एससी/एसटी कानून- सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर संसद के यू-टर्न से संकट

एससी/एसटी और तीन तलाक जैसे मामलों में कानून बनाने की तेजी दिखाने वाले राजनेता गर्वनेंस से जुड़े मुद्दों पर कानूनी बदलाव में टाल-मटोल करते रहते हैं.

एससी/एसटी कानून- सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर संसद के यू-टर्न से संकट

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 20 मार्च को दिये गये फैसले को उलटने के लिए संसद द्वारा एससी/एसटी एक्ट 1989 में कानूनी बदलाव करना हैरतअंगेज है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद संसद द्वारा शाहबानो मामले पर कानून में बदलाव के बाद अब एससी/एसटी मामले पर सुप्रीम कोर्ट में मामला लम्बित रहने के बावजूद आनन-फानन में सभी दलों के सहयोग से संसद में बिल पारित करने से, क्या इतिहास फिर से नहीं दोहराया जा रहा है ?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में चार महत्वपूर्ण बातें कही थीं

* एफआईआर और गिरफ्तारी से पहले वरिष्ठ अधिकारी द्वारा प्रारम्भिक जांच

* अग्रिम जमानत की व्यवस्था की बहाली

* सरकारी अधिकारी की गिरफ्तारी के पहले नियुक्त प्राधिकारी की लिखित अनुमति और

* आरोपों और दर्ज कारणों पर मजिस्ट्रेट द्वारा विवेक सम्मत निर्णय.

पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस गोयल ने कहा कि उनका निर्णय संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत लोगों के जीवन के अधिकार को सुरक्षित करता है. उन्होंने कहा कि राज्य को आतंकी शक्तियों से लैस नहीं करना चाहिए. उनके अनुसार एससी/एसटी वर्ग की रक्षा के लिए दूसरे लोगों के जीवन के अधिकार से खिलवाड़ का कोई भी प्रावधान असंवैधानिक होगा.

राज्यों का पक्ष ना सुनना बड़ी गलती
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला देने के पहले सभी राज्यों का पक्ष नहीं सुनकर बड़ी गलती की थी. पुनर्विचार याचिका दायर होने के बाद अधिकांश राज्यों ने इस फैसले को लागू करने से इंकार कर दिया था. संविधान के अनुसार कानून-व्यवस्था और पुलिस गिरफ्तारी के मामले राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं. सवाल यह है कि राज्यों से परामर्श किये बगैर, संसद द्वारा कानून में बदलाव की जल्दबाजी क्यों की जा रही है?

पुनर्विचार याचिका अब निरर्थक हो गई
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बड़े पैमाने पर विरोध और संगठित हिंसा के बाद, सरकार ने आनन-फानन में पुनर्विचार याचिका दायर की थी. सुप्रीम कोर्ट द्वारा 3 अप्रैल को नोटिस जारी करने के बाद 16 मई को मामले को स्थगित कर दिया गया. कानून में अकारण बदलाव की जल्दबाजी करने वाले नेताओं ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख सही जवाब भी दायर नहीं किया. संसद द्वारा कानून में बदलाव की पहल के बाद सुप्रीम कोर्ट में लम्बित पुनर्विचार याचिका क्या अब निरर्थक नहीं हो गई है ?

जस्टिस गोयल ने बताया था ऐतिहासिक फैसला
रिटायरमेंट के दिन अपने विदाई भाषण में जस्टिस गोयल ने एससी/एसटी पर अपने फैसले को इमरजेंसी के दौरान दिये गये एडीएम जबलपुर मामले जैसा ऐतिहासिक फैसला बताया था. जस्टिस गोयल ने ही महिला कानूनों के दुरुपयोग को रोकने के लिए भी दिशा-निर्देश जारी किये थे, जिन पर अब सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच द्वारा विचार होगा. संसद द्वारा पारित नये कानून के बाद अब महिलाओं के मामले में गिरफ्तारी के दुरुपयोग को कैसे रोका जा सकेगा? पुनर्विचार याचिका पर बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अटार्नी जनरल से सवाल किया कि यदि उन्हें गलत मुकदमें में फंसा दिया जाये तो फिर कैसे समाधान होगा? निर्दोष लोगों को दमन और बेवजह गिरफ्तारी से बचाने के लिए पुलिस सुधार करने की बजाए सीआरपीसी की धारा-41 पर जोर देने से गिरफ्तारियों और मुकदमों की संख्या में बढ़ोत्तरी से समाज और लोकतन्त्र को भयावह संकट का सामना करना पड़ सकता है.

गर्वनेंस के मामलों पर कानून बनाने पर इतनी तेजी क्यों नहीं
एससी/एसटी और तीन तलाक जैसे मामलों में कानून बनाने की तेजी दिखाने वाले राजनेता गर्वनेंस से जुड़े मुद्दों पर कानूनी बदलाव में टाल-मटोल करते रहते हैं. भारत में इंटरनेट कम्पनियों द्वारा सालाना 20 लाख करोड़ का कारोबार हो रहा है. सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों के फैसले और श्रीकृष्णा समिति की रिपोर्ट के बावजूद संसद द्वारा डाटा प्रोटेक्शन और टैक्सेशन जैसे महत्वपूर्ण मामलों पर जल्द कानून बनाने की बजाय, वोट बैंक की राजनीति पर जोर होने से, न्यू इंडिया का निर्माण कैसे होगा?

(लेखक सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)