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Muharram 2019: क्यों खास है 'मुहर्रम', क्या है इसका इतिहास, क्यों मनाया जाता है मातम

इस्लाम (Islam) धर्म में विश्वास रखने वालों के लिए मुहर्रम (Muharram )  एक खास त्योहार है. मुहर्रम इस्लामी वर्ष यानी हिजरी सन का पहला महीना है. इस महीने को इस्लाम के चार पवित्र महीनों में शुमार किया जाता है. 

Muharram 2019: क्यों खास है 'मुहर्रम', क्या है इसका इतिहास, क्यों मनाया जाता है मातम
(फाइल फोटो)

नई दिल्ली: इस्लाम (Islam) धर्म में विश्वास रखने वालों के लिए मुहर्रम (Muharram) एक खास त्योहार है. मुहर्रम इस्लामी वर्ष यानी हिजरी सन का पहला महीना है. इस महीने को इस्लाम के चार पवित्र महीनों में शुमार किया जाता है. 

इस महीने के 10वें दिन को 'आशुरा' कहा जाता है. इस दिन हजरत रसूल के नवासे हजरत इमाम हुसैन (Hazrat Imam Hussain) को और उनके बेटे घरवाले और उनके सथियों (परिवार वालो) को करबला के मैदान में शहीद कर दिया गया था. मुहर्रम का यह दिन सबसे अहम माना जाता है. इस दिन हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद किया जाता है. 

इस्‍लामी मान्‍यताओं के मुताबिक इराक में यजीद नाम का जालिम बादशाह का शासन था जिसका अल्लाह पर कोई विश्वास नहीं था. याजिद हजरत इमाम हुसैन को अपने खेमे में शामिल करना चाहता था. हुसैन को यह मंजूर नहीं था और उन्‍होंने यजीद के विरुद्ध जंग का ऐलान कर दिया. 

कर्बला की जंग
वर्तमान में कर्बला इराक का प्रमुख शहर है. कर्बला इराक की राजधानी बगदाद से 120 किलोमीटर दूर है. कर्बला मुस्लिम धर्म के अनुयायियों के लिए प्रमुख स्‍थान है.  इस्‍लाम की मान्‍यताओं के अनुसार हजरत इमाम हुसैन अपने परिवार और साथियों के साथ दो मोहर्रम को कर्बला पहुंचे थे. 

यजीद अपने सैन्य बल के दम पर हजरत इमाम हुसैन और उनके काफिले पर जुल्म कर रहा था. उस काफिले में उनके परिवार सहित कुल 72 लोग शामिल थे. जिसमें महिलाएं और छोटे-छोटे बच्चे भी थे. यजीद ने उन सबके लिए 7 मुहर्रम को पानी की बंद कर दिया था.

नौवें मोहर्रम की रात हुसैन ने  अपने साथियों कहा कि, 'यजीद की सेना बड़ी है और उसके पास एक से बढ़कर एक हथियार हैं. ऐसे में बचना मुश्किल है. मैं तुम्‍हें यहां से चले जाने की इजाजत देता हूं. मुझे कोई आपत्ति नहीं है.' लेकिन कोई हुसैन को छोड़कर नहीं गया. 

मुहर्रम की 10 वीं तारीख को यजीद की सेना ने हुसैन की काफिले पर हमला कर दिया. शाम होते - होते हुसैन और उनका पूरा काफिला शहीद हो गया. शहीद होने वालों में  उनके छः महीने की उम्र के पुत्र हज़रत अली असग़र भी शामिल थे. 

ऐसे मनाया जाता है मुहर्रम
शिया समुदाय के लोग मुहर्रम की दसवीं तारीख को  काले कपड़े पहनकर हुसैन और उनके परिवार की शहादत को याद करते हैं. हुसैन की शहादत को याद करते हुए सड़कों पर जुलूस निकाला जाता है और मातम मनाया जाता है.

मुहर्रम की नौ और 10 तारीख को मुसलमान रोजे रखते हैं और मस्जिदों-घरों में इबादत की जाती है.

वहीं सुन्‍नी समुदाय के लोग मुहर्रम के महीने में 10 दिन तक रोजे रखते हैं. कहा जाता है कि मुहर्रम के एक रोजे का सबाब 30 रोजों के बराबर मिलता है.