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ZEE Jankari: देश में रोजाना होते सड़क हादसों के पीछे क्‍या है वजह

2012 से अब तक यमुना एक्सप्रेसवे पर 5000 से ज़्यादा हादसे हो चुके हैं.  देश में क़रीब 1 लाख 33 हज़ार किलोमीटर लंबे नेशनल हाइवे हैं. और देश में होने वाला हर तीसरा सड़क हादसा नेशनल हाइवे पर होता है.

ZEE Jankari: देश में रोजाना होते सड़क हादसों के पीछे क्‍या है वजह

आगरा में आज एक बस हादसे में 29 लोगों की मौत हुई है. ये ख़बर सुबह से न्यूज़ चैनलों में बड़ी-बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ की तरह चल रही है. कल आपके घर में जो अख़बार आएंगे...उसमें भी ये ख़बर बड़ी-बड़ी हेडलाइन की तरह छपी होगी. लेकिन परसों हम कोई नई ख़बर पढ़ रहे होंगे, न्यूज़ चैनलों में कुछ और ब्रेकिंग चल रहा होगा. क्योंकि आगरा में हुए हादसे को हम भूल चुके होंगे.

दरअसल हमें ऐसी सड़क दुर्घटनाओं की आदत पड़ गई है. अब हमें ऐसी दुर्घटनाएं परेशान नहीं करती हैं. हर हादसे के साथ मरने वालों के आंकड़े बदलते रहते हैं, और हम बस यही सोचते हैं कि उनकी क़िस्मत में यही लिखा था. ऊपर वाले को यही मंज़ूर था. साथ में हमें यकीन रहता है कि ऐसे हादसे हमारे साथ नहीं होंगे...क्योंकि हम ग़लती नहीं कर सकते. लेकिन इन खबरों को छोटा समझने की भूल नहीं करनी चाहिए. सड़क दुर्घटनाएं कभी भी और किसी के भी साथ हो सकती हैं. इन दुर्घटनाओं में एक ही झटके में पूरा परिवार बर्बाद हो जाता है.

इसलिये DNA में हमारा अगला विश्लेषण, सड़क या हाईवे पर चलने वाले हमारे तरीक़े पर है, हमारी Driving Sense पर है. आगे बढ़ने से पहले हम आपको 1 minute 42 seconds की एक Short Film दिखाना चाहते हैं. वर्ष 2016 में Ministry Of Road Transport and Highways की तरफ़ से इस फिल्म को अवार्ड दिया गया था. भारत में जो लोग ख़ुद को रफ़्तार का सौदागर समझते हैं और अपने परिवार से प्यार करते हैं...उन्हें ये फिल्म ज़रूर देखनी चाहिये.

ये तो जोश में होश खोने और फिर पूरा परिवार ख़त्म होने की कहानी थी. लेकिन अक्सर सड़क दुर्घटनाओं की वजह बेक़ाबू रफ़्तार के साथ हमारी छोटी-छोटी लापरवाही भी होती हैं...जो जानलेवा बन जाती हैं. आगरा-नोएडा एक्सप्रेसवे पर हुए हादसे की जांच चल रही है. शुरुआती जांच में आशंका जताई गई है कि ड्राइवर को बस चलाते वक़्त नींद आ गई होगी, जिसके बाद बस अनियंत्रित होकर नाले में जा गिरी. यमुना एक्सप्रेसवे की शुरुआत 2012 में हुई थी. ये एक विश्वस्तरीय एक्सप्रेसवे है. लेकिन सोचने वाली बात ये है कि ऐसे World class एक्सप्रेसवे पर कौन सी कमियों की वजह से हादसे हो रहे हैं. आज ये मुद्दा संसद में भी उठा. राज्यसभा में केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इस बस दुर्घटना पर जवाब दिया.

2012 से अब तक यमुना एक्सप्रेसवे पर 5000 से ज़्यादा हादसे हो चुके हैं.  देश में क़रीब 1 लाख 33 हज़ार किलोमीटर लंबे नेशनल हाइवे हैं. और देश में होने वाला हर तीसरा सड़क हादसा नेशनल हाइवे पर होता है. वर्ष 2017 में सिर्फ़ नेशनल हाईवे पर ही 53 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हुई थी. जबकि पूरे भारत में हुए सड़क हादसों में क़रीब 1 लाख 48 हज़ार लोगों की मौत हुई थी. जो कि आतंकवाद की वजह से मारे गए लोगों की संख्या से ज्यादा है. भारत की सड़कों पर रोज़ क़रीब 1300 हादसे होते हैं. हर रोज़ इन हादसों में 400 से ज़्यादा लोगों की मौत होती है, यानी हर घंटे क़रीब 17 लोगों की मौत भारत की सड़कों पर हो रही है.
 
सड़क दुर्घटना वाले इस आतंकवाद के लिए हम सब ज़िम्मेदार हैं. फिर चाहे वो तेज़ रफ़्तार में गाड़ी चलाने वाला व्यक्ति हो...((शॉट्स)) या फिर ट्रैफिक के नियमों की धज्जियां उड़ाने वाले ट्रक और बस वाले हों, या फिर वो लोग जो बिना जांचे परखे ऐसी बसों में यात्रा करते हैं. अक्सर बस या टैक्सी का सफ़र करते वक़्त हम इस बात की चिंता नहीं करते कि उसे चलाने वाला ड्राइवर पूरी तरह प्रशिक्षित है या नहीं?

क्या वो थका हुआ है?
क्या उसने पूरी नींद ली है ?
उसके पास लाइसेंस भी है कि नहीं ?
सड़क दुर्घटनाओं पर हुई एक स्टडी के मुताबिक़ जो लोग दिन में 4 घंटे से भी कम सोते हैं...उनके ड्राइविंग करते हुए हादसे की संभावना 15 गुना बढ़ जाती है. इसलिये एक ड्राइवर के लिये कम से कम 7 घंटे की नींद ज़रूरी है. अगर ड्राइवर पूरी तरह Trained भी होगा तो मुमकिन है जो बस या टैक्सी वो चला रहा है, उसकी हालत ख़राब हो.

बस पर चढ़ने से पहले हम कभी उसकी तकनीकी हालत की फ़िक्र नहीं करते. टैक्सी होती है तो हम उसके रेट तय करने में ज़्यादा ऊर्जा लगा देते हैं. हमारी कोशिश होती है कि किसी तरह सस्ते में सफ़र तय हो जाए...या फिर बस में Window seat मिल जाए. फिर चाहे उसके टायरों की हालत ऐसी क्यों ना हो कि हमारी यात्रा जानलेवा बन जाए.
 
वर्ष 2017 में सड़क हादसों में 25 प्रतिशत ऐसे वाहन शामिल थे...जो 10 साल पुराने थे जबकि 10 प्रतिशत हादसों में गाड़ियां 15 साल पुरानी थीं. वहीं इनमें क़रीब 12 प्रतिशत ऐसे वाहन थे...जिन्हें Over-Loading यानी तय क्षमता से ज़्यादा भार के साथ चलाया जा रहा था. सवाल ये भी है कि जिस देश में सड़क दुर्घटनाओं में हर साल क़रीब डेढ़ लाख लोग मारे जाते हों, वो देश सुपरपावर कैसे बन सकता है?

आपको ये जानकर हैरानी होगी कि भारत में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं की वजह से...देश को सालाना करीब 5 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होता है. ये भारत के GDP का लगभग 3 प्रतिशत है. इतनी रक़म से क़रीब 30 वर्षों तक स्वच्छ भारत अभियान को चलाया जा सकता है. छोटे शहरों और गांव में 19 लाख किलोमीटर लंबी सड़कें बनाई जा सकती हैं. 500 से ज़्यादा Smart Cities को फंड किया जा सकता है. 7 वर्षों तक Food Security दी जा सकती है.

DNA में हम हमेशा Civic sense यानी एक अच्छे नागरिक होने की समझ की बात करते हैं. अब ज़रूरी है कि हम Driving Sense पर भी ध्यान दें क्योंकि भारत की सड़कों पर एक आदर्श ड्राइविंग वाली समझ ग़ायब पाई जाती है. आपने अक्सर कुछ लोगों को सड़क या हाईवे पर ग़लत Side में गाड़ी चलाते हुए देखा होगा. इसे Wrong Side Driving कहा जाता है. ये लोग ही आम तौर पर हादसों की बड़ी वजह बनते हैं. इनकी पेट्रोल बचाने की कोशिश कई बार दूसरों की जान ले लेती है. यानी इन लोगों के लिये किसी की जान एक लीटर पेट्रोल से भी सस्ती है. आजकल उत्तर प्रदेश की नोएडा पुलिस ने Operation Clean चलाया हुआ है. इसके तहत उन लोगों के चालान काटे जा रहे हैं जो Wrong Side पर गाड़ी चला रहे हैं. इस अभियान के तहत 4700 से ज़्यादा चालान काटे गये हैं. जबकि क़रीब 100 वाहनों को ज़ब्त किया गया है. ये कार्रवाई बहुत ज़रूरी है...क्योंकि ये वही लोग हैं जो शॉर्टकट लेने और पेट्रोल बचाने के लिये किसी की जान जोखिम में डाल देते हैं.

वैसे अक्सर भारत में ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई नहीं होती है. लेकिन जर्मनी जैसे देश में 2 से 3 उल्लंघन करने पर ड्राइविंग लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है. इसे वापस पाने के लिये ड्राइवर को फिर से परीक्षा देनी होती है.
ब्रिटेन में भी यही व्यवस्था लागू है. इसके अलावा वहां ट्रैफिक rules तोड़ने पर 100 पाउंड यानी साढ़े 8 हज़ार रुपये तक का चालान हो सकता है.

आज हमारे देश में नये-नये हाईवे बन रहे हैं, फ्लाईओवर बनाये जा रहे हैं. लेकिन बड़ी ज़रूरत ट्रैफिक नियम तोड़ने वाले लोगों को अनुशासन सिखाने की है. हमारी सरकार लोगों को सुविधाएं दे सकती है, लेकिन उन्हें इस्तेमाल करने का सलीक़ा लोगों को समझना पड़ेगा.