पूर्व आईएएस शाह फैसल पर लगा PSA, हिरासत में लिए गए

शाह फैसल पिछले साल 14 अगस्त से सीआरपीसी की धारा 107 के तहत हिरासत में हैं. बाद में उन्हें श्रीनगर के एमएलए हॉस्टल में ट्रांसफर कर दिया गया था. इससे पहले जम्मू- कश्मीर के पूर्व सीएम और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला पर PSA लगाया गया था. 

पूर्व आईएएस शाह फैसल पर लगा PSA, हिरासत में लिए गए

श्रीनगरः जम्मू-कश्मीर के पूर्व आईएएस और जम्मू-कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट के प्रमुख शाह फैसल के खिलाफ पब्लिक सेफ्टी एक्ट (PSA) के तहत मामला दर्ज किया गया है. जम्मू- कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने के बाद कई नेताओं पर PSA लगाया गया है. इन नेताओं में फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, अली मोहम्मद सागर, सरताज मदनी, हिलाल लोन और नईम अख्तर शामिल हैं. पीएसए के तहत बिना ट्राइल किए कम से कम तीन महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है.

14 अगस्त से हिरासत में हैं शाह
शाह फैसल पिछले साल 14 अगस्त से सीआरपीसी की धारा 107 के तहत हिरासत में हैं. बाद में उन्हें श्रीनगर के एमएलए हॉस्टल में ट्रांसफर कर दिया गया था. इससे पहले जम्मू- कश्मीर के पूर्व सीएम और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला पर PSA लगाया गया था. उमर अब्‍दुल्‍ला की बहन सारा अब्‍दुल्‍ला ने अपने भाई पर पीएसए लगाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का का दरवाजा खटखटाया था. उमर अब्दुल्ला 4 अगस्त के बाद से ही नजरबन्द हैं. 

कई नेताओं को किया गया था नजरबंद
जम्मू- कश्मीर में उमर के अलावा पीडीपी नेता और पूर्व मुख्‍यमंत्री महबूबा मुफ्ती पर भी पीएसए लगाया गया है और वह फिलहाल नजरबंद हैं. शुक्रवार को उमर अब्दल्ला की बहन की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर को एक नोटिस जारी किया था. अगस्त 2019 में जम्मू- कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने के बाद से वहां के कई नेताओं का नजरबंद किया गया था. इन नेताओं में पूर्व सीएम फारूख अब्‍दुल्‍ला भी शामिल थे.

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यह है PSA
PSA के तहत अगर सरकार को शक है कि आप पब्लिक सेफ्टी के लिए खतरा हैं या फिर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं तो सरकार आपको हिरासत में ले सकती है. शेख अब्दुल्ला सरकार में लाए गए PSA को 8 अप्रैल, 1978 को जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल की मंजूरी मिली थी. PSA को लकड़ी तस्करों पर लगाम कसने के लिए लाया गया था.

इस कानून के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति का मामला सरकार को एडवाइजरी बोर्ड के सामने भेजना होता है. बोर्ड को अपना सुझाव आठ हफ्तों में देना होता है. अगर बोर्ड हिरासत को सही ठहराता है, तो सरकार शख्स को बिना ट्रायल के 2 साल तक हिरासत में रख सकती है. शुरुआत में इस कानून के तहत 16 साल से ज्यादा के नाबालिगों को भी हिरासत में लिया जा सकता था.

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