सुनामी में अपने बच्चे खोने के बाद सैकड़ो बच्चों के जीवन सुधार चुके हैं ये दंपति

2004 में आई सुनामी ने हजारों लोगों की जान ले ली, हजारों लोगों को बेघर कर दिया लेकिन उन्हीं में से एक ऐसे दंपति है जिन्होंने अपना सब कुछ खो कर भी मानवता का उदाहरण पूरे समाज के सामने पेश किया.

सुनामी में अपने बच्चे खोने के बाद सैकड़ो बच्चों के जीवन सुधार चुके हैं ये दंपति

चेन्नई: 26 दिसंबर, 2004 को भारत के दक्षिणी राज्य में ऐसी सुनामी आई थी जिसने न सिर्फ देश को बल्कि पूरे विश्व को हिला कर रख दिया था. इस सूनामी ने न जाने कितनी जिंदगियों को अपने में समा लिया और कितनों के घर उजाड़ कर लोगों को बेघर कर दिया. कुछ तो सुनामी से बच कर भी जिंदा लाश बन कर रह गए तो कुछ के पास सूनामी के बाद जिने की वजह ही नहीं बचीं.

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15 साल पहले करीब 9.1 की तीव्रता से भूकंप की वजह से सुनामी आई थी. जिस सूनामी में एक ऐसे दंपति बच गए जिन्होंने अपने तीनों बच्चों को ही खो दिया. पर ये दंपति ने जीवन से हार नहीं माना और आज ये ऐसा काम कर रहे हैं जो हर किसी के लिए उदाहरण बन गया है. तमिलनाडु के नागापट्टुनम शहर के रहने वाले करिेबेरन परमेश्वरन और उनकी पत्नी चूड़ामणि ने इस सुनामी में अपने घर के चिराग को खो दिया, दोनों दंपति ने सोचा कि जब अब जीवन में कुछ बचा ही नहीं तो जिंदा रह कर क्या फायदा. पर इसी दौरान दोनों ने शहर के उस घर को छोड़ने का निर्णय लिया जहां उन्होंने अपने बच्चे खो दिए थे. शहर छोड़ कर दोनों गांव चले गए, गांव जाते वक्त रास्ते में दंपति जोड़े को सड़कों पर कई अनाथ और बेघर बच्चे दिखें. 

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इस यात्रा ने दोनों की मनोभावना को बदलकर रख दिया. अब दोनों पति-पत्नी ने अपने घर में ही अनाथालय खोल रखा है जिसका नाम नांबिक्केई रखा है. तमिल में इसका मतलब उम्मीद होता है. शुरुआत में दोनों ने 4 अनाथ बच्चों को घर दिया था लेकिन आज यहां सैकड़ों की संख्या में बच्चे रहते हैं जिन्हें दोनों अपने बच्चों की तरह रखते हैं. 

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यहां रहने वाले कई बच्चे उच्च शिक्षा हासिल कर जॉब कर रहे हैं तो कुछ आगे की पढ़ाई के लिए घर से निकल बाहर भी रहने लगे हैं. इस तरह के समाज कल्याण की सोच अगर हर कोई रखने लग जाए तो वो दिन दूर नहीं है जब देश व समाज पूर्ण रूप से विकसित हो जाएगी.