हिंसा करने वाले ये लोग प्रदर्शनकारी नहीं, उपद्रवी हैं

नागरिकता क़ानून विरोधी प्रदर्शन की आड़ में सड़कों पर खुल्लेआम हिन्सा कर रहे ये लोग साफ़ तौर पर उपद्रवी हैं..

हिंसा करने वाले ये लोग प्रदर्शनकारी नहीं, उपद्रवी हैं

नई दिल्ली. भारत का नया नागरिकता क़ानून इतनी बड़ी बात नहीं है जितनी दुनिया को दिखाई जा रही है. उस षड्यंत्र के अंतर्गत ही सुनियोजित तरीके से भारत में सड़कों पर प्रदर्शन के बहाने हिन्सा कराई जा रही है. ये बात हिन्सा के स्पॉन्सर करने वालों को साफ तौर पर समझनी होगी कि उनके ये तरीके कारगर किसी हाल में नहीं होंगे.

सभ्य देश के शांत नागरिक नहीं हैं ये लोग

इकीसवीं सदी के भारत के लोगों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे देश की सड़कों पर कबीलाई संस्कृति का मुजाहिरा करें. सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचा कर प्रदर्शन नहीं किये जाते. भारत विश्व मानचित्र पर एक सभ्य देश के रूप में अस्तित्वमान है किन्तु इस देश में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो असभ्यता के पत्थर-युग में जी रहे हैं. 

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इनका नागरिकता क़ानून से कोई लेना-देना नहीं है 

संसद द्वारा पास किये गए नागरिकता संशोधन क़ानून में इस देश के किसी नागरिक का हित नहीं छीना गया है. सरकार देश के भविष्य को सुरक्षित करने के उद्देश्य से बहुत सोच-समझ कर यह क़ानून लाई है. ऐसे में न ही इस देश के छात्रों का, न ही आमजनों का इससे कोई लेना-देना या टकराव है फिर ये प्रदर्शन किस उद्देश्य से किये जा रहे हैं?

भड़काए हुए लोग हैं ये 

जैसा कि ज़ाहिर ही है, प्रदर्शन कर रहे लोगों के हितों का इस क़ानून से कोई टकराव नहीं है. फिर भी बड़ी संख्या में देश भर की सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे लोग आम-जन नहीं हो सकते. ये वे लोग हैं जिन्हें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीकों से बरगलाया गया है और भड़का कर लाया गया है. 

एजेंडे के तहत उतरे हैं सड़कों पर 

प्रदर्शन करने के बहाने हिन्सा कर रहे ये लोग न भारत के आम नागरिक हैं न ही मूल रूप से इस क़ानून के विरोधी, किन्तु भारत विरोधी शक्तियों के एजेंडे के अंतर्गत इन लोगों को बाकायदा सड़कों पर उतारा गया है जहां इनके हाथों से होने वाली हिन्सा ने इनका मुखौटा उतार दिया है.