कश्मीर में सिखों ने पेश की देशप्रेम की मिसाल, सड़क के लिए गुरुद्वारा हटाने पर राजी

जम्मू कश्मीर में सिख समुदाय ने देश प्रेम के लिए बड़ी कुर्बानी देने का फैसला किया है. सिख भाई श्रीनगर बारामूला राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित, गुरुद्वारा दमदमा साहिब को हटाने पर सहमत हो गए हैं. क्योंकि इसकी वजह से राजमार्ग का विस्तार बाधित हो रहा था.   

कश्मीर में सिखों ने पेश की देशप्रेम की मिसाल, सड़क के लिए गुरुद्वारा हटाने पर राजी

कश्मीर : पिछले कई दशों से लटका हुआ श्रीनगर बारामूला राष्ट्रीय राजमार्ग का काम अब पूरा होने की उम्मीद है. क्योंकि इसके किनारे स्थित 72 साल पुराने गुरुद्वारा दमदमा साहिब को हटाने के लिए सिख समुदाय राजी हो गया है. 

ऐतिहासिक है दमदमा साहिब गुरुद्वारा
 श्रीनगर बारामूला राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित गुरुद्वारा दमदमा साहिब एक ऐतिहासिक इमारत है. इस गुरुद्वारे ने पाकिस्तान से आए प्रवासी परिवारों की सेवा की और न केवल सिखों बल्कि सभी धर्मों के लोगों को शरण देने के स्थान रुप में जाना गया. इस गुरुदुवारे में लंगर बिठाने और सामाजिक सेवा में भी नाम कमाया हैं और बाढ़ तथा भूकंप पीड़ितों को भी आश्रय दिया है. 

लेकिन अब श्री गुरुद्वारा प्रबंधन कमिटी और जिला प्रशासन के बीच हुए समझोते के बाद इसे हटाकर दूसरी जगह इसका निर्माण किया जा रहा है. 

इसलिए पड़ी गुरुद्वारा हटाने की जरुरत
साल 2004 में, सरकार ने श्रीनगर से बारामूला तक एक 4 लेन राष्ट्रीय राजमार्ग का निर्माण शुरू किया था. इसके लिए ऐसी कई इमारतों को तोडना पड़ा जो राजमार्ग बाने में बाधा डाल रहे थे. 
हालांकि  2013 में सड़क पूरी हो गई थी. लेकिन उच्च न्यायालय में मुकदमेबाजी के कारण चार अड़चनें बनी रहीं. 

इनमें गुरुद्वारा साहिब, एक बिजली लाइन, एक पेट्रोल पम्प और वाटर सप्लाई लाइन शामिल थीं. 

जो ज़मीन गुरुद्वारे के निर्माण के लिए प्रस्तावित की गई थी, इस पर ज़मीन मालिक ने आपत्ति जताई और 2014 में स्टे प्राप्त कर लिया.  तब से ही भूमि मालिक, गुरुद्वारा समिति, जिला कमिश्नर मुकदमेबाजी में उलझे रहे.  लेकिन अब दशकों बाद  गुरुद्वारा प्रबंधन कमिटी और जिला कमिश्नर, श्रीनगर, के बीच सफल वार्ता के बाद गुरुद्वारा साहिब को हटाने का रास्ता साफ हो गया है. 

लोगों को परेशानी में नहीं डालना चाहता सिख समुदाय
सिख समुदाय के लोगों का कहना हैं कि पहले रास्ता फिर सब कुछ.  हम नहीं चाहते आम लोगों की मुश्किलें बनी रहें. इलाके में रहने वाले जी.एस.सोढ़ी कहते हैं कि "जब 1947 में जब कबाइलियों के खिलाफ जंग हुई थी, उस वक्त जो सिख समुदाय का कत्लेआम किया जा रहा था. तब सिख समुदाय के लोग भाग कर श्रीनगर की और आ रहे थे.  वो सब लोग आकर यहां इस जगह पर इकट्ठा हुए. हमने सरकार को गुरुद्वारा हटाने से इसलिए नहीं रोका हैं, क्योंकि ये जनहि का काम है. इसमें हम कभी बाधा नहीं डालेंगे." 

गुरुद्वारा प्रबंधन कमिटी के अध्यक्ष संतपाल ने बताया कि  "इस मामले पर काफी समय से सरकार और हमारे बीच बातचीत चल रही थी लेकिन अब ईश्वर का धन्यवाद है कि बात बन गई है. गुरुद्वारा किसी एक धर्म के लिए नहीं है. यह हर किसी के लिए है. गुरुद्वारा से सड़क निर्माण में मुश्किल आ रही थी. सड़क भी ज़रूरी हैं.  पहले सड़क फिर सब कुछ आता हैं. अब सरकार और हमारे बीच समझौता हो चुका है. हमें 12 मरले ज़मीन मिल रही हैं. यह ख़ुशी की बात हैं कि रास्ता भी बन रहा है. जब रास्ता होगा तब कोई कही भी आ-जा सकता हैं."