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जैसलमेर: कांगो फीवर से युवक की मौत के बाद हटार गांव पहुंची डॉक्टर की टीम

सीएमएचओ डॉ. बीके बारूपाल ने बताया कि लोकेश का उपचार जैसलमेर में चलने के बाद उसे जोधपुर रेफर किया गया था. एम्स में पिछले 10 दिन से उसका इलाज किया जा रहा था.

जैसलमेर: कांगो फीवर से युवक की मौत के बाद हटार गांव पहुंची डॉक्टर की टीम
स्वास्थ्य विभाग की टीम ने हटार गांव पहुंचकर आवश्यक कार्रवाई शुरू कर दी है.

जैसलमेर: जोधपुर में कांगो फीवर का उपचार करवाने के दौरान दम तोड़ने वाले युवक का अंतिम संस्कार हटार गांव में भय के माहौल में किया गया. गौरतलब है कि जिला मुख्यालय से करीब 100 किलोमीटर दूर हटार गांव निवासी लोकेश (18) पुत्र बूटाराम मेघवाल का उपचार जोधपुर के एम्स में चल रहा था. वह कांगो फीवर की चपेट में आ गया था. चिकित्सकों के प्रयासों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका. उसके शव को लेकर परिवारजन बुधवार दोपहर बाद हटार गांव पहुंचे. जहां उसका अंतिम संस्कार किया गया. 

उपचार के लिए पहुंची टीम
सीएमएचओ डॉ. बीके बारूपाल ने बताया कि लोकेश का उपचार जैसलमेर में चलने के बाद उसे जोधपुर रेफर किया गया था. एम्स में पिछले 10 दिन से उसका इलाज किया जा रहा था. लोकेश के कांगो फीवर की चपेट में आकर दम तोड़ने की सूचना के बाद चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की टीम ने हटार गांव पहुंचकर आवश्यक कार्रवाई शुरू कर दी है. विशेषज्ञों के मुताबिक यह रोग जानवरों के माध्यम से इंसानों में पहुंचता है, लिहाजा पशुपालन विभाग की टीम भी हटार भेजी गई है.

एक अन्य जानकारी के अनुसार जोधपुर के एम्स में ही लोकेश के दो परिजनों में कांगो के लक्षण पाए जाने के बाद उपचार किया जा रहा है. ऐसे ही वहां एक रेजिडेंट डॉक्टर व एक अन्य में भी लक्षण पाए जाने की जानकारी है. गौरतलब है कि लोकेश के कांगो फीवर होने की पॉजिटिव रिपोर्ट मंगलवार शाम को ही एम्स को प्राप्त हुई थी और मध्यरात्रि करीब पौने 12 बजे उसने दम तोड़ दिया.

परजीवी है रोग का वाहक
गौरतलब है कि क्रीमियन-कांगो हेमोरेजिक फीवर (सीसीएचएफ) का पहला मामला वर्ष 2014 में जोधपुर में मिला था. जिसमें एक निजी अस्पताल में कार्यरत नॄसग स्टाफ की मौत हो गई थी. पशुओं के साथ रहने वालों को कांगो फीवर का खतरा अधिक होता है.पशुओं की चमड़ी से चिपके रहने वाला 'हिमोरल' नामक परजीवी इस रोग का वाहक है. 

कांगो फीवर से संक्रमित होने पर बुखार के एहसास के साथ शरीर की मांसपेशियों में दर्द, चक्कर आना और सिर में दर्द, आंखों में जलन तथा रोशनी से डर जैसे लक्षण पाए जाते हैं. कुछ लोगों को पीठ में दर्द और मितली होती है और गला बैठ जाता है. चिकित्सकों के मुताबिक इस बीमारी से बचने के लिए पशुओं के बाड़े को साफ सुथरा रखना चाहिए. आसपास पानी नहीं जमा होने देना चाहिए. इसके अलावा बुखार आते ही जांच करानी चाहिए.

ऐसे जुड़ा कांगो
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह संक्रमण अफ्रीका, यूरोप और एशिया के कई देशों में पाया जाता है. वर्ष 2001 के दौरान कोसोवो, अल्बानिया, ईरान, पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका में इसके कई मामले पाए गए थे. इस संक्रमण के लक्षण सबसे पहले वर्ष 1944 में क्रिमिया में सामने आए थे. 1969 में यह पाया गया कि कांगो में भी इसी तरह का संक्रमण फैला था और इसीलिए इस वायरस को क्रिमियन कांगो वायरस के नाम से जाना जाता है.