Navratri special: नवरात्र में प्रकृति देवी की अराधना

कर्नाटक की सालुमारदा थिम्मक्का 2019 में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित की गई हैं.  उन्होंने देवी पूजा के असल अर्थ को समझा और पेड़-पौधों और प्रकृति की पूजा को ही अपना ध्येय बना लिया. . इनकी कोशिश का नतीजा है कि करीब 4 किलोमीटर के इलाके को इन्होंने हरियाली में बदल दिया है.  

Written by - Pratibha Rai | Last Updated : Oct 21, 2020, 08:15 PM IST
    • कर्नाटक की सालुमारदा थिम्मक्का 2019 में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित की गई हैं
    • करीब 4 किलोमीटर के इलाके को इन्होंने हरियाली में बदल दिया है
Navratri special: नवरात्र में प्रकृति देवी की अराधना

नई दिल्लीः नवरात्र में मां दुर्गा के नौ रुपों की अराधना की जाती है. हर कोई नौ दिन अलग-अलग तरह से मां की पूजा करता है. इसके बावजूद देवी के प्रकृति स्वरूप और प्रकृति में देवी के रूप के बहुत कम ही लोग देख पाते हैं. ऐसी ही एक शख्सियत हैं सालुमारदा थिम्मक्का. सालुमारदा ने देवी पूजा के असल अर्थ को समझा और पेड़-पौधों और प्रकृति की पूजा को ही अपना ध्येय बना लिया. कर्नाटक की सालुमारदा थिम्मक्का पद्मश्री सम्मान से सम्मानित की गई हैं. 

प्रकृति पूजा ऐसी कि हरा-भरा कर दिया 4 किमी का इलाका
इन दिनों भक्त श्रद्धा-भक्ति में जुटे रहते हैं.आध्यात्मिक के साथ साथ शारदीय और वासंतिक नवरात्र का वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रकृति प्रेम भी है. कलश के नीचे जौ के बीज का अंकुरण प्रजनन के सूक्ष्म रूप के साथ भूमि की उर्वरता का सजीव उदाहरण हमारे सामने पेश करता है. 

पूजा करने के पीछे इन पौधों की रक्षा करना भी एक मकसद होता है. कर्नाटक की रहने वाली सालुमारदा इस प्रकृति पूजा को न सिर्फ समझा बल्कि अपने जीवन में उतारा भी है. इनके नाम करीब 8 हजार पेड़ लगाने का रिकॉर्ड है. जिसमें 385 बरगद के पेड़ हैं. इनकी कोशिश का नतीजा है कि करीब 4 किलोमीटर के इलाके को इन्होंने हरियाली में बदल दिया है.

आसान नहीं था सफर
हांलाकि ये सफर इतना आसान नहीं था. सालुमारदा का जन्म बेंगलुरु के हुलीकल गांव में एक गरीब परिवार में हुआ. इन्हें स्कूली शिक्षा भी नसीब नहीं हुई. विवाह योग्य उम्र होने पर इनकी शादी कर दी गई. मां नहीं बन सकीं तो ससुराल वालों ने जीना दुश्वार कर दिया. आत्महत्या की ओर कदम बढ़े तो ऐन वक्त पर पति ने हाथ बढ़ाकर जिंदगी की ओर खींचा और एक मकसद भी दिया. 

ऐसे शुरू हुआ प्रकृति प्रेम
एक वृक्ष दस पुत्र समाना की तर्ज पर पति-पत्नी ने पेड़ों को अपने पुत्र-पुत्री के रुप में पालने का संकल्प लिया. इस दंपती के दिन की शुरुआत खेत में काम करने से होती, दोपहर सड़क किनारे पेड़ लगाते बीतती तो रात यह सोचते बीतती कि कल किस पौधे को पानी दें और किसे खाद.

पौधों को पानी देने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलकर पानी ढो कर लाते. धीरे-धीरे इनका प्रेम रंग लाने लगा और नतीजा ये हुआ कि एक दो से बढ़कर चार किलोमीटर तक का एरिया हराभरा हो गया.

प्रकृति देवी हैं सालुमारदा
108 अधिक बसंत देख चुकी शालुमारदा ने अपना सारा ममत्व प्रकृति पर उड़ेल दिया, नतीजा सामने हैं. सालुमारदा के पति अब दुनिया में नहीं हैं लेकिन इनकी जिंदगी का लक्ष्य अनवरत जारी है. बल्कि अब ज्यादा वक्त पेड़ों के साथ ही बिताती हैं, उनसे बातें करती हैं, उनसे अपने सुख दुख साझा करती हैं.

जानकारी के मुताबिक किसी राजनेता की नजर थिमक्का की कोशिश पर पड़ी, इसके बाद मीडिया में इनके किए गए काम को सामने लाया गया. तब जाकर देश और दुनिया ने जाना कि शालुमारदा थिमक्का एक प्रकृति देवी हैं.

विश्व स्तर पर प्रतिष्ठा 
एक अमेरिकी पर्यावरण संगठन ने पर्यावरण शिक्षा के लिए थिम्मक्का एक संसाधन शैक्षिक कार्यक्रम (Thimmakka's Resources for Environmental Education )इनके नाम पर रखा. सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ कर्नाटक ने वर्ष 2020 में थिमक्का को मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया.

कर्नाटक सरकार ने सालुमारदा थिमक्का के नाम पर प्रकृति संरक्षण के लिए कई योजनाएं संचालित की है.इतना ही नहीं 2016 में बीबीसी (BBC ) ने सालुमारदा को दुनिया की 100 प्रभावशाली महिलाओं में शामिल किया. इनका काम जब दुनिया के सामने आया तो एक अवार्ड की फेहरिस्त इनके नाम दर्ज हो गई.

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