CAA विरोधी कट्टरपंथियों पर भरोसे के पहले याद कीजिए कश्मीरी पंडितों का हाल

इंसानियत से प्यार करने वाला कोई भी शख्स जनवरी महीने की इन तारीखों को भूल नहीं सकता. जब मजहबी कट्टरपंथियों ने कश्मीरी पंडितों को उनके घरों से भगाने के लिए जुल्मो-सितम की इंतेहा कर दी थी. वो 19 जनवरी 1990 का दिन था. 30 साल बीत चुके हैं, लेकिन मासूम कश्मीरी पंडितों पर जुल्म करने वालों को उनके अंजाम तक पहुंचाने का काम अब तक बाकी है.   

CAA विरोधी कट्टरपंथियों पर भरोसे के पहले याद कीजिए कश्मीरी पंडितों का हाल

नई दिल्ली: 19 जनवरी का दिन देश के हर मानवतावादी शख्स को अपने जेहन में पत्थर की लकीर की तरह जमा लेना चाहिए. क्योंकि इसी दिन से बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को उनके घरों से खींचकर मारना-काटना शुरु किया गया था. उनकी स्त्रियों के साथ पिता, भाई, बेटों, रिश्तेदारों की मौजूदगी में बलात्कार किया गया. असहाय लाचार लोगों के हाथ पैरों में कील ठोंक दी गई, उन्हें जिंदा आरियों से काटा गया. लेकिन उनके मजहबी कट्टरपंथी पड़ोसी, जो सदियों से उनके साथ रह रहे थे, वो मजहबी नारे लगाते हुए खुशियां मनाते रहे. 

 

• 15 जनवरी 1990 को एक सरकारी कर्मचारी एम.एल. भान को श्रीनगर के खोनमोह में मार डाला गया था. श्रीनगर के लाल चौक से बलदेव राज दत्ता का अपहरण कर लिया गया था और चार दिन बाद 19 जनवरी, 1990 को श्रीनगर के नई सड़क पर उनकी क्रूरतापूर्वक क्षत-विक्षत की गई लाश मिली.  

• 25 जनवरी 1990 को स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना और उनके कुछ सहकर्मी एयरपोर्ट जाने के लिए रावलपुरा बस स्टैंड पर भारतीय वायु सेना की बस का इंतजार कर रहे थे. जब एक मारुति जिप्सी और एक दोपहिया वाहन पर सवार चार-पांच JKLF आतंकवादियों ने उन्हें घेर लिया और उनपर एके-47 से गोलियों की बौछार कर दी. स्क्वैड्रन लीडर खन्ना और दूसरे 13 भारतीय वायुसेना के कर्मचारी जमीन पर गिर गए. इस हमले में खन्ना के साथ तीन लोगों की मौत हो गई और 10 घायल हो गए. 

बाद में यासीन मलिक ने टिम सेबेस्टियन के साथ एक साक्षात्कार में इस हत्या की जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि तब वह मुख्य कमांडर इशफाक वानी के अधीन काम कर रहा था और जेकेएलएफ का एरिया कमांडर था. यासीन ने इन हत्याओं का बचाव करते हुए कहा कि भारतीय वायुसेना के जवान निर्दोष नहीं थे बल्कि 'दुश्मन' के एजेंट थे.  

• 1 फरवरी 1990 को एक केंद्रीय सरकारी कर्मचारी कृष्ण गोपाल बेरवा और राज्य सरकार के एक कर्मचारी रोमेश कुमार थुस्सू को कुपवाड़ा के त्रेहगाम में गोली मार दी गई.  

• 2 फरवरी 1990 को एक युवा कश्मीरी पंडित सतीश कुमार टिकू को फारूक अहमद डार (उर्फ बिट्टा कराटे) के नेतृत्व में हत्यारों के एक समूह ने पॉइंट ब्लैंक रेंज पर गोली मार दी. 

• 13 फरवरी 1990 को निर्देशक दूरदर्शन लसा कौल की हत्या कर दी गई थी. उनकी गतिविधियों की जानकारी कथित तौर पर उनके एक मुस्लिम सहयोगी ने ही लीक की थी.  उसी दिन सैन्य इंजीनियरिंग सेवा (एमईएस) में काम कर रहे रावलपोरा के रतन लाल भी मारे गए थे. 

• 16 फरवरी 1990 को अनिल भान की हत्या फारुख अहमद डार उर्फ बिट्टा कराटे ने कर दी. फारुख पर 34 कश्मीरी पंडितों की हत्या का इल्जाम था. जिसके बारे में वह गर्व से सबको सुनाता था.  

• 23 फरवरी 1990 को अशोक काजी को घुटनों में गोली मारी गई और उन्हें लात मारकर नाले में फेंक दिया गया.  उनपर पेशाब भी किया गया.  जब वह तड़प-तड़प कर मर रहे थे. तब उनपर गोलियों की बौछार कर दी गई.  

• 27 फरवरी 1990 को नवीन सप्रू को हब्बा कदल पुल के पास गोली मार दी गई. हत्यारों ने फिर उसके चारों ओर खूंखार जानवरों की तरह नृत्य किया. यहां तक कि अपनी आखिरी सांसें ले रहे इस शख्स को झकझोरते हुए उसकी मौत को और पीड़ादायक बनाया गया.  

• 1 मार्च 1990 को सूचना विभाग के पी एन हांडू की हत्या कर दी गई और बडगाम के तेजकिशन को फांसी पर लटका दिया गया. 

•18 मार्च 1990 राज्यपाल के निजी सहायक आर.एन. हंडू को नरसिंहगढ़, श्रीनगर में उनके घर के गेट के बाहर मार दिया गया. उस समय वह अपने कार्यालय जाने के लिए आधिकारिक वाहन पर सवार होने वाले थे. 

• 19 मार्च 1990 बी के गंजु को तब मार दिया गया, जब उनके मुस्लिम पड़ोसी ने उनके छुपने के ठिकाने की खबर आतंकवादियों को दे दी थी.  

• 20 मार्च 1990 ए के रैना, उप निदेशक, खाद्य और आपूर्ति, की श्रीनगर में उनके कार्यालय में हत्या कर दी गई थी.  जब उनकी मौत हो रही थी तो उनके मातहत कर्मचारी चुपचाप उन्हें देख रहे थे. 

• 10 अप्रैल 1990 एच एल खेरा, एच.एम.टी. के महाप्रबंधक को श्रीनगर में आतंकवादियों द्वारा गोली मार दी गई थी.  

• 19 अप्रैल, 1990 को सरला भट्ट के साथ कई मुस्लिमों के साथ सामूहिक बलात्कार किया. जिसके बाद उनकी निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी. बाद में सरला का नग्न शव जनता के बीच सार्वजनिक रुप से सड़क के किनारे फेंक दिया गया. 

• 24 अप्रैल, 1990 को गुलाब बाग, श्रीनगर के 45 वर्षीय बंसी लाल सप्रू को उनके पड़ोसियों ने घेर लिया और करीब तीन गोलियां मारकर उनकी हत्या कर दी.  

• 24 अप्रैल, 1990 को अनंतनाग के मट्टन के रविन्द्र कुमार पंडिता की घर लौटते हुए करीब से गोली मारकर हत्या कर दी गई. जब वह मर गए, तो हत्यारों ने उसके शव के चारो तरफ खुशी से नृत्य किया. 

• 27 अप्रैल, 1990 को साधु गंगा, कुपवाड़ा में अपने घर से अगवा किए गए बृज नाथ शाह की लाश दो दिनों के बाद मिली.  उनके होठों के सिरे सिल दिए गए थे.  

• 30 अप्रैल 1990 सर्वानंद कौल `प्रेमी’ और उनके बेटे वीरेंद्र कौल को उनके घर से अगवा कर लिया गया और दो दिन बाद उनके शव लटके पाए गए.  उनके अंग टूटे हुए थे, बाल उखड़े हुए थे, और उनकी त्वचा के कुछ भाग जले हुए पाए गए. 

• मई 1990 को अनंतनाग के चिरागाम से श्याम लाल का अपहरण करने के बाद उसके हाथ पैर और सिर को काट दिया गया.  उनके अवशेषों को बोरे में भरकर उसके घर की दहलीज के बाहर रख दिया गया. 

• 2 मई 1990 प्रोफेसर केएल गंजू के शरीर में छह गोलियां मारी गईं.  उनकी लाश को रात भर के लिए स्थानीय मस्जिद में रखा गया और फिर नदी में फेंक दिया गया.  बाद में गिरफ्तार किए गए हत्यारों में से एक ने बताया कि श्रीमती गंजू को भी बेरहमी से मार दिया गया था और उसकी लाश को एक पत्थर से बांधकर झेलम में फेंक दिया गया था.  लेकिन चूंकि उसका शव कभी नहीं मिला था, इसलिए यह पता नहीं लगाया जा सका कि उनके साथ कितना जुल्म किया गया. 

• 2 मई 1990 23 साल के सुरिंदर कुमार रैना पुत्र जिया लाल रैना के बेटे को सार्वजनिक रुप से जश्न मनाती हुई भीड़ के सामने से अगवा कर लिया गया.  बाद उन्हें अली जान रोड पर मार दिया गया. 

• 13 मई, 1990 पुलवामा से भास्कर नाथ के 27 साल के बेटे अशोक कुमार का हिज्बुल के आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया था.  उसके हाथ-पैर तोड़ दिए गए। लोहे के सरिए से उसकी आंखें फोड़ दी गईं और शहर के मुख्य चौराहे पर गोलियों की बौछार करके उनकी हत्या कर दी गई.  वहां पर सैकड़ों वहशी मुसलमानों की भीड़ मौजूद थी.  जो कि "इस्लाम शानदार और महान है" के नारे लगा रहे थे. 

उसी दिन, घाटी के एक अन्य हिस्से में, शोपियां में तैनात राज्य सिंचाई विभाग में एक जूनियर इंजीनियर, डी.एन.भट के बेटे वीर जी भट को गोलियों से छलनी कर दिया गया था। खून बहने के बावजूद उसने एक आतंकवादी को पकड़ लिया.  लेकिन तब तक दूसरे आतंकवादी ने उसपर गोलियों की बौछार कर दी. 

•16 मई, 1990 को कुलगाम, अनंतनाग के एक सरकारी कर्मचारी और अम्नू गांव के निवासी श्रीधर कौल के बेटे बसन लाल कौल को हिज्बुल मुजाहिदीन आतंकवादियों ने अगवा कर लिया था और स्टील के तार से गला घोंटकर उनकी हत्या कर दी.  

• 18 मई, 1990 27 साल के मनमोहन बछलो, जो कि काजी बड़मुल्ला के जानकी नाथ बछलो के बेटे थे.  वह बारामूला में डाक विभाग कार्यरत थे और छुट्टियों में घर आए थे.  उनके बचपन का एक दोस्त उन्हें चाय पिलाने के लिए बाहर की दुकान पर ले गया जहां उसने अपने साथियों के साथ मिलकर प्वाइंट ब्लैंक रेंज से उन्हें गोली मार दी. 

• 19 मई, 1990, शोपियां के मोहन लाल के बेटे दिलीप कुमार को शोपियां अपने घर से कुछ आतंकवादियों ने खींच लिया था. उनके साथ बड़ी बेरहमी की गई. जीते जी दिलीप के दांत निकाल लिए गए थे और उन्हें बारह गोलियां मारी गईं.  उसके शव को पेड़ से लटका दिया गया था और उसके सीने पर एक चिट्ठी चिपकाई गई कि अगर किसी को भी इसे उठाने की हिम्मत हो और उसे एक लाख रुपए का ईनाम मिलेगा.  

• 27 मई 27 1990 को अनंतग जिले के उत्तरासू के प्रेमनाथ का अपहरण किया गया और बाद में उनकी छाती और पैरों में कील ठोंक दी गई. वह बड़ी बुरी तरह तड़प तड़प कर मौत को घाट उतर गए.

• 4 जून 1990 को बांदीपोरा में गिरिजा टिक्कू को अगवा कर लिया गया और उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी गई. चार लोगों ने उनके साथ बलात्कार किया.  जब उन्होंने उसमें से एक की आवाज से उसे पहचान लिया जो कि उनका छात्र था. तब पहचान के डर से ये लोग उसे एक लकड़ी की फैक्ट्री में ले गए और आरियों से चीरकर मार डाला.  कुछ समय बाद पुलवामा की कुमारी बबली और उसकी माँ श्रीमती रूपवती के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. 

• जून 1990 में आतंकवादियों की गोलियों से घायल अश्विनी कुमार को अस्पताल ले जाने के लिए वाहन देने से मना कर दिया गया. जब अंत में किसी तरह उन्हें अस्पताल ले जाया गया, तो डॉक्टरों ने उनका इलाज करने से इनकार कर दिया और उन्होंने दम तोड़ दिया. 

•22 जून, 1990 को हब्बा कदल में रहने वाले कृषि विभाग के एक अधिकारी बालकृष्ण टूटू को आतंकियों ने गोली मारकर गंभीर रुप से घायल कर दिया.  बाद में उनके भाई का अपहरण करने के लिए आतंकी उनके घर में घुस गए.  समय पर इलाज न मिलने की वजह से बालकृष्ण ने भी दम तोड़ दिया.  उसी दिन बड़गाम जिले के खान साहिब में एक डिस्पेंसरी में तैनात खानयार निवासी 52 वर्षीय माखन लाल रैना को अपहरण कर लिया गया.  उन्हें क्रूरतम तरीके से प्रताड़ना दी गई और आखिरकार गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई.  उसके शव के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए.  उनके बुरी तरह क्षत विक्षत शरीर को बडगाम के दारपोरा से बरामद किया गया. 

• 30 जून 1990 59 साल के राज नाथ धर पुत्र दीनानाथ धर जो कि कुतुबउद्दीन पोरा, अलिकदल, श्रीनगर निवासी थे, उन्हें गोली मार दी गई.  चिकित्सा सहायता न मिलने के कारण उनकी मौत हो गई. 

•7 जुलाई 1990, मणिगाम के गोविंद राम रैना के पुत्र गोपी नाथ रैना को मुखबिर बताते हुए हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकियों द्वारा उनकी ही दुकान में गोली मारकर हत्या कर दी गई.  उसी दिन, फतह कदल के मुस्लिम युवाओं को शिक्षित करने की दिशा में योगदान देने वाले एक 70 वर्षीय थियोसोफिस्ट दीना नाथ मुजू को आतंकवादियों ने बेरहमी से चाकू मार दिया था, जो रात में धोखे से उनके घर में घुस गए थे.  

• 15 जुलाई, 1990 को अनंतनाग कुलगाम के अशमूजी में राधा कृष्ण कौल के बेटे शिबन किशन कौल का उनके पैतृक गांव में करीबी पड़ोसियों न कत्ल कर दिया। अगले दिन उनके पिता की भी हत्या कर दी गई थी।

26 जुलाई 1990 को कश्मीर के कुलगाम जिले के सैमनू के फतेह सिंह के पुत्र 26 वर्षीय पूर्व सैनिक अवतार सिंह, जिनपर आतंकियों को मुखबिर होने का शक था, सशस्त्र मुस्लिम आतंकवादियों द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। 

• 13 अगस्त 1990, सोपोर की बबली रैना, जो कि पेशे से शिक्षिका थीं, उनके साथ उनके पिता, भाईयों के सामने सामूहिक बलात्कार किया गया था.  

• 17 अगस्त, 1990 चांद जी खेर, जो कि दीना नाथ खेर के किशोर पुत्र थे, उसके मुसलमान दोस्तों ने उसे घर से बाहर बुलाया और हत्या कर दी. 

• 6 अक्टूबर 1990, कानी कदल के दामोदर खजांची के पुत्र डीपी खाजांची को तीन गोलियां मारी गईं, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई. उसी दिन, बागपतपोरा, हंदवाड़ा के प्रकाश राम पंडिता के पुत्र जिंदा लाल पंडिता का उनके निवास से अपहरण कर लिया गया था और जेकेएफएफ के हत्यारों द्वारा पास के बाग में स्टील के तार से गला काटकर उनकी निर्मम हत्या कर दी गई.  

• 7 अक्टूबर 1990, बागपतपोरा, हंदवाड़ा के गणेश नाथ पंडिता के पुत्र जगन्नाथ पंडिता का उनके घर से अपहरण कर लिया गया और उन्हें उनके अपने बागीचे में ले जाया गया, जहां उनका भी स्टील के तार से गला घोंट दिया गया.  उनकी हत्या 7 और 8 अक्टूबर 1990 की मध्यरात्रि में हुई थी. 

• 12 अक्टूबर 1990 पुलवामा जिले के खोनमुहा के निवासी 47 वर्ष के पुष्कर नाथ राजदान, जो कि टीका लाल राजदान के पुत्र थे, उनकी हत्या जिहादियों द्वारा घर में घुसकर हत्या कर दी गई. 

•15 अक्टूबर 1990 जाना भट्ट के पुत्र महेश्वर नाथ भट्ट की हत्या उनके घर में घुसे आतंकवादियों ने कर दी.  आतंकवादी उनके दामाद की तलाश कर रहे थे, जो कि घर में छिपा हुआ था.  यह घटना श्रीनगर के हजूरी बाग़ की है.  

• 2 जनवरी 1991 ओंकार नाथ वली जो कि अनंतनाग जिले के चाक-ए-राजवती के निवासी थे.  वह पुलिस में सहायक उप निरीक्षक थे, जो जिला पुलिस लाइंस, अनंतनाग में तैनात थे.  उन्हें अगवा करके गोली मार दी गई थी.  बाद में पता चला कि पुलिस विभाग में उनके ही मुस्लिम सहयोगियों ने JKLF के आतंकवादियों के साथ मिलकर उनकी हत्या की साजिश रची थी.  

• 8 अगस्त 1991 को आशा कौल को अचाबल, अनंतनाग से अगवा कर लिया गया और श्रीनगर में एक कश्मीरी पंडित के खाली घर में रखा गया.  जहाँ उसके साथ कई दिनों तक सामूहिक बलात्कार किया जाता रहा और फिर उन्हें बड़ी बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया.  उसका शव बाद में 26 अगस्त 1991 को उसी घर में एक बुरी हालत में पाया गया था. 

•26 अगस्त 1991, बटवाकुंड, हंदवाड़ा के 20 साल के सुरिंदर कुमार कौल को उनके दोस्तों ने अगवा कर लिया था और अंतहीन यातना के बाद गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई थी. 
 
• 18 अक्टूबर 1991, पाजीपोरा, बांदीपुरा के कंठराम पेशीन के पुत्र, कन्या लाल पेशीन, जो कि एक गरीब किसान थे और अपनी कम आय पर मुश्किल से अपना गुजारा कर पाते थे, उनका घर से सुबह 9 बजे अपहरण कर लिया गया था और अपने गाँव से तीन किलोमीटर दूर ले गया जहाँ उसके साथ क्रूर अत्याचार किया गया.  उनके नाखून में कीलें ठोंक दी गईं। आखिरकार कपड़े की एक मीटर लंबाई का टुकड़ा उनके मुंह में भर दिया गया, जिससे दम घुटने से उनकी मौत हो गई. उनका मृत शरीर बाद में अजर, बांदीपोरा में पाया गया था.  

• 31 मार्च 1992 को नाइक, श्रीनगर की बिमला ब्रारु, और उनकी बेटी अर्चना का बलात्कार उनके पति सोहन लाल के सामने किया गया, इसके बाद उन तीनों को मार डाला गया. 


•24 जून 1990 शंभू नाथ गरियाली के 25 वर्षीय अश्वनी गरियाली पर मुखबिरी का आरोप लगाकर सेना की वर्दी में आए 5 नकाबपोश घुसपैठियों ने गोली मार दी.  चिकित्सा देखभाल से वंचित होने के कारण उनकी मृत्यु हो गई. 

• 16 जून 1991, शोपियां के बटपोरा में राजिंदर टिकू, जो शोपियां अस्पताल के वित्त विभाग में काम करते थे. उनको चार गोलियां मारी गईं.  उनका अंतिम संस्कार उनके पिता ने स्वयं किया था क्योंकि कोई पुजारी उपलब्ध नहीं था. 

• जून 1991 में, हरमन, शोपियां के गाँव के बृजलाल कौल और उनकी पत्नी छोटी को एक जीप के पीछे बांध दिया गया और घसीटा गया और फिर गोली मारकर हत्या कर दी गई.  उनके शव के टुकड़े 10 किलोमीटर दूर बरामद किए गए. 

• 21 - 22 मार्च 1997 बडगाम के संगरम्पोरा गाँव में रात के दौरान सात कश्मीरी पंडितों का नरसंहार किया गया.  आतंकवादियों ने उन्हें उनके घरों से बाहर निकाला और उन्हें मार दिया। 

• 25 जनवरी 1998 को वंधामा गाँव में 23 कश्मीरी पंडितों, जिनमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे, को गोली मार दी गई.  

• 24 मार्च 2003 नाड़ीमार्ग गांव में शिशुओं सहित 24 कश्मीरी पंडितों की बेरहमी से गोली मारकर हत्या कर दी गई. 

• 14 मार्च 1989 बडगाम जिले के चौराहा नवागढ़ी की प्रभावती को हरि सिंह हाई स्ट्रीट पर 14 मार्च 1989 को मार डाला गया. 

 • 14 सितंबर 1989 को प्रख्यात कश्मीरी पंडित सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता पं. टीका लाल टपलू की हब्बा कदल में उनके घर में गोली मारकर हत्या कर दी गई. 

• अक्टूबर 1989 न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) नीलकंठ गंझू की करीब से गोली मारकर हत्या कर दी गई. 
 
• 31 अक्टूबर 1989 को दलहसनियार की 47 साल की शीला कौल (टिकू) की मौत सीने और सिर में गोली लगने से हुई.
 
• 1 दिसंबर 1989 को महाराजगंज, श्रीनगर के निवासी अजय कपूर को सार्वजनिक रुप से आतंकवादियों द्वारा गोलियों से छलनी कर दिया गया था. 

• 27 दिसंबर 1989 को 57 साल की उम्र में अनंतनाग के एडवोकेट प्रेम नाथ भट्ट कई लोगों के सामने मारे गए. 

ये घटनाएं महज एक बानगी हैं. जो बताती हैं कि किस तरह कश्मीरी पंडितों पर अमानवीय जुल्म करके उन्हें अपने घर द्वार से भागने के लिए मजबूर किया गया. ये सब मजहब के नाम पर किया गया. लेकिन ये दर्दनाक कहानियां इंसानियत पर जुल्म की ऐसी दास्तां हैं, जिन्हें भारत के किसी भी शख्स को भूलना नहीं चाहिए. 

मारे गए कश्मीरी पंडित कोई आततायी नहीं बल्कि बेकसूर निहत्थे नागरिक थे. लेकिन मजहब के नाम पर उनकी जघन्य हत्याएं नरसंहार के माध्यम से जातीय सफाई की सावधानीपूर्वक तैयार की गई योजना का हिस्सा थीं. 

आज भारत में मजहबी कट्टरपंथी फिर से CAA और NRC विरोध के नाम पर एकजुट होकर 1947 का 'डायरेक्ट एक्शन' दोहराने की धमकी दे रहे हैं. लेकिन नासमझ भारतीयों का एक तबका उनका समर्थन कर रहा है. जिसमें बॉलीवुड, बुद्धिजीवी तथा कुछ छात्र संगठन भी शामिल हैं. 

इन मजहबी कट्टपंथियों की असली मंशा समझनी हो तो कश्मीरी पंडितों की इस दर्दनाक दास्तां को एक बार जरूर पढ़ें. वरना आंख मूंदकर बैठी कौमों का यही अंजाम होगा. उपर लिखी घटनाएं पूरी तरह इसी सत्य की बानगी पेश करती हैं. 

उपरोक्त घटनाएं इन पुस्तकों से संकलित की गई हैं- 
1.Jagmohan, “My Frozen Turbulence in Kashmir’’, Published by South Asia Books, 6th Edition. 
2. Tej K. Tikoo, “Kashmir: Its Aborigines and their Exodus’’, Published by Lancer Publishers LLC 
3. Rahul Pandita, “Our Moon Has Blood Clots: The Exodus of the Kashmiri Pandits’’ Published by Random House India 
4. “Abductions and Killings of Prominent Personalities”http://ikashmir.net/atrocities/4.html 
5. GD Bakshi, “Kishtwar Cauldron: The Struggle Against Isis Ethnic Cleansing’’, Published by Pentagon Press 
6. Muzamil Jaleel ,  “209 Kashmiri Pandits killed since 1989, say J-K cops in first report” http://archive.indianexpress.com/news/209-kashmiri-pandits-killed-since-...
7. Kashmir News Network , “Kashmir Terrorist Visits New York”, http://www.prnewswire.com/news-releases/kashmir-terrorist-visits-new-yor... Nancy Kaul, “ In defence of my country undeterred I stand, in return I get betrayal – II“ http://www.vija