#AtalBihariVajpayee जब अटलजी से मिलने के लिए मुशर्रफ ने तोड़ा प्रोटोकॉल, बंगले के सामने रुकवाया था काफिला

मुशर्रफ पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी से मिलना चाहते थे परंतु तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार टालमटोल कर रही थी.

#AtalBihariVajpayee जब अटलजी से मिलने के लिए मुशर्रफ ने तोड़ा प्रोटोकॉल, बंगले के सामने रुकवाया था काफिला
अटलजी ने अपनी चिर परिचित शैली और मुस्कान से साथ मुर्शरफ को शुभकामनाएं दीं. (फाइल फोटो)

नई दिल्ली: 25 दिसंबर को देशभर में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) की जयंती मनाई जा रही है. अटल जी के व्यक्तित्व, उनकी कार्यशैली के कायल केवल उनकी पार्टी के लोग, करीबी सहयोगी ही नहीं थे बल्कि विपक्षी दलों के नेताओं के साथ साथ विदेशी राष्ट्राध्यक्ष भी उनसे अभिभूत थे. इसका एक उदाहरण तब देखने को मिला जब पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ (Pervez Musharraf) तक उनसे मिलने आतुर थे.

मुशर्रफ पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी से मिलना चाहते थे परंतु तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार टालमटोल कर रही थी. उन्होंने लिखा कि कश्मकश जारी थी, लेकिन मुशर्रफ ने वाजपेयी से मिलने की ठान ली थी. अंतत: 18 अप्रैल 2005 को यह मुलाकात हुई. मुशर्रफ ने स्वदेश वापसी के लिये पालम हवाई अड्डा जाते समय अपना काफिला 6, कृष्ण मेनन मार्ग पर रुकवाया. वे (मुशर्रफ) अटल बिहारी वाजपेयी से मिले और कहा, 'सर, यदि आप प्रधानमंत्री होते तो आज नजारा कुछ और होता.' उन्होंने आगे लिखा कि अटलजी ने अपनी चिर परिचित शैली और मुस्कान से साथ मुर्शरफ को शुभकामनाएं दीं.

2005 में राष्ट्रपति मुर्शरफ भारत आए थे
वाजपेयी के तहत प्रधानमंत्री कार्यालय में विशेष कार्यस्थ अधिकारी रहे राजकुमार शर्मा ने 'साहित्य अमृत' पत्रिका के अटल स्मृति अंक में पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ से जुड़ी घटना का उल्लेख किया है. मुशर्रफ वाजपेयी से बहुत प्रभावित थे. शर्मा ने अपने लेख में स्मृतियों को ताजा करते हुए कहा है कि अप्रैल 2005 में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति मुर्शरफ भारत आए थे.

वाजपेयी को व्यक्तियों की खासी परख थी
शर्मा ने लिखा कि वाजपेयी को व्यक्तियों की खासी परख थी. अनेक नेताओं के बारे में उनकी टिप्पणियां सटीक बैठती थीं. वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर धारणा चाहे जो हो, मगर वाजपेयी उनके काम करने की शैली, उनकी मेहनत, शासन में नए नए प्रयोग की तारीफ करते थे. वाजपेयी ने उनके बारे में भी कभी कोई हल्की बात नहीं की जिनसे उनके मतभेद रहे.

नपेतुले अंदाज में अपनी बात कहते थे
वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में उनके मीडिया सलाहकार रहे अशोक कुमार टंडन ने अपने लेख में कहा है ‘‘अटलजी जब दूसरी बार प्रधानमंत्री बने तब उनके कार्यालय में काम करने का अवसर मिला. अटलजी से परिचय पुराना था लेकिन निकट से काम करने का यह पहला अवसर था.’’ उन्होंने कहा कि आपसी बातचीत में नपेतुले अंदाज में कम से कम शब्दों में किंतु प्रभावशाली शैली में अपना मंतव्य स्पष्ट करना अटलजी के व्यक्तित्व की अनूठी पहचान थी. अपने सहयोगी हों, या बैठक में भाग ले रहे अधिकारी या अतिथि. सभी को अपनी बात कहने का पूरा अवसर देना उनके स्वभाव का हिस्सा था. अधिकतर विपक्षी नेताओं के साथ उनके व्यक्तिगत मधुर संबंध थे.

‘हम दोस्त बदल सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं'
टंडन ने कहा कि पड़ोसी देशों के साथ संबंध मजबूत बनाने की पहल में उनके इन शब्दों को कौन भूल सकता है कि ‘‘हम दोस्त बदल सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं.’’ आईएएस अधिकारी एवं वाजपेयी के तहत काम करने वाले शक्ति सिन्हा ने अपने लेख में कहा कि यह चर्चा इस कहानी के बिना पूरी नहीं हो सकती कि वाजपेयी के व्यक्तित्व का भारत के लोकतांत्रिक और सामाजिक ढांचे को शक्तिशाली बनाने में कितना प्रभाव है.

सुखोई करार की वाजपेयी ने की प्रशंसा
उन्होंने लिखा, ‘‘ देवेगौड़ा सरकार के कार्यकाल के दौरान, तत्कालीन रक्षा मंत्री मुलायम सिंह यादव ने सुखोई करार सफलतापूर्वक होने पर जब लोकसभा में बयान दिया तब वाजपेयी ने खड़े होकर करार की प्रशंसा कर उदाहरण पेश किया.’’ सिन्हा ने लिखा कि मंत्री समेत अन्य सभी लोगों को आश्चर्य में डालने वाले उनके तरीके ने स्पष्ट रूप से दिखाया कि सच्चे लोकतंत्र में कुछ चीजें दलगत राजनीति से ऊपर होती हैं.