे आना होगा और कोशिशें करनी होंगी क्योंकि बातें बहुत हो चुकीं अब पहल की जरूरत है.