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भारत के गौरव: जानिए कौन थे देश को स्वर्ण युग में पहुंचाने वाले सम्राट समुद्रगुप्त

एक समय था जब भारत अलग-अलग राज्यों में बंटा हुआ था. छोटी-बड़ी रियासतों पर कई राजाओं का राज हुआ करता था. लेकिन उनके बीच एक ऐसा पराक्रमी और वीर राजा हुए, जिन्होंने सभी राजाओं को जीत कर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की. वे गुप्त राजवंश के राजा समुद्रगुप्त थे.

भारत के गौरव: जानिए कौन थे देश को स्वर्ण युग में पहुंचाने वाले सम्राट समुद्रगुप्त

नई दिल्ली: राजा समुद्रगुप्त ने अपने साम्राज्य का विस्तार उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक किया.  उन्होंने छोटे-बड़े राज्यों को जीतकर अखंड भारत की स्थापना की.  राजा समुद्रगुप्त का शासनकाल राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.

युद्ध में लगे घावों को ही माना गया समुद्रगुप्त का सौंदर्य
महाराजा समुद्रगुप्त, गुप्त वंश के दूसरे शासक थे.  समुद्रगुप्त का जन्म कब और कहां हुआ, इसके कहीं पुख्ता प्रमाण नहीं मिलते. लेकिन उनके शासनकाल के साक्ष्य इतिहास में मौजूद हैं.  उनका शासनकाल 335 के आसापास से 380 ई. तक रहा था. समुद्रगुप्त के इतिहास का सबसे मुख्य स्रोत, इलाहाबाद के पास, कौशांबी मिला शिलालेख है. जिसमें समुद्रगुप्त के विजय अभियानों का विवरण दिया गया है. इस शिलालेख पर समुद्रगुप्त के बारे में लिखा है कि "जिसका खूबसूरत शरीर, युद्ध के कुल्हाड़ियों, तीरों, भाले, बरछी, तलवारों, शूल के घावों की सुंदरता से भरा हुआ है."

बचपन से प्रतिभाशाली समुद्रगुप्त थे पिता के वास्तविक उत्तराधिकारी
समुद्रगुप्त का जन्म गुप्त राजवंश के राजा चंद्रगुप्त प्रथम के संस्थापक और उनके लिच्छवी राजकुमारी कुमारदेवी के पुत्र के रूप में हुआ था.  बाल्यकाल से ही समुद्रगुप्त विलक्षण, प्रतिभाशाली और साहसी थे. इसी वजह से ही पिता चंद्रगुप्त प्रथम ने समुद्रगुप्त को अपना उत्तराधिकारी चुना था. हालांकि उनके और भी पुत्र थे. लेकिन समुद्रगुप्त की योग्यता को देखते हुए उन्हें ही शासन का अधिकार दिया गया.

वीर होने के साथ उदार भी थे समुद्रगुप्त
समुद्रगुप्त ने अपने शासनकाल के दौरान कवियों, विद्वानों, कलाकारो और भारतीय संस्कृति के धार्मिक, कलात्मक और साहित्यिक पहलुओं को खूब बढ़ावा दिया था.  वे उदार, धार्मिक दृष्टिकोण वाले शासक थे.  राजा समुद्रगुप्त ने ब्राहाण, शूद्र, वैष्णव और शैव के आधार पर भेदभाव नहीं किया.  वे दूसरे धर्मों और जातियों के साथ सहिष्णु भावना रखते थे.  इतिहास में ऐसे साक्ष्य मौजूद है कि राजा समुद्रगुप्त ने सीलोन के राजा मेधवर्मन के द्वारा भेजे गए दूतसंदेश के आधार पर बोधगया में बौद्ध तीर्थयात्रियों के लिए विशाल बौद्ध मन्दिर और विहार बनाने के अनुमति दी थी. जिसे इतिहास में उनकी दयालुता को तौर पर देखा जाता है.

गुप्त वंश के दूसरे सम्राट थे समुद्रगुप्त
समुद्रगुप्त ने 335 ईस्वी में गुप्त राजवंश के दूसरे सम्राट के रूप में सिंहासन संभाला था.  इसके बाद उन्होंने निरंतर अपने साम्राज्य का विस्तार किया.  समु्द्रगुप्त ने अपने पड़ोस के तीनों राज्यों से अपने पहले आर्यावर्त युद्ध में अहिच्छत्र से अच्युत नागा, पद्मावती से नागा सेना और मथुरा से गणपति नागा पर विजय पताका फहरा दी थी.  इतिहासकारों के अनुसार समुद्रगुप्त ने कई राजाओं को जीता, जंगली जातियों पर उसने सत्ता जमाई और सीमा प्रांत के जातीय नायकों को भी अपने वश में कर लिया था.  पंजाब की ओर अनेक गणराज्यों की बडी-बडी सेनाएं को जीतकर समुद्रगुप्त ने अपने साम्राज्य में मिला लिया. उत्तर के कुछ राज्यों को जीतने के बाद समुद्रगुप्त ने दक्खिन की ओर अपना विजय रथ दौड़ा दिया.
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी एक कविता में लिखा है
तुझे याद है, चढ़े पदों पर, कितने जय-सुमनों के हार?
कितने बार समुद्रगुप्त ने, धोयी है तुझमें तलवार?

इतिहास में अमर हैं समुद्रगुप्त
प्रयाग प्रशस्ति में पल्लवों पर भी समुद्रगुप्त को विजय अभियानों का विस्तार से उल्लेख किया है.  दक्षिणापथ के युद्ध में दक्षिण के 12 राजाओं को समुद्रगुप्त ने युद्ध के मैदान में हराया और उदारता दिखाते हुए सभी दक्षिणी राजाओं को राज्य सौंप दिया. जिससे समुद्रगुप्त राजाओं के राजा, महाराजा बन गए थे. दक्षिण की ओर, बंगाल की खाड़ी के किनारे उन्होंने अपनी महान शक्ति का विस्तार किया.  पीठापुरम के महेंद्रगिरि, कांची के विष्णुगुप्त, कुरला के मंत्रराज, खोसला के महेंद्र और कृष्णा नदी तक समुद्रगुप्त की विजय पताका फहरा रही थी. 

समुद्रगुप्त ने उत्तर में प्रचलित ‘दिग्विजय‘ के खिलाफ ‘धर्म विजय‘ नीति अपनायी.  दक्षिणी राजाओं को अपने राज्यों पर शासन करने का अधिकार और सर्वोच्चता देने के बाद उन्होंने उत्तर भारत की ओर फिर से रुख किया.  जिसके बाद उनका दूसरा उत्तरी अभियान शुरू हुआ. क्योंकि सम्राट समुद्रगुप्त के पीठ मोड़ते ही उत्तर में विद्रोह शुरु हो गया था.

 

समुद्रगुप्त ने विद्रोहियों को सिखाया अच्छा सबक
समुद्रगुप्त की दक्षिण में विजय यात्रा सफल रही थी. लेकिन जब वे वापस लौटे तो उत्तर के कई राजाओं ने फिर से अपने को स्वतंत्र घोषित कर रखा था. ये सम्राट समुद्रगुप्त के खिलाफ विद्रोह था. विद्रोह करने वाले राजाओं में रुद्रदेव, मतिल, नागदत्त, चंद्रवर्मा, गणपति नाग, नागसेन, अच्युत नंदी और बलवर्मा शामिल थे.  समुद्रगुप्त के लिए एक बार फिर उत्तर भारत में रणक्षेत्र तैयार था. युद्ध के मैदान में समुद्रगुप्त ने एक बार फिर सिर उठाने वाले राजाओं को उन्होंने घमासान युद्ध करके सबक सिखाया. 

महान सम्राट समुद्रगुप्त के सामने कोई नहीं खड़ा हो पाया.
उत्तरापथ के विद्रोह को कुचलते हुए समुद्रगुप्त अपने विजय रथ के साथ एक बार फिर पुष्पपुर यानि पाटलिपुत्र तक जा पहुंचे.  समुद्रगुप्त ने सभी राजाओें और राज्यों को जीतने के बाद अपने साम्राज्य में मिला लिया.  अब इस महान शक्ति के सामने किसी के पास सिर उठाने का साहस नहीं बचा था. समुद्रगुप्त के अधीन समहत, कामरूप, नेपाल, आसाम का नागा प्रदेश देवाल और कुमायूँ-गढ़वाल के पर्वत प्रदेश कर्तृपुर थे.  साथ ही मालवा, अर्जुनायन, यीधेय, माद्रक, आभीर, प्रार्जुन, सनकानीक, काक और खर्परिक नाम के गणराज्यों ने भी अधीनता स्वीकार कर ली थी। दक्षिण और पश्चिम के कई राजा बराबर समुद्रगुप्त को खुश रखने के लिए उपहार भेजने लगे थे.

पूरे भारत के अबाध शासक बन गए समुद्रगुप्त
समुद्रगुप्त का साम्राज्य पश्चिम में गांधार से लेकर पूर्व में आसाम तक, उत्तर में हिमालय के कीर्तिपुर जनपद से लेकर दक्षिण में सिंहल तक फैल चुका था. प्रयाग की प्रशस्ति में समुद्रगुप्त के महादंडनायक हरिषेण ने लिखा है, 'पृथ्वी भर में कोई उसका प्रतिरथ नहीं था. सारे आर्यावर्त को समुद्रगप्त ने अपने बाहुबल से बाँध रखा था.'

समुद्रगुप्त की कीर्ति चारो ओर फैल गई. पूरे भारतवर्ष में उनका अबाध शासन स्थापित था.  समुद्रगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ किया और ब्राह्मणों, दीनों, अनाथों को अपार दान दिया.  शिलालेखों में मिले साक्ष्यों में 'चिरोत्सन्न अश्वमेधाहर्त्ता' और 'अनेकाश्वमेधयाजी' कहा गया है. 

कई गुणों के सागर थे समुद्रगुप्त
महाकवि हरिषेण के मुताबिक 'उसका मन सत्संगसुख का व्यसनी था. उसके जीवन में सरस्वती और लक्ष्मी का अविरोध था. वह वैदिक धर्म के अनुगामी थे.  ऐसा कोई भी सद्गुण नहीं है जो उनमें न रहा हो. सैकड़ों देशों पर विजय प्राप्त करने की उसकी क्षमता अपूर्व थी.  परशु, बाण, शंकु, आदि अस्त्रों के घाव उसके शरीर की शोभा बढ़ाते थे.  उनकी नीति थी साधुता का उदय हो तथा असाधुता कर नाश हो.  उनका हृदय इतना मृदुल था कि प्रणतिमात्र(प्रणाम करने) से पिघल जाता था.  उन्होंने लाखों गायों का दान किया था.
राजा समुद्रगुप्त की रुचि, संगीत, कला-प्रेम, प्रशासनिक और राजनीति में थी.  वे महान् विजेता, दिग्विजयी, नीति-निपुण शासक, राजनीतिज्ञ, साहित्य और कला प्रेमी, दृष्टिकोण रखने वाले शासक थे.  सम्पूर्ण भारत को तत्कालीन समय में राजनीतिक एकता, सांस्कृतिक एकता में बांधने वाला महान् चक्रवर्ती सम्राट का द्वार महान कवियों और विद्वानों से भरा था. वह संगीत में गहरी दिलचस्पी रखते थे. 

समुद्रगुप्त का काल माना गया है स्वर्णयुग
 इतिहासकार वी.ए. स्मिथ ने समुद्रगुप्त को उनकी विजय के लिए भारत का  नेपोलियन कहा.  भारत के महान शासक समुद्रगुप्त अपने जीवन काल मे कभी पराजित नही हुए.  समुद्रगुप्त ने भारत में स्वर्ण युग की शुरुआत की थी.  समुद्रगुप्त ने मुद्रा सम्बन्धी अनेक सुधार किये. उन्होंने शुद्ध स्वर्ण की मुद्राओं और उच्चकोटि की ताम्र मुद्राओं का प्रचलन करवाया. समुद्रगुप्त ने चांदी की मुद्राओं का प्रचलन नहीं करवाया. दान में भी वह शुद्ध सोने की मुद्रा प्रदान करते थे. समुद्रगुप्त के सात प्रकार की मुद्राएँ बयाना, बनारस, जौनपुर, बोधगया आदि स्थानों से प्राप्त हुई हैं.  इनमें गरुड़, धनुर्धर, परशु, अश्वमेध, व्याघ्र, निहन्ता और वीणा से अंकित मुद्राएँ उल्लेखनीय हैं.  यह उनके शासन के वैभव का प्रतीक है. 

समुद्रगुप्त ने करीब 40 वर्षों तक उत्कृष्ट शासन किया.  लंबे शासन के बाद समुद्रगुप्त की मृत्यु 380 ईस्वी में हुई. बाद में उनके पु्त्र चंद्रगुप्त द्वितीय ने उनके साम्राज्य को आगे बढ़ाया.