वो गुफा जहां श्रीकृष्ण और जामवंत के बीच युद्ध हुआ, आज भी दफन है अरबों का खजाना

कहा जाता है जामवंत ने इस गुफा में शिवजी का एक रुद्राक्ष शिवलिंग बना कर शिव की बहुत वर्षों तक तपस्या की. एक रुद्राक्ष शिवलिंग आज भी इस गुफा में विराजमान है और आज भी इस शिवलिंग की पूजा होती है और देश और विदेश से लोग इस जामवंत शिव गुफा के दर्शन के लिए आते हैं. 

वो गुफा जहां श्रीकृष्ण और जामवंत के बीच युद्ध हुआ, आज भी दफन है अरबों का खजाना
जम्मू की जामवंत गुफा

नई दिल्ली: जम्मू कश्मीर (Jammu Kashmir) जिसे भारत का स्वर्ग कहा जाता है. प्राचीन काल से इसका आध्यात्मिक दष्टि से काफी महत्व रहा है. शिवपुराण से लेकर स्कंद पुराण और दूसरे कई अन्य पुराणों में इसका का जिक्र किया गया है.

इन्हीं में से एक है 'जम्मू की जामवंत गुफा'. यह गुफा तवी नदी के तट पर स्थित है. कई पीर, फकीरों और ऋषि-मुनियों के इस गुफा में तपस्‍या करने के कारण इस गुफा को पीर खोह गुफा के नाम से जाना जाने लगा है. यहां के लोगों का मानना है कि यह गुफा देश के बाहर भी कई मंदिरों और गुफाओं से जुड़ी हुई है. मान्‍यता है कि इसी गुफा में जामवंत और भगवान श्रीकृष्ण के बीच युद्ध हुआ था.

जम्मू और कश्मीर के जम्मू नगर के पूर्वी छोर पर एक गुफा मंदिर बना हुआ है जिसे जामवन्त की तपोस्थली माना जाता है. इस गुफा में कई पीर-फकीरों और ऋषियों ने तपस्या की है इसलिए इसका नाम 'पीर खोह' भी कहा जाता है. डोगरी भाषा में खोह का अर्थ गुफा होता है.

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कहते हैं कि राम रावण के युद्ध में जामवंत भगवान राम की सेना के सेनापति थे. युद्ध की समाप्ति के बाद भगवान राम जब विदा होकर अयोध्या लौटने लगे तो जामवंत जी ने उनसे कहा प्रभु युद्ध में सबको लड़ने का अवसर मिला परंतु मुझे अपनी वीरता दिखाने का कोई अवसर नहीं मिला. मैं युद्ध में भाग नहीं ले सका और युद्ध करने की मेरी इच्छा मेरे मन में ही रह गई. उस समय भगवान ने जामवंत जी से कहा, तुम्हारी ये इच्छा अवश्य पूर्ण होगी जब मैं कृष्ण अवतार धारण करूंगा. तब तक तुम इसी स्थान पर रहकर तपस्या करो. इसके बाद जब भगवान कृष्ण अवतार में प्रकट हुए तब भगवान ने इसी गुफा में जामवंत से युद्ध किया था.

कहा जाता है जामवंत ने इस गुफा में शिवजी का एक रुद्राक्ष शिवलिंग बना कर शिव की बहुत वर्षों तक तपस्या की. एक रुद्राक्ष शिवलिंग आज भी इस गुफा में विराजमान है और आज भी इस शिवलिंग की पूजा होती है और देश और विदेश से लोग इस जामवंत शिव गुफा के दर्शन के लिए आते हैं. 

कहा जाता है एक रुद्राक्ष शिवलंग पूरे भारत में सिर्फ जामवंत गुफा पीर खोह में है और किसी भी जगह नहीं है. इसके बाद जब भगवान कृष्ण अवतार में प्रकट हुए तब भगवान ने इसी गुफा में जामवंत से युद्ध किया था. ये युद्ध लगातार 27 दिन तक चला था. 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार राजा सत्यजीत ने सुर्य भगवान की तपस्या की तो भगवान ने प्रसन्न होकर राजा को प्रकाश मणि प्रसाद के रूप में दे दी और राजा का भाई मणि को चुराकर भाग गया पर जंगल में शेर के हमले में मारा गया और शेर ने मणि को निगल लिया. इसके बाद जामवंत ने युद्ध में शेर को हराकर प्रकाश मणि को हासिल कर लिया.

लेकिन जब भगवान कृष्ण पर प्रकाश मणि चुराने का आरोप लगा तो वह अपने सर से इल्जाम उतारने के लिए मणि की तलाश में निकल पड़े और मणि की तलाश में वह जामवंत गुफा तक पहुंच गए और जब भगवन कृष्ण को पता चला की प्रकाश मणि जामवंत के पास है और फिर मणि को लेकर भगवान कृष्ण  और जामवंत में युद्ध हुआ था और इस युद्ध में जामवंत हार गया था. हारने के बाद जामवंत ने इस प्रकाश मणि को भगवान कृष्ण को दे दिया था. 

कहा जाता है इस जामवंत गुफा की जानकारी सबसे पहले शिव भगत गुरु गोरख नाथ जी को पता चली थी और उन्होंने अपने शिष्ये जोगी गरीब नाथ को इस गुफा की देखभाल करने  लिए कहा था और अपने गुरु की आज्ञा के अनुसार वह इस गुफा की देखभाल करने लगे और अपनी धुनि जमा कर बैठ गए. ये भी कहा जाता है कि ये जामवंत गुफा 6 हजार साल से भी अधिक पुरानी गुफा है. कहा जाता है जम्मू कश्मीर के राजा बैरम देव जी ने 1454 ईस्वी से लेकर 1495 ईस्वी के दौरान इस गुफा में मंदिर का निर्माण करवाया था.

इसलिए जम्मू के इस प्राचीन शिव मंदिर को जामवंत गुफा या फिर पीर खोह भी कहा जाता है. पीर खोह तक पहुंचने के लिए श्रद्धालु मुहल्ला पीर मिट्ठा के रास्ते गुफा तक जाते हैं. इस मंदिर की दीवारों पर देवी-देवताओं के मनमोहक चित्र उकेरे गए हैं. आंगन में शिव मंदिर के सामने पीर पूर्णनाथ और पीर सिंधिया की समाधिंया हैं. जामवन्त गुफा के साथ एक साधना कक्ष का निर्माण किया है जो तवी नदी के तट पर स्थित है.

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