आजाद भारत की राहों में 69 साल

By pranav purushottam | Last Updated: Saturday, August 15, 2015 - 20:03
आजाद भारत की राहों में 69 साल

आज जब हम एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में 69वां पड़ाव पार कर चुके हैं तो हमारे जेहन में बहुत सारे सवाल आना लाजमी है। हमें जिस ऊंचाई को छूना चाहिए... छुआ क्या? हमें जिस गति से विकास और समृद्धि की ओर बढ़ना चाहिए था... हम उस गति से बढ़े? हालांकि 69 साल के एक लम्बे अरसे में हमने बहुत कुछ पाया, नई-नई तकनीक का विकास किया, अपने सुरक्षा की खातिर परमाणु संपन्न बने। हमने कम्प्यूटर के क्षेत्र में खुद को सॉफ्टवेयर हब के रूप में स्थापित किया, चांद और मंगल तक की दूरी तय की। हमने विश्वस्तरीय इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक और प्रबंधक तराशे। इतनी प्रगति के बावजूद भी सच्चाई यह है कि आज भी लोग खुले आकाश में भूखे सोने को मजबूर है। विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शुमार होने के बावजूद शिक्षा का स्तर संतोषजनक नहीं है। स्वास्थ्य क्षेत्र की भी यही कहानी है।

भारत का दिल कहे जाने वाले गांवों में भी विकास नामक चिड़िया पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ देती है। गांधीजी ने गांवों के विकास एक सपना देखा था कि गांव के लोग भी सुखी-संपन्न और समृद्ध हो। गांवों को समृद्ध और प्रभुत्व संपन्न बनाने के लिए वर्तमान पंचायती राज व्यवस्था बापू के विचारों की ही उपज है।

हम अपने संसाधनों और श्रम शक्ति का सही तरीके से उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। इसके पीछे का कारण जहां एक ओर हमारे देश के नुमाइंदों में इच्छाशक्ति की कमी रही है तो वहीं हम आमजन भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। हम परिस्थितियों से लड़ने के बजाय छुपने का प्रयास करते हैं। कहीं कुछ भी गलत देखते हैं तो विरोध करने के बजाय 'कौन टेंशन मोल ले' की मानसिकता के साथ बच निकलते हैं। लेकिन जब तक हम अपने परिवार के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के लिए अपने जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं करेंगे तब तक हम कभी भी खुशहाल और समृद्ध राष्ट्र नहीं हो सकते है।

हमारे पूर्वजों ने अपनी बलि चढ़ाकर हमें आजादी इसलिए नहीं दिलाई थी कि हम आजाद तरीके से लूट-खसोट कर सके, भ्रष्टाचार करके अपने आने वाली पीढ़ियों के लिए फिक्स डिपोजिट कर सकें। बल्कि उन्होंने खुशहाल और समृद्ध भारत का सपना देखा था जहां रामराज्य हो अर्थात सुखी, संपन्न, स्वतंत्र, शिक्षित, समृद्ध और भाईचारा हो।

-प्रणव पुरुषोत्तम
pranavpurushottam@gmail.com

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