हरियाणा की तर्ज पर झारखंड में भी हंग असेंबली के दिख रहे आसार

झारखंड विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिख रहा. पार्टी में हंग असेंबली की तस्वीर बनती नजर आ रही है. सवाल यह है कि हेमंत सोरेन या रघुबर दास, कौन होगा झारखंड का बॉस ?  

Written by - Zee Hindustan Web Team | Last Updated : Dec 23, 2019, 09:21 AM IST
    • रूझानों में आजसू दिख रही है किंगमेकर पार्टी
    • झारखंड में हरियाणा सी हो सकती है तस्वीर
हरियाणा की तर्ज पर झारखंड में भी हंग असेंबली के दिख रहे आसार

रांची: झारखंड का सेहरा किसके सर सजेगा, यह सवाल आज लगभग तय हो जाएगा. पहले चरण के वोटिंग के बाद से ही जो यह कहा जा रहा था कि भाजपा के लिए झारखंड में अपना किला बचा पाना काफी मुश्किल सा लग रहा है. शुरुआती रूझान भी कुछ ऐसे ही हैं. झामुमो के नेतृत्व वाली महागठबंधन इस बार झारखंड के चुनाव में 34 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है. भाजपा दूसरे नंबर पर खिसक गई है. भाजपा फिलहाल 31 सीटों पर आगे चल रही है. वहीं आजसू 7 और झाविमो 4 सीटों पर आगे चल रही है. 

रूझानों में आजसू दिख रही है किंगमेकर पार्टी

झारखंड चुनाव में शुरुआती रूझानों में भाजपा सबसे ज्यादा सीटों पर बढ़त बनाने वाली सिंगल लार्जेस्ट पार्टी भले ही हो लेकिन बात जब सरकार बनाने की आएगी तो भगवा झंडे को किसी न किसी से सहयोग लेने की जरूरत पड़ेगी. झारखंड में चुनावी समीकरणों में झामुमो+ को काफी फायदा हुआ है. लेकिन सबसे अधिक लाभ अगर किसी पार्टी को होता दिख रहा है तो वह है भाजपा की पुरानी सहयोगी दल आजसू. भाजपा ने ऐन चुनाव के वक्त आजसू का दामन छोड़ दिया था.

सीट समीकरणों के न बन पाने की वजह से आजसू ने अकेले ही कई सीटों पर भाजपा को काफी नुकसान पहुंचा दिया है. वहीं बाबूलाल मरांडी की झाविमो जो 4 सीटों पर आगे चल रही है, वह इस दौड़ में कितनी भूमिका निभाएगी, फिलहाल इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है. 

झारखंड में हरियाणा सी हो सकती है तस्वीर

झारखंड में शुरुआती रूझान अगर लंबे समय तक यूं ही रहे तो इसकी तस्वीर भी कुछ हरियाणा सी होगी. आजसू और झाविमो सरकार बनाने में एक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. हालांकि, अन्य दलों के हालात ऐसे तो नहीं की वे कुछ उलटफेर कर सके हों, लेकिन हरियाणा की तरह ही मतगणना खत्म होने के बाद उनकी भूमिका काफी बड़ी हो सकती है. 

रूझानों के बाद यह तो तय हो गया है कि रघुबर दास की सरकार का कार्यकाल काफी सफल भले ही माना जाता हो लेकिन जनता उतनी भी आशावादी नहीं रही उनको लेकर. इसके अलावा भाजपा के पुराने सहयोगी और पार्टी के ही बागी नेताओं ने खेल कुछ ज्यादा बिगाड़ दिया. वैसी सीटों पर या तो महागठबंधन को ज्यादा फायदा मिला या बागी नेता ही जीत हासिल करते हुए नजर आ रहे हैं. 

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