दुनिया को सबसे बड़ी थ्योरी देने वाले भगवान श्री कृष्ण का मूल रूप क्या था?

भगवान श्री कृष्ण एक योद्धा होने के साथी ही बहुत बड़े दार्शनिक भी थे. उनके जैसा दार्शनिक और योगी इस दुनिया में नहीं हुआ और ना ही होगा. गीता के माध्यम से उन्होंने जीवन का सार समझाया.

दुनिया को सबसे बड़ी थ्योरी देने वाले भगवान श्री कृष्ण का मूल रूप क्या था?

नई दिल्ली: भगवान श्री कृष्ण के जन्मदिवस जन्माष्टमी (Janmashtami) की तैयारियां शुरू हो गई हैं. इस वर्ष घर पर ही कुछ विशेष तरीके से पूजा की जाएगी. लल्ला के लिए पालना बनाया जाएगा, पंजीरी का प्रसाद बनेगा. बच्चे राधे-कृष्ण की वेशभूषा में खूब सजेंगे. बचपन से भगवान श्री कृष्ण को इसी रूप में देखते आए हैं. क्या कभी आपने प्रभु श्री कृष्ण के तत्व को समझने का प्रयास किया है. किसी के लिए वो प्रेमी हैं, किसी के आराध्य, किसी के ठाकुर जी, किसी के नंदकिशोर और किसी के लिए वो एक योद्धा हैं. भगवान श्री कृष्ण के कई रूप हैं. लोगों ने उनके अलग-अलग पहलुओं को देखा. पहले हमें ये समझना होगा कि जिनकी भक्ति का स्वाद सूरदास और मीरा ने चखा उस चेतना को श्री कृष्ण कहते हैं. 

भगवान श्री कृष्ण को पूर्णावतार माना जाता है. इनका जन्म मानव की तरह हुआ और मृत्यु भी मानव की तरह ही हुई थी. श्री कृष्ण एक योद्धा होने के साथी ही बहुत बड़े दार्शनिक भी थे. उनके जैसा दार्शनिक और योगी इस दुनिया में नहीं हुआ और ना ही होगा. गीता के माध्यम से उन्होंने जीवन का सार समझाया. उन्होंने दुनिया को एक सबसे बड़ी थ्योरी दी- 'ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या'. आज गीता को दुनिया का सबसे बड़ा दार्शनिक ग्रंथ माना जाता है. महाभारत के युद्ध में उन्होंने अर्जुन को समझाया कि आत्मा ही सत्य है और सत्य ही ब्रह्म है. आत्मा जब शरीर धारण करती है तो उसे केवल कर्म के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि जब वो शरीर छोड़ देगी तो उसके भाई-बंधु सब यहीं छूट जाएंगे, फिर वो एक नया शरीर धारण करेगी. वहां वो नए लोगों से मिलेगी. कर्म ही निश्चित करेगा कि उसे कैसे मुक्ति मिलेगी.

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अपने जीवनकाल में भगवान श्री कृष्ण ने एक हजार से ज्यादा आश्रम बनवाए. जो भी जहां मिला उसे श्री कृष्ण ने अपना बना लिया. उन्होंने अनुशासन में जीने, व्यर्थ कि चिंता ना करने और भविष्य को छोड़ वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करने का मंत्र दिया. दुश्मनों के लिए वो निर्मम नरसंहारक भी थे. भारतीय परंपरा और जनश्रुति के अनुसार श्री कृष्ण ने ही मार्शल आर्ट का आविष्कार किया था. दरअसल पहले इसे कालारिपयट्टु कहा जाता था. बाद में अगस्त्य मुनि ने इसे आगे बढ़ाया. श्री कृष्ण ने इस विद्या को अपनी सेना नारायणी सेना को भी सिखाया. इसके कारण ये भारत की सबसे भयंकर प्रहारक मानी जाती थी. हमें उनके जीवन से सीख लेकर कर्म करने चाहिए.

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