बीरबल: वह हिंदू नाम जिसका प्रयोग अकबर को 'महान' बनाने के लिए हुआ!

इस बात की आशंका जाहिर की जाती हैं कि बीरबल नाम का इस्तेमाल अकबर की धर्मनिरपेक्षता को साबित करने और उसे 'महान' बनाने के लिए किया गया था. अकबर ने दीन-ए-इलाही नाम का एक धर्म चलाया था. इसे मानने वालों में बीरबल भी बताए जाते हैं.

Written by - Vikas Porwal | Last Updated : Feb 25, 2021, 10:32 AM IST
  • 1586 में राजा बीरबल के नाम से प्रसिद्ध महेश दास की हुई थी मृत्यु
  • एक बागी कबीले के साथ हुई लड़ाई में 25 फरवरी को मारे गए थे
बीरबल: वह हिंदू नाम जिसका प्रयोग अकबर को 'महान' बनाने के लिए हुआ!

नई दिल्लीः Facebook या Youtube स्क्रॉल करते हुए फिल्मों के डिलीटेड सीन और Spoof सामने आते रहते हैं. इसी बीच अक्सर फिल्म जोधा-अकबर (हृतिक-ऐश्वर्या) का एक डिलीटेड सीन अपनी ओर ध्यान खींचता है. अकबर दरबार-ए-आम में है. यहां उससे मुलाकात के लिए मुलाकाती पहुंच रहे हैं. 

जोधा-अकबर फिल्म का एक सीन देखिए
एक सिपाही आने वाले फरियादियों से धन वसूल करके ही उन्हें अंदर जाने दे रहा है. महेश दास नाम का एक व्यक्ति भी अकबर से मुलाकात करने पहुंचता है, लेकिन सिपाही उसे रोक लेता है. वजह वही, धन दो और अंदर जाओ. महेश दास धन न होने की बात कहते हैं, लेकिन तय होता है कि अगर दरबार में कुछ ईनाम मिला तो उसका आधा महेश दास सिपाही को दे देंगे.

महेश दास दरबार में अकबर से 50 कोड़े की सजा मांगता है और इस तरह अकबर के ठीक नाक के नीचे हो रही रिश्वतखोरी की पोल खुल जाती है. 

आज है बीरबल की पुण्यतिथि
फिल्म में सीन नहीं था, क्यों नहीं था इसे Ashutosh Gowariker जानें, लेकिन आज बीरबल की बात इसलिए क्योंकि आज के इतिहास में दर्ज है कि तारीख 25 फरवरी को अकबर के खास नवरत्नों में से एक बीरबल की मृत्यु आज ही हुई थी.

1586 में राजा बीरबल के नाम से प्रसिद्ध महेश दास एक बागी कबीले के साथ लड़ाई में मारे गए थे. इस बात से अकबर को भी गहरा दुख पहुंचा था. 

लेकिन, क्या कभी कोई बीरबल था?
हालांकि भारतीय इतिहास जिस तरह से हर बार दाएं और बाएं हिस्से में बंटा नजर आता है. बीरबल के साथ भी ऐसा ही कुछ है. लेकिन इसमें भी खास बात है कि लेफ्ट और राइट दोनों ही इतिहासकारों में आधे-आधे ये मानते हैं कि राजा बीरबल नाम कोई किरदार ही नहीं था, तो आधे यह भी मानते हैं असल नाम महेश दास की पहचान रखने वाले बीरबल मध्य प्रदेश के सीधी जिले से थे.

wikipedia पर दर्ज ब्यौरे के मुताबिक बीरबल 1528 में कभी जन्मे थे. जन्म की तारीख नहीं दर्ज है. हालांकि वहां निधन की तारीख 16 फरवरी 1586 लिखी है. यानी आज से ठीक 9 दिन पहले की Date. 

अकबरनामा में नहीं है बीरबल की बात
विरोधाभास की जो लकीर खिंचती चली जाती है उसकी शुरुआत यहीं से होती है. सवाल उठता है कि अकबर को महान बताने वाली और उसकी ता-जिंदगी को किताब की शक्ल में उतारने वाले अबुल फजल ने बीरबल का जिक्र क्यों नहीं किया.

एक मीडिया रिपोर्ट भी इस बात की तस्दीक करती है और RTI के हवाले से यह दावा करती है कि अकबर के समय में लिखी गई इतिहास की पुस्तकें 'अकबरनामा, आइने अकबरी और तबराते अकबरी' में कहीं भी नवरत्नों का जिक्र नहीं है. 

हालांकि कुछ जगहों पर दर्ज है कि अबुल फजल ने कहीं-कहीं ऐसा तो जिक्र किया है कि अकबर वाकई बीरबल नाम के किसी व्यक्ति से सलाह-मशविरा किया करता था, लेकिन उस खास व्यक्ति के जन्म-जन्म स्थान का कोई जिक्र अकबरनामा में नहीं मिलता है. 

आगरा के किले में बीरबल महल?
तकरीबन 6 साल पहले आगरा किले में एक इमारत को लेकर भी विवाद उठा था. स्थानीय प्रशासन ने उसे बीरबल का महल बताते हुए सेना से अपने सुपुर्द कराने की बात की थी. लेकिन दिल्ली पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इस इमारत को दानाशाह का महल बताया है.

विभाग की बात मान लें तो इस तरह से बीरबल नाम के किरदार होने का एक और सबूत गलत साबित होता है. यह बात सिर्फ बीरबल उर्फ महेश दास के लिए ही लागू नहीं होती है. बल्कि इस तथ्य के कारण अकबर के नौ नवरत्न होने की कहानी पर भी शंका होती है. 

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कहां से आई नवरत्न की अवधारणा
भारतीय पुरातन इतिहास को उठाकर देखें तो राजाओं की वीरता-चतुरता के साथ उनके खास कारिंदों और मंत्रियों की भी चर्चा खूब रही है. इस कड़ी में सम्राट अशोक, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, चंद्रगुप्त मौर्य और कभी-कभी शिवाजी का नाम भी आता है. लेकिन नवरत्नों को लेकर भारतीय आम समाज में सबसे अधिक प्रसिद्ध नाम रहा है वह है राजा कृष्णदेव राय.

प्राचीन विजयनगर साम्राज्य के राजा. हालांकि आज विजयनगर सिर्फ खंडहरों में है, लेकिन इतिहास कहता है कि कभी यह बेहद धनी और सभ्य नगर रहा था. 

तेनालीराम से मिलते-जुलते बीरबल
राजा कृष्णदेव राय के खास पुरोहित, मंत्री और सलाहकार थे ब्राह्मण तेनालीराम. हालांकि इतिहासकारों का एक धड़ा तेनालीराम को भी गढ़ा हुआ बताता है. मजे की बात कृष्णदेव राय और अकबर दोनों का ही काल 15वीं शताब्दी का है.

दूसरी बात इन दोनों के अपने-अपने मंत्रियों के किस्से एक ही जैसे हैं. अदल-बदल कर चतुराई की जो किस्सागोई बीरबल के लिए कही जाती है वही किस्से तेनालीराम के साथ भी जुड़ जाते हैं.  

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तो क्या बीरबल नाम का इस्तेमाल किया गया?
इस बात की अधिक आशंकाएं जाहिर की जाती हैं कि बीरबल नाम का इस्तेमाल अकबर की धर्मनिरपेक्षता को साबित करने के लिए किया गया. अकबर ने दीन-ए-इलाही नाम का एक धर्म चलाया था. इसे मानने वालों में बीरबल भी बताए जाते हैं. वहीं हिंदू-मुसलमानों के बीच परस्पर संबंध या फिर यह दिखाने के लिए कि हिंदू भी अकबर की बादशाहत को मानते हैं, इसके लिए धड़ल्ले से बीरबल और शास्त्रीय गायक तानसेन का नाम ले लिया जाता है. 

बीबीसी की एक पुरानी रिपोर्ट सीधे सीधी (मध्य प्रदेश) के गांव में ले जाती है. दावा किया जाता है कि यहां बीरबल के वंशज आज भी रह रहे हैं. हालांकि यह रिपोर्ट किसी स्पष्ट दस्तावेज का हवाला नहीं देती है, लेकिन शंख, घंटा और कुछ ऐसी ही पुरानी दिखने वाली वस्तुओं पर दावा करती है कि वह बीरबल की हैं. 

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इस विषय में शोध की जरूरत
एक विवाद बीरबल के नाम को लेकर भी है. बीरबल को ब्राह्मण तो बताया जाता है लेकिन कहीं उन्हें बीरबल दुबे लिखा मिलता है तो कहीं उनके असली नाम के साथ महेश दास भट्ट लिखा मिलता है. एक कहानी के मुताबिक, बीरबल पनवाड़ी हुआ करते थे. हालांकि उस दौर के भारत में जाति आधारित कर्म के कड़े विधान मानने वाले समय में यह बात मुश्किल ही लगती है. 

खैर, इतिहास के साथ-साथ असल क्या है यह शोध की जरूरत तो है ही, साथ ही पिछले दिनों इसके फिर से लेखन की जो मांग उठ रही है अगर उसकी कवायद हो तो चतुर बीरबल की चतुराई शायद सही आयाम पा सके. यह वाकई गौरव की बात होगी.  

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