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ZEE जानकारीः आर्टिकल 370 और 35A के हटने से नहीं खत्म होगा भारत और जम्मू कश्मीर का रिश्ता

भारत के संविधान के Article 356 के तहत जम्मू कश्मीर में राष्ट्रपति शासन भी लगाया जा सकता है. इस वक्त भी जम्मू कश्मीर में राज्यपाल का शासन है जो एक तरह से केंद्र का प्रतिनिधि हैं. 

ZEE जानकारीः आर्टिकल 370 और 35A के हटने से नहीं खत्म होगा भारत और जम्मू कश्मीर का रिश्ता

कश्मीर के कई बुद्धिजीवी भी इसी तरह की बातें करते हैं लेकिन इन लोगों को ये बात Note करनी चाहिए कि Article 370 से भी पहले, कश्मीर की रियासत और भारत सरकार के बीच एक विलय पत्र पर समझौता हुआ था. ये समझौता कश्मीर के राजा हरि सिंह और भारत सरकार के बीच हुआ था. इस समझौते के तहत कश्मीर की रक्षा की ज़िम्मेदारी भारत सरकार को दी गई थी. जम्मू कश्मीर.. भारत का अभिन्न अंग है और Article 370 और 35 A के हट जाने से भारत और जम्मू-कश्मीर का रिश्ता खत्म नहीं हो सकता. 

भारत के संविधान के Article 356 के तहत जम्मू कश्मीर में राष्ट्रपति शासन भी लगाया जा सकता है. इस वक्त भी जम्मू कश्मीर में राज्यपाल का शासन है जो एक तरह से केंद्र का प्रतिनिधि हैं. अब आपको ये समझना चाहिए कि Article 35 A और Article 370 की ज़रूरत क्यों महसूस की गई? वर्ष 1947 में जब भारत और पाकिस्तान को आज़ादी मिली तब देश में 565 से ज़्यादा राजा-रजवाड़े और रियासतें थीं. अंग्रेज़ों ने इन सभी को ये छूट दी थी कि वो भारत या पाकिस्तान में से किसी एक देश को चुन सकते हैं. 

उस वक्त कश्मीर रियासत के राजा हरि सिंह थे. वो एक बड़ी मुस्लिम आबादी वाले राज्य के राजा थे. आज़ादी से पहले वर्ष 1941 के आंकड़ों के मुताबिक जम्मू और कश्मीर में मुसलमानों की आबादी 72.4 प्रतिशत थी जबकि हिंदुओं की आबादी 25 प्रतिशत थी. कश्मीर की रियासत, भारत और पाकिस्तान के बीच में थी. एक तरफ कश्मीर पर पाकिस्तान के हमले और कब्ज़े का भय था और दूसरी तरफ महाराजा हरि सिंह की महात्वाकांक्षा थी. राजा हरि सिंह, कश्मीर को Switzerland जैसा एक अलग देश बनाने का ख्वाब देख रहे थे. 

लेकिन अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान की मदद से काबायलियों ने कश्मीर पर हमला बोल दिया. महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद की अपील की. भारत सरकार ने विलय की शर्त रखी. महाराजा हरि सिंह ने इस शर्त को मान लिया और विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए. लेकिन ये विलय भी शर्तों के साथ किया गया था. जम्मू कश्मीर सिर्फ रक्षा, विदेशी मामले और दूरसंचार के मामलों में ही भारत सरकार के हस्तक्षेप के लिए राज़ी हुआ.
कश्मीर में एक पक्ष, कश्मीर के नेता शेख अब्दुल्ला का भी था. शेख अब्दुल्ला जम्मू कश्मीर के लोकप्रिय नेता थे. खास तौर पर उन्हें जम्मू कश्मीर के मुसलमानों का समर्थन हासिल था. 

मार्च 1948 में महाराजा हरि सिंह ने शेख अब्दुल्ला को कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया. उस वक्त भारत के संविधान का एक Draft तैयार हो रहा था. शेख अब्दुल्ला को भी संविधान का प्रारूप तैयार कर रही इस संविधान सभा में शामिल किया गया. संविधान सभा में कश्मीर पर लंबी बहस हुई. जिसके बाद ये निष्कर्ष निकाला गया कि संविधान के Article 370 के तहत जम्मू कश्मीर को Special Status दिया जाएगा. Article 370 की ज़रूरत क्यों पड़ी? इसकी एक बड़ी वजह थी. पंडित जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला बहुत अच्छे दोस्त थे. शेख अब्दुल्ला पर पंडित जवाहर लाल नेहरू का अच्छा प्रभाव था. लोग ये भी कहते थे कि कश्मीर घाटी में शेख अब्दुल्ला, पंडित नेहरू के आदमी हैं. 

इतिहास के कई विद्वानों का ये मानना है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू इस बात को लेकर काफी भावुक थे कि कश्मीर एक मुस्लिम बहुल इलाका है इसके बाद भी वो भारत में शामिल होना चाहता है. इसलिए कश्मीर को Special Status दिया जाना चाहिए ताकि कश्मीर के मुसलमानों को सुरक्षा महसूस हो. Article 370 के मूल में पंडित जवाहर लाल नेहरू की यही भावना थी. जिसे प्रबल करने का काम उनके राजनीतिक दोस्त शेख अब्दुल्ला ने किया था. उस वक्त भी बहुत सारे दक्षिण पंथी लोगों ने पंडित जवाहर लाल नेहरू के इस कदम का विरोध किया था. 

संविधान का प्रारूप तैयार करने वाले भीम राव अंबेडकर भी कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के पक्ष में नहीं थे. नेहरू सरकार से उनके इस्तीफे की एक वजह ये भी मानी जाती है. लेकिन माना जाता है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू के सिर पर महात्मा गांधी का आशीर्वाद था और उन्हें चुनौती देने वाले लोगों की संख्या बहुत कम थी.

आज कश्मीर को लेकर जो विवाद और समस्या है, उसके पीछे एक बड़ी वजह है Article 370. आज़ादी के समय जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय करते वक्त Article 370 के जरिये कुछ विशेष अधिकार कश्मीर की जनता को दिये गये थे. जो आज तक लागू हैं...

Article 370 के अनुसार, भारत की संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में सिर्फ रक्षा..विदेश मामले और संचार से जुड़े कानून बनाने का अधिकार है. Article 370 की वजह से भारत के राष्ट्रपति के पास जम्मू-कश्मीर के संविधान को बर्ख़ास्त करने का अधिकार नहीं है. जम्मू-कश्मीर का राष्ट्रध्वज अलग होता है. जम्मू-कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्षों का होता है, जबकि भारत के अन्य राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है. जम्मू-कश्मीर के अन्दर भारत के राष्ट्रीय ध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान करना..अपराध नहीं माना जाता. Article 370 की वजह से कश्मीर में भारत का कोई भी कानून लागू नहीं होता. कश्मीर में रहने वाले हिन्दुओं और सिखों को नौकरियों में आरक्षण नहीं मिलता. जबकि हिंदुओं और सिखों की संख्या वहां कम है. और वो अल्पसंख्यक हैं. Article 370 की वजह से कश्मीर में बाहर के लोग ज़मीन नहीं खरीद सकते है.

Article 370 की वजह से जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है- एक जम्मू-कश्मीर की और दूसरी भारत की. जम्मू-कश्मीर में IPC यानी Indian Penal Code नहीं बल्कि RPC यानी Ranbir Penal Code लागू है. और तमाम कानूनी कार्रवाइयां.. RPC के आधार पर होती हैं. Article 370 के माध्यम से जम्मू कश्मीर को एक विशेष राजनैतिक ताकत दी गई. लेकिन जम्मू कश्मीर के स्थाई नागरिकों को ताकत देने के लिए Article 35 A की व्यवस्था की गई. 

Note करने वाली बात ये है कि Article 35 A के माध्यम से भी पंडित जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला की भावनाओं को संतुष्ट करने का प्रयास किया गया. क्योंकि Article 35 A, कश्मीर के जनसंख्या में मुसलमानों के प्रभावी अनुपात को सुरक्षित करने के लिए लाया गया था. संविधान के ये दोनों Article भारत की एकता और अखंडता पर एक घाव की तरह हैं. 14 मई 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने एक आदेश पारित किया था. इस आदेश के जरिए भारत के संविधान में एक नया अनुच्छेद 35 (A) जोड़ दिया गया.

आम तौर पर संविधान में कोई भी अनुच्छेद... संशोधन के ज़रिये ही जोड़ा जाता है. और इसके लिए संविधान में Article 368 का प्रावधान है. इसी Article का इस्तेमाल करके संसद संविधान में संशोधन कर सकती है. लेकिन Article 35-A के संबंध में ऐसा नहीं हुआ था. क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने इसे संसद के सामने नहीं रखा था, बल्कि सीधे राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने Presidential Order से इसे लागू कर दिया था. Article 35 A, Article 370 का ही हिस्सा है. Article 35 A के मुताबिक जम्मू कश्मीर का नागरिक तभी राज्य का हिस्सा माना जाएगा जब वो वहां पैदा हुआ हो. कोई भी दूसरा नागरिक जम्मू कश्मीर में ना तो संपत्ति खरीद सकता है और ना ही वहां का स्थायी नागरिक बनकर रह सकता है. 

तो फिर सवाल उठता है कि जम्मू कश्मीर का स्थायी नागरिक है कौन? 1956 में जम्मू कश्मीर का संविधान बना, और 1957 में इसे लागू किया गया. और इसमें स्थायी नागरिकता को परिभाषित किया गया है. जम्मू कश्मीर के संविधान के मुताबिक स्थायी नागरिक वो व्यक्ति है जो 14 मई, 1954 को राज्य का नागरिक रहा हो या फिर उससे पहले के 10 वर्षों से राज्य में रह रहा हो, और उसने वहां संपत्ति हासिल की हो. ये कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि जम्मू कश्मीर के अलगाववादी, देशभर में ज़मीनें खरीद सकते हैं, लेकिन देश का कोई नागरिक जम्मू कश्मीर में ज़मीन नहीं खरीद सकता है. 

Article 35A की वजह से जम्मू कश्मीर में पिछले कई दशकों से रहने वाले बहुत से लोगों को कोई भी अधिकार नहीं मिला है. 1947 में पश्चिमी पाकिस्तान को छोड़कर जम्मू में बसे हिंदू परिवार आज तक शरणार्थी हैं. एक आंकड़े के मुताबिक 1947 में जम्मू में 5 हज़ार 764 परिवार आकर बसे थे. जम्मू में आकर बसे इन परिवारों में 85% पिछड़ी जातियों से थे. इन परिवारों को आज तक कोई नागरिक अधिकार हासिल नहीं हैं. Article 35A की वजह से ये लोग सरकारी नौकरी भी हासिल नहीं कर सकते. और ना ही इन लोगों के बच्चे यहां व्यावसायिक शिक्षा देने वाले सरकारी संस्थानों में दाखिला ले सकते हैं. 

जम्मू-कश्मीर का गैर स्थायी नागरिक लोकसभा चुनावों में तो वोट दे सकता है, लेकिन वो राज्य के स्थानीय निकाय यानी पंचायत चुनावों में वोट नहीं दे सकता. Article 35 A के मुताबिक अगर जम्मू कश्मीर की कोई लड़की किसी बाहर के लड़के से शादी कर लेती है तो उसकी जम्मू कश्मीर की नागरिकता के तहत मिलने वाले सारे अधिकार खत्म हो जाते हैं. साथ ही उसके बच्चों के अधिकार भी खत्म हो जाते हैं. Article 370 और 35 A को लागू हुए अब 60 वर्ष से ज़्यादा हो चुके हैं . लेकिन इस Special Status से जम्मू-कश्मीर की समस्या और बड़ी हो गई है. इसलिए अब देश का एक बड़ा वर्ग इन्हें देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा मानता है. 

वर्ष 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई थी. जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर के मामले पर पंडित जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला की नीतियों का विरोध किया था. उन्होंने नारा दिया था कि एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान, नहीं चलेंगे. भारतीय जनसंघ ने Article 370 के खिलाफ पूरे देश में सभाएं कीं, रैलियां निकालीं और विरोध प्रदर्शन किए. वर्ष 1980 में भारतीय जनसंघ के नेताओं ने ही भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की. भारतीय जनता पार्टी भी भारतीय जनसंघ की तरह ही Article 370 को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध थी. यानी अगर देखा जाए तो Article 370 को खत्म करने का मुद्दा करीब कुल मिलाकर 68 वर्ष पुराना है . 

आज संविधान के इन दोनों Articles पर सबसे बड़ा सवाल ये है कि कश्मीर को Special Status का जो दर्जा दिया गया है वो स्थाई है या फिर अस्थाई. जम्मू कश्मीर की संविधान सभा भंग होने के बाद किसी Article का लागू रहना सही है या गलत? क्या Article 370 को हटाने के लिए लोकसभा में विधेयक Pass करना होगा. ऐसे ही कुछ सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में भी Case चल रहा है. सुप्रीम कोर्ट में इस मामले के दो पक्ष हैं... 

वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि लंबा वक्त गुज़र जाने की वजह से Article 370 एक स्थाई प्रावधान बन गया है. लेकिन इस मामले पर दूसरा विचार ये है कि Article 370, संविधान के भाग-21 के तहत एक प्रावधान है. जिसके शीर्ष में ही लिखा है कि ये अस्थाई प्रावधान है. इसका मतलब ये है कि Article 370 एक अस्थाई प्रावधान है जिसे हटाया जा सकता है. इस मामले में दूसरा सवाल ये है कि क्या जम्मू कश्मीर की संविधान सभा भंग होने के बाद Article 370 अपने आप ही खत्म हो जाना चाहिए था? 

इस पर एक पक्ष ये है कि 1957 में जम्मू कश्मीर में संविधान सभा भंग होने के साथ ही जम्मू कश्मीर में भारत के विलय की प्रक्रिया पूरी हो गई इसलिए अब Article 370 की ज़रूरत नहीं है. लेकिन दूसरे पक्ष का कहना है कि Article 370 को तभी खत्म किया जा सकता है जब एक नई संविधान सभा चुनी जाए और उसमें Article 370 को खत्म करने पर सहमति हो.