झारखंड बीजेपी की पराजय के पांच प्रमुख व्यावहारिक कारण

झारखण्ड में बीजेपी सरकार का फिर से न बन पाना इन ख़ास व्यावहारिक कारणों से हुआ:  

झारखंड बीजेपी की पराजय के पांच प्रमुख व्यावहारिक कारण

रांची. रघुवर दास की झारखंड में सरकार दुबारा न बन सकी. बीजेपी हाई कमान के लिए ये दूसरी लगातार बड़ी शिकस्त है. इससे पहले महाराष्ट्र में भी बीजेपी की सरकार बनते बनते रह गई. क्या इसके पीछे बीजेपी का प्रदेशों में डूबता जनाधार है या कारण है और कुछ. आइये जानते हैं वे पांच कारण जो ज़िम्मेदार हैं झारखंड में भाजपा की सरकार के न बन पाने के.

घर-घर रघुवर नारा आधारहीन था 

चुनाव में इस्तेमाल किया गया नारा घर घर रघुवर हर हर मोदी की तर्ज में तैयार किया गया था. शायद इसे बीजेपी का अति-आत्मविश्वास ही कहा जा सकता है कि पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास को चुनाव का केंद्र बिंदु बना कर चुनाव लड़ा गया. आदिवासी बहुल इस राज्य में कम से कम रघुवर दास तो आम जनता के राजनीतिक रोल मॉडल नहीं थे. हालत इतनी बिगड़ी कि मुख्यमंत्री रघुवर समेत उनकी कैबिनेट के 4 मंत्री भी चुनाव हार गए. 

करिया मुंडा की सीधे-सीधे अनदेखी हुई 

झारखंड में करिया मुंडा बीजेपी के सबसे वरिष्ठ नेता हैं जो पिछली बार खूंटी चुनाव क्षेत्र से भाजपा  सांसद भी रहे हैं. पद्मभूषण पुरस्कार प्राप्त करिया मुंडाऔर आदिवासी होने के कारण राज्य में उनका जनाधार भी है.किन्तु उनको इस चुनाव में महत्व न देना पार्टी को भारी पड़ गया. करिया मुंडा आठ बार सांसद, चार बार केंद्रीय मंत्री और दो बार विधायक रहे हैं. उनको यदि आगे रख कर चुनाव प्रचार किया जाता तो शायद चुनाव का परिणाम कुछ और होता. 

बाबूलाल मरांडी से समझौता नहीं किया 

झारखंड राज्य में बाबूलाल मरांडी दूसरे जन-लोकप्रिय चेहरे हैं.  आदिवासी होने के कारण इस प्रदेश में उनकी छवि अपने नेता वाली है. बीजेपी छोड़ने के बाद उन्होंने झारखंड विकास मोर्चा नामक अपनी जो पार्टी बनाई उससे उनका और बीजेपी दोनों का ही नुकसान हुआ. चुनाव के समय उनसे समझौता करके चलने से और बीजेपी के अपने गठबंधन में उनको जोड़ लिए जाने से परिणाम बीजेपी के लिए अवश्य ही इतने तकलीफदेह नहीं होते.

केवल मोदी लहर पर सवारी की कोशिश हुई 

मोदी लहार पर सवारी चुनाव में बीजेपी को जीता सकती थी इसमें कोई संदेह नहीं लेकिन ये तब होता जब यह राज्य झारखंड न होता. आदिवासी बहुल यह राज्य मूल रूप से देश की मुख्यधारा से सीधा सीधा नहीं जुड़ा है. यहां मोदी की राष्ट्रीय छवि से अधिक महत्वपूर्ण पार्टी का अपना जनाधार होता. जनाधार इसलिए नहीं बन सका क्योंकि कोई लोकप्रिय आदिवासी चेहरा सीधे सीधे मुखयमंरी पद के लिए बीजेपी की तरफ से सामने नहीं रखा गया. रघुवर दास पार्टी की पसंद तो थे पर प्रदेश की जनता की नहीं !

जनप्रिय कार्यों में कोताही हुई 

जनता को पसंद आने वाले काम या तो कम हुए या सीधे तौर पर कहें तो नहीं ही हुए. कुछ ऐसा विशेष नहीं था इस बार जिसे दिखा कर मुख्यमंत्री रघुवर दास जनता का दिल जीत पाते. प्रदेश में जन-रूचि के कार्य करना ज़मीन से जुड़े होने का प्रमाणपत्र होता है जो रघुवर दास की सरकार के पास नहीं था.