अदालतों में अधिक नहीं, अच्छे जजों की जरूरत: सर्वोच्च न्यायलय

देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि अधिक नहीं, अच्छे न्यायाधीशों की जरूरत है.

Written by - Zee Hindustan Web Team | Last Updated : Nov 29, 2022, 04:17 PM IST
  • अधिक नहीं, अच्छे न्यायाधीशों की आवश्यकता
  • सुप्रीम कोर्ट ने विचार करने से किया इनकार
अदालतों में अधिक नहीं, अच्छे जजों की जरूरत: सर्वोच्च न्यायलय

नई दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या दोगुनी करने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए कहा कि अधिक न्यायाधीशों का मतलब अधिक केसों का निपटान नहीं है, बल्कि अच्छे न्यायाधीशों की आवश्यकता है.

जजों की संख्या को दोगुना करने की मांग
प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय से कहा कि न्यायाधीशों की संख्या को दोगुना करना लंबित मामलों को हल करने का समाधान नहीं है.

मुख्य न्यायाधीश ने उपाध्याय से कहा, अधिक न्यायाधीशों का मतलब अधिक केसों का निपटान नहीं है, आपको अच्छे न्यायाधीशों की आवश्यकता है.

याचिका में क्या-क्या की गई थी अपील?
उपाध्याय ने अपनी याचिका में कहा था कि इस समय अदालतों में लगभग 5 करोड़ मामले लंबित हैं. इसका अर्थ है कि लगभग 20 करोड़ लोग प्रभावित हैं, यह अमेरिका की आबादी के करीब है. इसलिए मामलों को निपटाने के लिए न्यायाधीशों की संख्या दोगुनी की जानी चाहिए. हालांकि पीठ याचिकाकर्ता के दलीलों से संतुष्ट नहीं हुई.

पीठ ने कहा, न्यायाधीशों की संख्या दोगुनी करना समाधान नहीं है. हर बुराई को देखने का मतलब यह नहीं है कि जनहित याचिका दायर की जानी चाहिए.

रिक्त स्थान भरने में ही आ रही है कठिनाई
मुख्य न्यायाधीश ने उपाध्याय से कहा न्यायाधीशों को मौजूदा रिक्त स्थानों को भरना कितना मुश्किल है, और कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में 160 सीटों को भरने में कठिनाई आ रही और याचिकाकर्ता 320 की मांग कर रहा है. न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा: क्या आप बॉम्बे हाईकोर्ट गए हैं? वहां एक भी नए जज को नहीं जोड़ा जा सकता है क्योंकि कोई बुनियादी ढांचा नहीं है. अधिक जजों की नियुक्ति समस्या का समाधान नहीं है.

अदालत की टिप्पणी के बाद उपाध्याय अपनी याचिका वापस ले ली. पीठ ने कहा कि याचिका को वापस ले लिया गया मान कर खारिज कर दिया गया और याचिकाकर्ता को कुछ शोध करने के बाद नई याचिका दायर करने की छूट दी गई.

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