थाईलैंड: राजतंत्र, सैन्य शासन और लोकतंत्र के बीच जूझते देश की दिलचस्प कहानी

थाईलैंड में हाल ही में हुए चुनाव को लेकर दुनिया के लोकतंत्र समर्थकों में ज्यादा उत्साह नहीं है. 

थाईलैंड: राजतंत्र, सैन्य शासन और लोकतंत्र के बीच जूझते देश की दिलचस्प कहानी
इस साल थाईलैंड में हो रहे चुनाव में सेना और राजपरिवार की भी भूमिका है (फोटो: Reuters)

नई दिल्ली: दक्षिण पूर्व एशिया में स्थित सफेद हाथियों का देश थाईलैंड इन दिनों चुनाव के कारण दुनिया भर की सुर्खियों में है. 1939 तक स्याम के नाम से जाना जाता रहा थाईलैंड का वर्तमान नाम थाई शब्द से बना है जिसका अर्थ है स्वतंत्रता. यहां की संस्कृति पर प्राचीन भारत और चीन का गहरा असर है. इसके अलावा जापान का प्रभाव भी यहां दिखाई देता है. थाईलैंड के मंदिर, प्राकृतिक सौन्दर्य इस देश में पर्यटन को प्रमुख उद्योग बनाते हैं. राजनैतिक अस्थिरता के बाद भी यहां के लोग सामान्यतः शांत स्वभाव के माने जाते हैं. 

क्यों सुर्खियों में है थाईलैंड 
सैन्य तख्तापलट के बाद से थाईलैंड में पहली बार आम चुनाव के लिए हुए मतदान हुए हैं. अभी पूरे परिणामों की घोषणा नहीं हुई है. थाईलैंड के प्रधानमंत्री और 2014 तख्तापलट का नेतृत्व करने वाले सैन्य प्रमुख प्रयुथ चान ओचा को सत्ता में बने रहने की आस लगाए हैं. वहीं विभिन्न राजनैतिक दल सैन्य शासन का विरोध कर रहे हैं. वैसे तो थाईलैंड में सेना के 2014 में तख्तापलट के बाद इस साल पहली बार चुनाव हो रहे हैं, यहां तो लोकतंत्र रहा है लेकिन सेना का दखल कभी खत्म नहीं हो सका जबकि देश का प्रमुख हमेशा से ही यहां के राजा को माना गया है. 1932 से यहां ज्यादातर सैन्य शासन रहा है. बीच-बीच में लोकतांत्रिक सरकारें भी आई हैं. 1932 से अब तक सैन्य दखल से 12 बार सत्ता पलट हो चुका है. 1990 के बाद से लोकतंत्र मजबूत होता तो दिखा लेकिन यहां सैन्य प्रभाव खत्म नहीं हुआ. 

यह भी पढ़ें: क्या थाईलैंड में हुए चुनाव वहां सच्चे लोकतंत्र की वापसी के लिए काफी हैं?

वर्तमान राजनैतिक हालात
आज थाईलैंड में संवैधानिक राजशाही है. चक्री वंश के 10 राजा महा वाजीरालोंगकोर्न अभी राजगद्दी पर 2016 के अंत से विराजमान हैं. फिलहाल देश में चुनाव जुन्टा (सैन्य) शासन में हुए हैं. वर्तमान सैन्य शासन के प्रधानमंत्री प्रयुथ चान ओचा 2014 से सत्ता में हैं. उन्होंने भी परंपरावादी और सेना समर्थित प्लांग प्रचा राथ पार्टी (पीपीआरपी) के समर्थन से चुनाव लड़ा है. 

Election in Thailand

भौगोलिक परिदृश्य
थाईलैंड दक्षिण पूर्व एशिया का कितना महत्वपूर्ण देश है यह उसकी भौगोलिक परिस्थिति से स्पष्ट है. 513,115 वर्ग किलोमीटर (198,115 वर्ग मील) में फैला यह देश उत्तर पश्चिम और पश्चिम में म्यांमार, पूर्व में कंबोडिया, उत्तर पूर्व में लाओस और दक्षिण में मलेशिया से अपनी जमीनी सीमा साझा करता है. यह दक्षिण पूर्व में अंडमान सागर, दक्षिण में थाईलैंड की खाड़ी से घिरा है. इंडोचायना प्रायद्वीप में स्थित इस देश का आकार कुल्हाड़ी के जैसा है. अपने तीनों ओर पर्वत श्रंखलाओं से घिरा यह देश कभी भी किसी यूरोपीय देश का उपनिवेश नहीं रहा. यहां कटिबंधीय मानसून की जलवायु का प्रभाव सबसे ज्यादा माना जाता है, लेकिन उष्ण सवाना और आर्द्र उष्णकटिबंधीय जलवायु का प्रभाव भी कई क्षेत्रों में प्रमुखता से दिखाई देता है. 

यह भी पढ़ें: म्यांमार: समझिए इसका ‘भूगोल’, जहां दो बार आतंकियों पर बड़े हमले कर चुकी है भारतीय सेना

आर्थिक स्थिति
थाईलैंड की अर्थव्यवस्था प्रमुख तौर पर पूंजीवादी है जिसमें समाजवाद के तत्व भी मिलते हैं. थाई यहां की मूल भाषा है और अंग्रेजी को दूसरी भाषा का दर्जा दिया गया है. पर्यटन यहां का प्रमुख उद्योग है. पर्यटन के अलावा यहां कपड़ा, खाद्य प्रसंस्करण, पेय पदार्थ, तंबाखू, सीमेंट, सूचना तकनीकी, प्लास्टिक और टिन टंग्सटन जैसी धातुओं का उत्पदान संबंधी उद्योग प्रमुख हैं. कृषि उत्पादों में चावल, कसावा, रबर, मक्का, गन्ना, नारियल सोयाबीन यहां की उपजाऊ भूमि के कारण देश की आर्थिक स्थिति में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं. स्थानीय लोगों में किसानों और व्यापारियों की बहुतायात है. ‘थाई बात’ यहां की मुद्रा है. 

संक्षिप्त इतिहास
थाईलैंड में आज से 20,000 वर्ष पूर्व तक मानव के रहने के प्रमाण मिले हैं. लगभग 2000 ईसापूर्व तक यहां धान की खेती की जाती थी. दूसरी ईसापूर्व में सबसे पहले यहां फुनान राजवंश ने शासन किया. इसके बाद मोन साम्राज्य का 6वीं ईसवीं तक प्रभाव रहा. 9वीं सदी तक यहां ख्मेर साम्राज्य का प्रभुत्व छा गया. इस दौरान भारत की संस्कृति का यहां गहरा प्रभाव रहा है और बौद्ध धर्म का भी प्रसार हुआ. कहा जाता है कि 11वीं सदी से थाई मूल के लोग वर्तमान थाईलैंड के क्षेत्र में आकर बसने लगे. 13वीं सदी से ख्मेर साम्राज्य के कमजोर होने के साथ है यहां छोटे-छोटे राज्य उदित हुए जिसमें सुकोथाई प्रमुख था, लेकिन 15वी सदी तक अयुत्थाया साम्राज्य का प्रभुत्व इस क्षेत्र ख्मेर साम्राज्य से ज्यादा बड़ा हो गया जो 17वीं सदी के मध्य तक कायम रहा. अयुत्थाया साम्राज्य का अंत बर्मा युद्ध के साथ हुआ जिसके बाद तक्सिन ने थाईलैंड के पूरे इलाके को वापस हासिल किया लेकिन उसकी हत्या के बाद 1782 में चक्री साम्राज्य की स्थापना हुई जो अब तक कायम है. 

राजसत्ता नहीं गंवाई, लेकिन अपने इलाके जरूर गंवाए
16वीं सदी की शुरुआत में पुर्तगाली यहां आने वाले पहले यूरोपीय रहे. 19वीं सदी के मध्य में हुए पहले अफीम युद्ध के बाद ब्रिटेन के साथ हुई बोरिंग संधि के बाद
 थाईलैंड में बाजार व्यवस्था का पनपना शुरू हुआ और बैंकॉक में विदेशी लोगों की तादात बढ़ने का भी. इसी दौरान राजा मोंग्कुट के शासन काल में बौद्ध धर्म का प्रभाव और प्रचार बढ़ा. इसके बाद 19वीं सदी के अंत और 20 सदी के आरंभ तक स्याम (थाईलैंड) में तो कई सुधार हुए लेकिन उसका आसपास के इलाके यूरोपीय शक्तियों के हाथ (पूर्व में कंबोडिया और लाओस फ्रांस को और मलाया क्षेत्र ब्रिटेन को) जाने लगे. इन सुधारों में प्रशासनिक, न्यायिक, शैक्षणिक, निर्माण आदि शामिल थे. 

यह भी पढ़ें: इंडोनेशिया: भारत की तरह आतंकवाद से जूझ रहा है दुनिया का सबसे बड़ा इस्लामिक देश

सत्ता संघर्ष में सेना की मौजूदगी
20वीं सदी में चक्र शासकों ने देश में आधुनिकरण और राष्ट्रप्रेम की भावना का विकास किया, लेकिन 1930 के दशक में देश की आर्थिक स्थिति  और अन्य शासन व्यवस्था से असंतुष्ट लोगों ने पीपुल्स पार्टी के नेतृत्व में, जिन्हें देश की सेना का समर्थन प्राप्त था, देश में तख्तापलट कर दिया. पार्टी के प्रस्तावित आर्थिक सुधारों को स्वीकार नहीं किया गया और एक बार फिर बगावत हो गई. इस बार राजशाही का संपूर्ण नियंत्रण तो खत्म हो गया, लेकिन वह पूरी तरह से खत्म नहीं हुई. यहां से देश की शासन व्यवस्था में सेना का दखल बढ़ गया और नए लेकिन उम्र में छोटे राजा के शासन में सेना का ताकत बढ़ती गई. सेना ने द्वितीय विश्व युद्ध में जापान से हाथ मिला लिया. 1938 में  विभूसंग्राम ने, जो कि 1932 में तख्तापलट का नेता रहा था, सेना के साथ सत्ता अपने हाथ में ले ली. द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद विभूसंग्राम को सत्ता से हटना पड़ा. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सम्राट आनंद की हत्या के बाद कुछ समय तक देश में राजनैतिक अस्थिरता रही और 1948 में विभूसंग्राम की एक बार फिर वापसी हुई. 

अमेरिका का मिला खुला समर्थन
शीत युद्ध के दौरान थाईलैंड साटो का सदस्य बन गया जो कि इस तरह यहां के शासन को अमेरिका का समर्थन मिला. इसकी वजह से देश ने काफी उन्नति भी की.  इस दौरान राजशाही की पुनर्स्थापना तो हुई लेकिन सैन्य शासन और देश का आर्थिक विकास कायम रहा. 1973 की क्रांति में राजशाही की वापसी के साथ सैन्य शासन का अंत हुआ. नए संविधान के साथ देश में संसदीय लोकतंत्र की स्थापना हुई लेकिन लोकतंत्र ज्यादा देर तक कायम नहीं रह सका. तीन साल के अंदर फिर से सैन्य शासन (इस बार राजा के समर्थन से) की वापसी हुई, लेकिन तब तक देश में राजनैतिक जागरुकता आ चुकी थी. 1980 तक शासन सेना और संसद के बीच बंट गया था और राजशाही कायम रही. 1988 में संसद के नेता का शासन आ गया. 1990 से 2006 देश में लोकतंत्र तो मजबूत रहा, लेकिन लोकतांत्रिक शासन कमजोर ही रहा है.

यह भी पढ़ें: वियतनाम: छोटा सा देश जहां अमेरिका को युद्ध में होना पड़ा था शर्मिंदा
 
मंदी के बाद फिर से लोकतंत्र
1997 में आर्थिक मंदी के बाद देश में नया संविधान लागू हुआ जो कि 16वां संविधान था. थाईलैंड की मुद्रा बुरी तरह गिरने से यह मंदी दक्षिण पूर्व एशिया से होकर दुनिया भर को प्रभावित करने लगी थी. 2001 के चुनावों में ‘थाई राक थाई’ पार्टी के प्रमुख थाकसिन शिनवात्रा को जीत मिली लेकिन पूर्ण बहुतम उन्हें 2005 के चुनावों में मिला. थाकसिन शिनवात्रा पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे और उन्हें अपने परिवार के लिए कई आर्थिक अपराधों के आरोपों का सामना करना पड़ा. 2011 के चुनावों में थाकसिन की बहन यिंगलुक शिनवात्रा प्रधानमंत्री चुनी गईं. जिन्हें 2014 में हटा दिया गया.