झारखंड में चुनाव आते ही पार्टियों को याद आए आदिवासी

झारखंड में विधानसभा चुनाव होने जा रहा है. पिछले पांच साल भगवा झंडे के साथ ताल ठोंक कर आई भाजपा सरकार एक बार फिर रघुबर दास के नेतृत्व में परचम लहराने को आतुर है. लेकिन उससे पहले बिरसा मुंडा की धरती पर उनके ही लोगों को लेकर तीखी बहस शुरू हो गई है. 

झारखंड में चुनाव आते ही पार्टियों को याद आए आदिवासी

रांची: झारखंड के चुनाव में आदिवासी फैक्टर शुरू से काम करता आया है. यह तब भी काम कर रहा था जब झामुमो के तत्कालीन सर्वेसर्वा शिबू सोरेन ने खुद को आदिवासियों का हितैषी बता कर झारखंड में विवादास्पद तरीके से सरकार बना ली. हालांकि सरकार बहुत लंबी नहीं चली लेकिन झारखंड में आदिवासी फैक्टर को भुनाने का सिलसिला आज तक चल रहा है. देश में भले आदिवासी जनसंख्या अल्पसंख्यकों में गिना जाता हो लेकिन झारखंड में तो 27 फीसदी के साथ सबसे अधिक जनसंख्या इनकी ही है. जाहिर है सूबे में सरकार किसकी होगी इसका एक बड़ा दारोमदार आदिवासियों के एक-एक वोट पर टिका है. इसी गणित को भुनाने में तमाम दल रस्साकशी में लग गए हैं. 

भूमि अधिग्रहण बिल पर चिंतित हैं आदिवासी

पिछले दिनों बिरसा मुंडा की जयंती थी और इसी दिन झारखंड दिवस भी मनाया जाता है. इसी मौके पर आदिवासियों के हक की सरकार कौन पर बहस छिड़ी. शुरुआत तो आदिवासियों से हुई लेकिन खत्म सियासी गलियारों में बयानबाजियों पर जा कर ही हो सका. झारखंड के खूंटी जिले के डाड़ानुमा निवासी सोमा मुंडा ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि "झारखंड एक आदिवासी राज्य है और यहां मुख्यमंत्री गैर-आदिवासी को बना दिया गया है.

अब स्थानीय नीतियों की जगह उल्टी नीतियां लाई जा रही है. भूमि अधिग्रहण बिल यहां के आदिवासियों के लिए चिंता का विषय है, लेकिन सरकार उसे ही ला रही है. जंगल जमीन की देखरेख के लिए जो सीएनटी कानून है, उससे छेड़छाड़ किया जा रहा है. वनाधिकार कानून को भी खत्म करने की कोशिश की जा रही है. यह सब ठीक नहीं." 

आदिवासियों ने बताया किन मुद्दों पर करेंगे वोट

दिलचस्प बात यह है कि डाड़ानुमा गांव भारत सरकार में आदिवासी कल्याण मंत्री अर्जुन मुंडा के संसदीय क्षेत्र में आता है, बावजूद इसके यहां कुछ लोग नाराज हैं. दरअसल, झारखंड के आदिवासियों में से ज्यादातर को इस बात का डर सता रहा है कि सीएनटी कानूनों में बदलाव कर के उनकी जमीनें न छीन ली जाए. कानून के तकनीकी पक्ष को जनता के बीच विपक्षी पार्टियां अपने तरीके से भुनाने में लगी हुईं हैं. हालांकि, लोगों ने यह भी संकेत दे दिया कि वे किसे और किन मु्द्दों पर वोट करेंगे. ग्राम सभाओं को लगातार कराने से लेकर राजनीति में आदिवासियों की भागीदारी के प्रति जो भी आगे आएगा, आदिवासी समाज उसे ही अपना समर्थन देगी. 

झामुमो ने कहा शिबू सोरेन आदिवासियों का हितैषी

इसी के मद्देनजर सभी पार्टियां अपने-अपने हिसाब से दांवों में लग गई. झामुमो के राष्ट्रीय महासचिव ने कहा कि "झारखंड में शिबू सोरेन के संघर्षों की बदौलत ही आदिवासियों-मूलनिवासियों के हित के लिए आंदोलन चलाए गए. उस वक्त हमारी डेमोग्राफी और हेरिटेज को खत्म करने की कोशिश की जा रही थी. तब 'गुरूजी'(शिबू सोरेन) ने आदिवासियों के अपार समर्थन से उस समस्या से संघर्ष किया. हम उसी विचारधारा की पार्टी हैं जो जल-जंगल-जमीन पर अधिकार की आदिवासियों की लड़ाई में उनके साथ खड़े रहे. विकास के साथ सांस्कृतिक और सामाजिक संरक्षण और उनके अधिकारों की रक्षा के पक्षधर बन कर रहे." इसके बाद कांग्रेस नेता केएन त्रिपाठी का नंबर आया. उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार की नीतियां आदिवासी समाज के खिलाफ हैं. उनके आरक्षण पर चोट करने वाली हैं. उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासियों की जमीनें छीनकर उद्योगपतियों के लिए भूमि बैंक बना दिया गया है. इससे आदिवासी नाराज हैं. 

भाजपा ने बंद की सबकी बोलती

अब इन बयानों के बाद झामुमो और कांग्रेस जरा आश्वस्त सी होने लगी कि उन्होंने मौके को भुना लिया. इसी बीच भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता दीनदयाल वर्णवाल ने सभी पार्टियों के बयानबाजियों की जमकर आलोचना की. उन्होंने झारखंड में रघुबर दास सरकार की उपलब्धियों को गिनाना शुरू करते हुए कहा कि भाजपा सरकार ने आदिवासियों के विकास के लिए विकास समितियों का गठन किया और उन्हें पांच-पांच लाख रुपए तक खर्च का अधिकार दिया. यहीं नहीं आदिवासी समुदाय के बच्चों को सिविल सेवा तैयारी के लिए एक लाख तक की मदद राशि भी दी गई. 521 आदिवासी सांस्कृतिक केंद्र खुलवाए गए. 11 हजार से भी अधिक टोलों को 424 करोड़ की लागत से बनाई गई पाइपलाइन से पानी पहुंचाई गई. आदिवासी धार्मिक स्थलों को राजकीय धर्म स्थलों का दर्जा दे उसे एक रूप देने की कोशिश की गई. और तो और आदिवासियों के उत्थान के लिए उन्हें कई सरकारी योजनाओं से जोड़ा गया. 

चुनावी दंगल में कौन है आगे ?

झारखंड में चुनावी दंगलों में इन बयानबाजियों से यह तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि आदिवासी फैक्टर का प्रभाव कितना बड़ा है. कोई भी पार्टी इसे अपने हाथ से जाने देना नहीं चाहती. पिछली बार भाजपा सरकार को आदिवासियों का बड़ा साथ मिला था और पार्टी ने 37 सीटों पर जीत दर्ज कर सरकार बनाई थी. इतना ही नहीं सीएम रघुबर दास झारखंड में पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले पहले मुख्यमंत्री बने. राजनीतिक विश्लेषकों का तो यह भी मानना है कि वर्तमान रघुबर सरकार ने प्रदेश में अच्छा काम किया है और चुनाव में पार्टी का पलड़ा फिलहाल के लिए भारी है.