Navratri special: माता वाराही देवीधुरा धाम, जहां होता है पत्थरमार युद्ध

शक्तिपीठ मां वाराही का मंदिर जिसे देवीधुरा के नाम से भी जाना जाता हैं. देवीधुरा में बसने वाली मां वाराही का मंदिर 52 पीठों में से एक माना जाता है. आषाढ़ की सावन शुक्ल पक्ष में यहां गहड़वाल, चम्याल, वालिक और लमगड़िया खामों के बीच बग्वाल (पत्थरमार युद्ध) होता है. 

Written by - Zee Hindustan Web Team | Last Updated : Oct 20, 2020, 05:56 PM IST
    • शक्तिपीठ मां वाराही का मंदिर जिसे देवीधुरा के नाम से भी जाना जाता हैं.
    • देवीधुरा में बसने वाली मां वाराही का मंदिर 52 पीठों में से एक माना जाता है.
Navratri special: माता वाराही देवीधुरा धाम, जहां होता है पत्थरमार युद्ध

नई दिल्लीः भारत भूमि का कंकण-कंकण शंकर है और पर्वत-पर्वत मंदिर. देवी-देवताओं की लीला स्थली और ऋषि मुनियों की तपस्थली वाला यह देश कई अवतारों से धन्य रहा है. देश में शारदीय नवरात्र की धूम है और ऐसे पावन समय में जब Corona का संकट छाया हुआ है तो मंदिर दर्शन अभी सुलभ नहीं है. 

माता वाराही धाम-अल्मोड़ा
जी हिंदुस्तान मंदिरों के दर्शन कर रहा है. इसी कड़ी में दर्शन कीजिए माता के उस परमधाम के जो अपने आप में कई रहस्यों को समेटे हुए है.  देवभूमि उत्तराखंड में लोहाघाट-अल्मोड़ा मार्ग पर लोहाघाट से लगभग 45 कि.मी की दूरी पर स्थित है देवीधुरा. यहीं पर माता बाराही देवी का धाम है.

यह धाम युगों पुराना वाराह अवतार से जुड़ा हुआ और महाभारत के कई प्रसंगों को खुद में समेटे हुए है. रक्षाबंधन के दिन यहां होने वाला बाग्वाल युद्ध रोचकता का केंद्र है. 

52 शक्तिपीठों में से है एक
शक्तिपीठ मां वाराही का मंदिर जिसे देवीधुरा के नाम से भी जाना जाता हैं. देवीधुरा में बसने वाली मां वाराही का मंदिर 52 पीठों में से एक माना जाता है. आषाढ़ की सावन शुक्ल पक्ष में यहां गहड़वाल, चम्याल, वालिक और लमगड़िया खामों के बीच बग्वाल (पत्थरमार युद्ध) होता है. देवीधूरा में वाराही देवी मंदिर शक्ति के उपासकों और श्रद्धालुओं के लिये पावन और पवित्र स्थान है.

ये क्षेत्र देवी का उग्र पीठ माना जाता है. चन्द राजाओं के शासन काल में इस सिद्ध पीठ में चम्पा देवी और ललत जिह्वा महाकाली की स्थापना की गई थी. तब “लाल जीभ वाली महाकाली" को महर और फर्त्यालो द्वारा बारी-बारी से हर साल नियमित रुप से नरबलि दी जाती थी. माना जाता है कि रुहेलों के आक्रमण के समय कत्यूरी राजाओं द्वारा इस मूर्ति को घने जंगल के बीच एक भवन में स्थापित कर दिया गया था.

यह है पौराणिक मान्यता
धीरे-धीरे इसके चारो ओर गांव स्थापित हो गये और ये मंदिर लोगों की आस्था का केन्द्र बन गया. पौराणिक कथाओं के अनुसार ये स्थान गुह्य काली की उपासना का केन्द्र था. जहां किसी समय में काली के गणों को प्रसन्न करने के लिये नरबलि की प्रथा थी. इस प्रथा को कालान्तर में स्थानीय लोगों द्वारा बन्द कर दिया गया. देवीधूरा के आस-पास निवास करने वाले लोग वालिक, लमगड़िया, चम्याल और गहड़वाल खामों के थे. 

इसलिए होता है युद्ध
बताया जाता है कि इन्हीं खामों में से हर साल एक व्यक्ति की बारी-बारी से बलि दी जाती थी. इसके बाद नर बलि बंद कर दी गयी और बग्वाल यानी की पत्थर मार युद्ध की परम्परा शुरू हुई. इस बग्वाल में चार खाम उत्तर की ओर से लमगड़िया, दक्षिण की ओर से चम्याल, पश्चिम की ओर से वालिक, पूर्व की ओर से गहडवाल के रणबांकुरे बिना जान की परवाह किये एक मानव रक्त निकलने तक युद्ध लड़ते हैं.

मां वाराही देवी के मुख्य मंदिर में तांबे की पेटिका में मां वाराही देवी की मूर्ति है. मान्यता है कि कोई भी व्यक्ति मूर्ति के दर्शन खुली आँखों से नहीं कर सकता है. देवीधुरा का नैसर्गिक सौन्दर्य भी मोहित करने वाला है. साथ ही विश्व प्रसिद्ध बगवाल मेले को देखने दूर-दूर से सैलानी देवीधुरा पहुंचते हैं. 

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