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देश में बहुत तेजी से घट रहे हैं रेगिस्तान के जहाज, राजस्थान में स्थिति और भी भयानक

रेगिस्तान का जहाज कहे जाने वाले ऊंटों की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है जिसकी वजह से राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और उत्तरप्रदेश के कारोबारियों का रोजगार छीनता जा रहा है. राजस्थान के राजकीय पशु बनाए जाने के बाद भी ऊंटों की लगातार घटती संख्या के पीछे कई वजहें हैं.

देश में बहुत तेजी से घट रहे हैं रेगिस्तान के जहाज, राजस्थान में स्थिति और भी भयानक

नई दिल्ली: साल 2019 के Livestock census में भारत में ऊंटों की जनसंख्या में 37 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. साल 2012 की जनगणना में देश में कुल ऊंटों की संख्या 4 लाख के करीब थी जो साल 2019 में घटकर 2.5 लाख के करीब आ पहुंची है. भारत में सबसे ज्यादा 85 फीसदी ऊंट राजस्थान में पाए जाते हैं. मरूस्थली क्षेत्र राजस्थान में 2012 के मुकाबले 2019 के लाइवस्टॉक जनगणना में ऊंटों की संख्या में 34.7 फीसदी की कमी पाई गई है. 

गुजरात, हरियाणा और यूपी में भी घटी ऊंटों की संख्या

भारत की जीडीपी में पशुधन क्षेत्र का योगदान 2015-16 के जनगणना में 5 फीसदी तक था. राजस्थान में मरूस्थली इलाके की एक बहुत बड़ी आबादी के आय का मुख्य साधन ऊंट ही हैं. राजस्थान में पशुधन पालकों की संख्या का पता लगाने के लिए हर पांच साल पर जनगणना कराई जाती है. 1992 की जनगणना में राजस्थान में 7.46 लाख रेगिस्तानी जहाज थे, जो साल 2019 में घटकर 2.13 लाख पर आ गए हैं. सिर्फ राजस्थान ही नहीं, गुजरात, हरियाणा और  उत्तरप्रदेश में भी इनकी संख्या में लगातार कमी दर्ज की गई है. गुजरात में इनकी संख्या 30,000 से घटकर 28,000 पर आ पहुंची है तो हरियाणा में 19,000 से सीधे 5000 पर आ गिरी. यूपी में ऊंटों की संख्या जहां पहले 8000 पर थी, अब 2000 पर आ पहुंची है. अगली जनगणना से पहले कहीं इन राज्यों में ऊंट विलुप्त ही न हो जाएं. 

राजे सरकार में राजकीय पशु घोषित हुए ऊंट

दिलचस्प बात यह है कि ऊंटों की लगातार घटती आबादी के लिहाज से राजस्थान सरकार के नियम इसके असली जिम्मेदार माने जा रहे हैं. राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने ऊंट को राजकीय पशु घोषित कर दिया था. इतना ही नहीं 2015 में राजस्थान कैमेल( Prohibition of Slaughter and Regulation of Temporary Migration) बिल पारित कराया था जिसमें ऊंटों की तस्करी और मांस का व्यापार कर रहे किसी भी व्यक्ति को 1-5 साल की सजा के साथ-साथ 20,000 रूपए जुर्माने के तौर पर जमा करने पड़ते थे. देखा जाए तो यहीं कानून ऊंटों की घटती जनसंख्या का एक कारक भी बना. दरअसल, राजस्थान के पुष्कर में हर साल पशु मेला लगता है जिसमें दूर-दराज से आए ऊंटों की खरीद-बिक्री की जाती है. नया कानून पारित होने के बाद ऊंटों के ट्रांसपोर्टेशन पर प्रतिबंध लगने लगे. इस बीच मेले में न सिर्फ ऊंटों की संख्या घटी बल्कि इन्हें औने-पौने दामों में भी बेचा जाने लगा. 2013-14 में 1700 के करीब बेचे गए ऊंटों की संख्या 2017 में घटकर 800 पर आ गई. 

विकास की मार झेलते मरूस्थली जहाज

इसके अलावा राजस्थान का विकास ऊंटों के लिए मुसीबत बन गया है. दरअसल, मरूस्थली इलाके में भी अब सड़कों की व्यवस्था होने लगी है जिससे लोग ऊंटों की जगह गाड़ियों से आना-जाना ज्यादा अच्छा विकल्प मानने लग गए हैं. इससे इनकी साख घटने लगी है. ऊंटों की लगातार घटती संख्या का एक कारण राजस्थान में चारागार स्थानों का घटना भी है. एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में ऊंटों के चरने के लिए घास और चारा वाले इलाकों में 40 फीसदी की कमी आई है. ऊपर से वन विभाग जंगल में ऊंटों के चराए जाने पर 100 रूपए का चार्ज लेने लगे हैं. 

कांग्रेस सरकार ने रोकी CDP की राशि

ऊंटों की घटती संख्या के निपटारे के लिए राजे सरकार ने 2016 में ऊष्ट्र विकास योजना का अनावरण किया था जिसमें ऊंटों पालने के प्रथा को बढ़ावा दिए जाने की योजना बनाई गई थी. इसके तहत किसी भी व्यक्ति को जिसके यहां ऊंट के बच्चे का जन्म होता था, उसे जन्म के समय 3000 रूपए, जन्म के 9 महीने बाद 3000 रूपए और 18 महीने के बाद 4000 रूपए दिए जाते थे. हाल के दिनों में कांग्रेस सरकार ने इस योजना की राशि का भुगतान करना ही बंद कर दिया है. 

गाय और भैंस के दूध से भी ज्यादा पोषण ऊंट के दूध में

NRCC( National Research Centre on Camel) बिकानेर ने एक शोध में पाया कि ऊंटों की राइका प्रजाति के दूध में गाय और भैंस से ज्यादा पोषण तत्व पाए जाते हैं. ऊंट का दूध डायबिटीज, हाइपर टेंशन, टीबी और ऑटिज्म के इलाज में काफी सहयोगी तत्व है. हालांकि, अभी इसे किसी भी व्यापारिक मोडल के रूप में नहीं ढा़ला गया है लेकिन जल्द ही ऐसा किया जा सकता है. इसके अलावा राजस्थान में छोटे और मझोले स्तर पर कैमेल डेयरीज का विकास करना भी जरूरी है. गुजरात में अमूल कंपनी ने तो ऊंट के दूध को पाउडर दूध में बदल विदेशों में इसकी बढ़ती मांग को पूरा करने का काम शुरू भी कर दिया है. हालांकि, राजस्थान को इभी इस दिशा में कार्य करने की आवश्यकता है.