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ZEE Jankari: मुजफ्फरपुर जैसी त्रासदी मीडिया के लिए बिकाउ वस्तु बन चुकी हैं

यानी एक तरफ़ डॉक्टर को पब्लिक पीट रही है...और दूसरी तरफ़ नेताओं की धमकियां मिल रही हैं...और अगर डॉक्टर इनसे बच पाये...तो मीडिया उनके साथ बदसलूकी कर रही है. ये डॉक्टरों की मजबूरी और बच्चों की मौत पर गिद्ध मानसिकता वाली रिपोर्टिंग है.

ZEE Jankari: मुजफ्फरपुर जैसी त्रासदी मीडिया के लिए बिकाउ वस्तु बन चुकी हैं

आज हम DNA की शुरुआत पूरी दुनिया में बहुत चर्चित हुई एक तस्वीर से करेंगे...इस तस्वीर के लिये फोटोग्राफ़र को पत्रकारिता का बहुत सम्मानित अवार्ड दिया गया था...और आज इस तस्वीर में हमारे देश की मीडिया की झलक देखने को मिल रही है. ये तस्वीर वर्ष 1993 में अमेरिका के अख़बार The New York Times में छपी थी. ये तस्वीर दक्षिण अफ्रीका के फ़ोटो Journalist Kevin Carter ने सूडान में खींची थी. तब सूडान में अकाल पड़ा हुआ था और लोग भूख से मर रहे थे. इस तस्वीर में एक गिद्ध भूख से मर रही एक बच्ची के दम निकलने का इंतज़ार कर रहा है. इस तस्वीर के लिये Kevin Carter को पत्रकारिता का सबसे मशहूर पुरस्कार Pulitzer Prize मिला था. जब Kevin इस सम्मान का जश्न मना रहे थे और पूरी दुनिया में उनकी फ़ोटो की चर्चा हो रही थी. तब उनसे किसी ने सवाल किया था कि जब वो फोटो खींच रहे थे...तब वहां कितने गिद्ध थे. इस पर Kevin ने जवाब दिया 'एक'. इस पर सवाल पूछने वाले व्यक्ति ने कहा 'नहीं', वहां दो गिद्ध थे...और दूसरे गिद्ध आप थे...यानी Kevin Carter...जिन्होंने बच्ची को बचाने के बजाय फोटो लेने में समय लगाया.

Pulitzer Prize मिलने के तीन महीने बाद Kevin Carter ने आत्महत्या कर ली थी. Kevin नैतिकता को लेकर उठाये गये सवालों से बहुत परेशान थे. यानी कोई भी व्यक्ति काम से पहले इंसान होता है, ये उसे नहीं भूलना चाहिये. Professional दुनिया में ये बातें अक्सर लोग भूल जाते हैं...और संवेदनहीनता की हद पार कर जाते हैं. आज यही गिद्ध वाली विचारधारा हमारे देश के हमारे देश के मीडिया में भी आ गई है. पिछले एक हफ़्ते में देश में ऐसी दुख देने वाली दो घटनाएं हुई हैं. जिसमें आम जनता और मीडिया...दोनों के निशाने पर डॉक्टर और मरीज़ हैं.

11 जून को पश्चिम बंगाल के डॉक्टरों ने हड़ताल कर दी थी, क्योंकि कोलकाता के NRS अस्पताल में एक मरीज़ की मौत के बाद उसके रिश्तेदारों ने जूनियर डॉक्टर को पीट-पीटकर बुरी तरह ज़ख़्मी कर दिया था. ये हड़ताल क़रीब एक हफ़्ते तक चली थी. पूरे देश के डॉक्टरों ने पश्चिम बंगाल के डॉक्टरों का समर्थन किया (और इसके बाद ममता बनर्जी की सरकार को सुरक्षा को लेकर डॉक्टरों की मांग माननी पड़ीं) क्योंकि देश का हर डॉक्टर कभी ना कभी ख़ुद को ऐसी स्थिति में पाता है...जिससे कोलकाता के डॉक्टरों का सामना हुआ था.

जब डॉक्टरों की ये हड़ताल चल रही थी, उसी दौरान बिहार में दिमाग़ी बुख़ार से बच्चों की मौत हो रही थी. हमने बिहार के अस्पतालों से आई रिपोर्ट में ये देखा है कि कम व्यवस्था में भी सरकारी डॉक्टर बच्चों को बचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि कोई डॉक्टर कभी नहीं चाहेगा कि उसके मरीज़ का इलाज सफल ना हो. वो आख़िरी पल तक अपने मरीज़ की जान बचाने की कोशिश करते हैं. लेकिन उनकी नीयत और मेहनत पर सवाल उठाने वाली रिपोर्टिंग भी देश ने देखी. कैसे अस्पताल के ICU जैसी संवेदनशील जगह पर माइक और कैमरे के साथ कुछ बुद्धिमान पत्रकार आक्रामक रिपोर्टिंग करते दिखे. अपने पेशे की सभी मर्यादा और आदर्शों को तोड़ते हुए ये पत्रकार, डॉक्टर और उनके स्टाफ़ को बच्चों की मौत का ज़िम्मेदार साबित करने में लगे रहे. वो भूल गये कि अस्पताल में ICU उनके चैनल का आलीशान और चमक-धमक वाला स्टूडियो नहीं, बल्कि वो जगह है जहां बच्चे बुख़ार से तप रहे हैं...उनकी हालत गंभीर बनी हुई है.
 
यानी एक तरफ़ डॉक्टर को पब्लिक पीट रही है...और दूसरी तरफ़ नेताओं की धमकियां मिल रही हैं...और अगर डॉक्टर इनसे बच पाये...तो मीडिया उनके साथ बदसलूकी कर रही है. ये डॉक्टरों की मजबूरी और बच्चों की मौत पर गिद्ध मानसिकता वाली रिपोर्टिंग है.
इसलिये Kevin Carter ने Sudan में जो तस्वीर ली थी...उसमें आज का मीडिया उसी गिद्ध की तरह नज़र आ रहा है...जो बच्ची के मरने का इंतज़ार कर रहा था. मीडिया इसी अपमान वाली रिपोर्टिंग को अपनी ताक़त बताता है. इसी के नाम पर कुछ पत्रकारों को Award भी मिल जाता है.
 
ऐसा गोरखपुर में दिमाग़ी बुख़ार से हुई बच्चों की मौत के बाद मीडिया कवरेज में देखा गया था और अब बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में भी यही कोशिश की जा रही है. हमारे देश में मीडिया को त्रासदी का इंतज़ार रहता है. वो त्रासदी को एक वस्तु की तरह इस्तेमाल करते हैं. हमारे देश के मीडिया के लिए कोई भी त्रासदी बिकाऊ बन चुकी है. जहां भावनाओं की सेल लगती है. आंसुओं की पैकेजिंग होती है. और फिर शानदार कवरेज के नाम पर पुरस्कार लूटे जाते हैं. इसलिये आज से आप इन्हें पत्रकारों का पुरस्कार गैंग भी कह सकते हैं, जिनके लिये त्रासदी का मतलब TRP है. यानी त्रासदी एक बिकने वाली वस्तु है.

 हर त्रासदी में मीडिया का एक बड़ा तबक़ा अपने लिए एक मौक़ा देखता है. फिर चाहे मुंबई में आई बाढ़ हो, 26/11 का आतंकवादी हमला हो, मुजफ़्फ़रपुर और गोरखपुर में बच्चों की मौत की घटनाएं हों या फिर गैंग रेप की कोई घटना हो. ऐसी हर त्रासदी में कुछ पत्रकारों को TRP बढ़ाने का अवसर दिखाई देता है. पुरस्कार पाने का अवसर होता है. फिर वो आक्रामक पत्रकारिता के लिए पूरी तैयारी से रवाना होते हैं. वो हवाई जहाज़ से घटनास्थल पर पहुंचते हैं और फिर अपनी आक्रामक पत्रकारिता से त्रासदी में पुरस्कार वाली TRP बटोरने की कोशिश में जुट जाते हैं. ये आक्रामक रिपोर्टिंग सिर्फ और सिर्फ TRP के लिए की जाती है. पत्रकारों का ये पुरस्कार गैंग बच्चों की मृत्यु में अपने लिए एक अवसर खोज लेता है. इनकी दिव्य दृष्टि मातम में मौक़ा तलाश लेती हैं. बच्चों की मौत पर कुछ न्यूज़ चैनलों पर ये गिद्ध भोज चल रहा है. ये पुरस्कार गैंग वाले कुछ पत्रकारों का TRP वाला Formula है, जो जनता के सामने बार-बार Expose हो चुका है.

TV Screen पर देश ने कुछ पत्रकारों की घमंड से भरी रिपोर्टिंग देखी है. और आज डॉक्टर इसे लेकर परेशान हैं. व्यवस्था पर सवाल ना उठाकर...अगर हम डॉक्टरों को कटघरे में खड़ा कर देंगे तो ये पत्रकारिता के पेशे से बेईमानी कही जाएगी, क्योंकि ऐसे अहंकारी पत्रकार तो अपना इलाज बड़े से बड़े अस्पताल में करा लेते हैं. उन्हें न तो लाइन में लगना पड़ता है और न ही धक्के खाने पड़ते हैं. लेकिन जब देश के ग़रीब नागरिक के इलाज की बात आती है तो ऐसे पत्रकार पूरे दिन अस्पताल में Duty करने वाले डॉक्टरों से सवाल पूछने लगते हैं. ऐसे पत्रकार अपने सवालों से भी इस बात को ज़ाहिर कर देते हैं कि उन्हें ज़मीनी सच्चाई नहीं पता है.

135 करोड़ की आबादी वाले भारत में 12 लाख से भी कम डॉक्टर हैं. यानी 1472 लोगों के लिये एक डॉक्टर. WHO यानी विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के लिहाज़ से भारत को 6 लाख और डॉक्टरों की ज़रूरत है. और जब बिहार में दिमाग़ी बुख़ार जैसी बीमारी फैलती हैं, दो हफ़्तों में 100 से ज़्यादा बच्चे मर जाते हैं, तो डॉक्टरों की कमी और महसूस होती है. हम अपनी सेना का सम्मान करते हैं। देश की फ़ौज बॉर्डर पर तैनात है...दुश्मन का सामना कर रही है. ठीक इसी तरह देश के डॉक्टर भी मोर्चे पर हैं। दोनों हमारी सुरक्षा कर रहे हैं.
डॉक्टरों को हम डॉक्टर साहब कहकर बुलाते हैं, उन्हें हम भगवान का रूप कहते हैं. उनकी लिखी हुई दवा को पूरी पाबंदी के साथ खाते हैं. उनकी सलाह पर जो पसंद हैं...उससे परहेज़ भी करते हैं, क्योंकि हमें इस बात का यक़ीन होता है कि डॉक्टर साहब जो सलाह दे रहे हैं...वो हमारी भलाई के लिये है...हमारी ज़िंदगी बचाने के लिये है. इसी यक़ीन की वजह से कहा जाता है कि डॉक्टर भगवान का रूप हैं.
 
हमारे देश में अक्सर बच्चों से पूछा जाता है कि बड़े होकर क्या बनोगे...तो वो कहते हैं बड़े होकर डॉक्टर बनेंगे...या इंजीनियर.
माता-पिता भी हमेशा अपने बच्चों को डॉक्टर या फिर इंजीनियर बनते हुए देखना चाहते हैं. इसके लिये कई बार तो उन पर 11वीं कक्षा में ज़बरदस्ती Science चुनने का दबाव डाला जाता है. फिर चाहे वो आगे चलकर Commerce या Arts की पढ़ाई ही क्यों ना करना चाहते हों. लेकिन डॉक्टर और इंजीनियर बनना आज भी देश में First Choice माना जाता है. इसलिये आज हमारे देश के बच्चे और उनके माता-पिता अगर पश्चिम बंगाल में डॉक्टरों से हुई मारपीट...या फिर बिहार में उनसे पूछे जा रहे अहंकारी सवालों के बारे में जानेंगे...तो शायद वो इस बारे में दोबारा सोचें क्योंकि डॉक्टर बनकर जानलेवा हमले...और बेइज़्ज़त करने वाली रिपोर्टिंग का सामना आख़िर कौन करना चाहेगा?

भारत में डॉक्टर बनना आसान नहीं है क्योंकि मेडिकल कॉलेजों में दाखिला मिलना एक बड़ी चुनौती है. इसकी वजह भी आसानी से समझी जा सकती है. छात्रों की संख्या के हिसाब से देश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या बहुत कम है. देश में सिर्फ 529 मेडिकल कॉलेज हैं. इनमें करीब 50 प्रतिशत कॉलेज प्राइवेट हैं. मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए छात्र NEET यानी National Eligibility-cum-EntranceTest में शामिल होते हैं. इस साल क़रीब 70 हज़ार सीटों के लिये 16 लाख से ज़्यादा छात्रों ने ये टेस्ट दिया था.

इस तरह आप समझ सकते हैं कि भारत जैसे देश में डॉक्टर बनने के लिये छात्रों को कितनी मेहनत करनी पड़ती है. लाखों छात्र दिन-रात मेहनत करते हैं. लाखों रुपये देकर कोचिंग संस्थान जाते हैं और ट्यूशन लेते हैं. फिर भी क़रीब 70 हजार छात्र ही हर साल मेडिकल कॉलेजों में दाख़िला ले पाते हैं. लेकिन किसी मेडिकल कॉलेज में एडमिशन ही एक अकेली चुनौती नहीं है. मेडिकल की पढ़ाई पर खर्च भी बहुत ज़्यादा है. अगर सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाख़िला नहीं मिला...तो छात्रों को प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई करनी पड़ती है...जहां की फ़ीस का बोझ उठाना एक साधारण परिवार के लिये आसान नहीं है.

भारत में साधारण डॉक्टर बनने के लिये एक से दो करोड़ रुपये का ख़र्च आता है. पहले MBBS के लिये 30 से 60 लाख रुपये की फीस देनी होती है. इसके बाद PG यानी Post Graduation की पढ़ाई में 70 लाख से डेढ़ करोड़ रुपये तक ख़र्च करने पड़ते हैं. कुल मिलाकर मेडिकल कॉलेज के एक छात्र को एक से दो करोड़ रुपये फीस देनी होती है. निजी मेडिकल कॉलेज में डोनेशन भी देनी पड़ती है और इसके लिये भी एक करोड़ रुपये से ज़्यादा देने पड़ सकते हैं. आप समझ सकते हैं कि भारत में डॉक्टर बनने के लिए कितनी बड़ी रक़म की जरूरत है, लेकिन इस मेडिकल कॉलेज में दाखिले और करीब पांच साल की पढ़ाई के बाद जब कोई छात्र डॉक्टर बनता है, तो उसके सामने एक दूसरा संकट खड़ा होता है.

MBBS के बाद जो छात्र डॉक्टर बनते हैं उन्हें सरकारी अस्पतालों में 40 से 50 हजार रुपये की सैलरी मिलती है. प्राइवेट अस्पतालों में डॉक्टरों का वेतन इससे भी कम है. 3 या 4 साल काम करने के बाद डॉक्टर की सैलरी करीब 70 हजार रुपये हो सकती है. लेकिन ऐसा हर बार नहीं होता. अगर किसी छात्र ने मेडिकल की पढ़ाई के लिए बैंक से 50 लाख का एजुकेशन लोन लिया है, तो उसे हर महीने 60 हज़ार की EMI देनी होगी. लेकिन आमतौर पर इतनी सैलरी किसी डॉक्टर को नौकरी के शुरुआती वर्षों में नहीं मिलती है.

10 लाख रुपये से ज्यादा के एजुकेशन लोन पर बैंक ज़मीन या मकान गिरवी रखते हैं. इसकी फिक्र भी उस डॉक्टर को हर समय रहती है।
इसलिये डॉक्टरों का सम्मान बहुत ज़रूरी है. उनकी सुरक्षा भी बहुत ज़रूरी है. अगर वो अपना काम अच्छी तरह नहीं कर पाएंगे...तो इससे सबसे बड़ा नुक़सान हमें ही होगा. ये बात उन पत्रकारों को भी समझनी होगी जो TRP के लिये हर हद को पार कर जाते हैं और अवार्ड पाने के लिये डॉक्टरों की बेइज़्ज़ती करने के साथ मासूम बच्चों की ज़िंदगी को भी ख़तरे में डाल देते हैं. लेकिन किसी मेडिकल कॉलेज में दाखिला ही एक अकेली चुनौती नहीं है. मेडिकल की पढ़ाई पर खर्चा भी बहुत ज्यादा है. ये खर्च इतना ज्यादा है कि एक साधारण परिवार के लिये इसका बोझ उठाना आसान नहीं है. भारत में आमतौर पर MBBS की फीस 30 से 60 लाख रुपये के बीच है. इसके बाद PG यानी Post Graduation की पढ़ाई में 70 लाख से डेढ़ करोड़ रुपए की फीस देनी होती है. यानी कुल मिलाकर मेडिकल कॉलेज के एक छात्र को 1 से 2 करोड़ रुपए फीस के तौर पर देने होते हैं, लेकिन ये खर्च तो सिर्फ सरकारी मेडिकल कॉलेजों का है. निजी कॉलेजों में डोनेशन का खर्च भी करोड़ रुपए तक जा सकता है.

PG की पढ़ाई के बाद अगर कोई छात्र किसी विषय में specialisation करता है तो उसका खर्च भी आएगा. आप समझ सकते हैं कि भारत में डॉक्टर बनने के लिए कितनी बड़ी रकम की जरूरत है. लेकिन इस मेडिकल कॉलेज में दाखिले और करीब पांच साल की पढ़ाई के बाद जब कोई छात्र डॉक्टर बनता है तो उसके सामने एक दूसरा संकट खड़ा होता है.

MBBS के बाद जो छात्र डॉक्टर बनते हैं उन्हें सरकारी अस्पतालों में 40 से 50 हजार रुपए की सैलरी मिलती है. प्राइवेट अस्पतालों में ये सैलरी इससे भी कम है. तीन या चार साल काम करने के बाद डॉक्टर की सैलरी करीब 70 हजार रुपए हो सकती है,लेकिन ऐसा हर बार नहीं होता. अगर किसी छात्र ने मेडिकल की पढ़ाई के लिए बैंक से 50 लाख का एजुकेशन लोन लिया है तो उसे हर महीने 60 हजार की EMI देनी होगी. लेकिन आमतौर पर इतनी सैलरी किसी डॉक्टर को शुरुआती वर्षों में नहीं मिलती है. 10 लाख से ज्यादा के एजुकेशन लोन पर बैंक जमीन या मकान गिरवी रखते हैं. इसकी चिन्ता भी उस डॉक्टर को हर समय रहती है जिसने बड़ा एजुकेशन लोन लिया हुआ है.