कौन हैं दुनिया की सबसे बड़ी पतिव्रता

आम तौर पर पतिव्रत धर्म की बात आती है तो पार्वती,लक्ष्मी और सरस्वती जैसी देवियों का नाम लिया जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह दैवीय शक्तियां नहीं बल्कि एक मानवी को दुनिया की सबसे बड़ी पतिव्रता माना जाता है. जिन्होंने अपने पतिव्रत धर्म से ब्रह्मा विष्णु और महेश को दूध पीता बच्चा बना दिया था.    

कौन हैं दुनिया की सबसे बड़ी पतिव्रता

नई दिल्ली: देवी सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती को इस बात का थोड़ा अभिमान हो गया कि वे संसार की सबसे पतिव्रता देवियां हैं तभी उन्हें पति के रूप में त्रिलोकेश (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) मिले जिनके दर्शन के लिए सभी देवगण, ऋषि, यक्ष, गंधर्व आदि तरसते हैं. इस अभिमान के कारण देवियों के तेज में कमी आ रही थी. इसलिए प्रभु ने एक लीला रची.

सती अनुसूया की महिमा
प्रभु ने नारद मुनि के मन में एक प्रेरणा पैदा की. उसके प्रभाव में नारद लक्ष्मी माता के पास पहुँचे. माता ने नारद से काफी दिनों बाद आने का कारण पूछा तो नारदजी बोले- 'मैं चित्रकूट में महर्षि अत्रि की पत्नी देवी अनुसूयाजी के दर्शन करके आ रहा हूं. तीनों लोकों में अनुसूया के जैसी पतिव्रता स्त्री कोई दूसरी नहीं है. परिव्रत का प्रभाव ऐसा है कि देवगण भी आकाश मार्ग से गुजरते हुए देवी के दर्शन और आशीर्वाद लिए बिना नहीं जाते.'

नारद ने ऐसी ही बातें माता पार्वती और माता सरस्वती से भी कहीं. तीनों देवियों को बताया कि देवी अनुसूया के आगे उनका पतिव्रत कुछ भी नहीं है. इससे तीनों को अनुसूया से ईर्ष्या होने लगी. उन्होंने त्रिदेवों से हठ करके अनुसूया के सतीत्व की परीक्षा लेने के लिए राजी कर लिया.

कुछ इस तरह ली गई अनुसूया की परीक्षा
ब्रह्मा, विष्णु और महेश साधु वेश में अत्रि के आश्रम पहुँचे. अत्रि आश्रम में नहीं थे. अतिथियों को अनुसूया ने दूध पीने के लिए दिया लेकिन तीनों ने पीने से मना कर दिया. अनुसूया ने कारण पूछा तो त्रिदेवों ने कहा- हम इसे तभी ग्रहण करेंगे यदि आप निवस्त्र होकर परोसें.

अनुसूया ने अपने तप के बल से समझ लिया कि ये तीनों कौन हैं. उन्होंने हाथ में जल लिया और बोलीं- अगर मैं सच्ची पतिव्रता हूँ तो आप तीनों छह माह के बालक बन जाएं.' अनुसूया के त्रिदेवों पर जल छिडकते ही तीनों छह माह के बालक बन गए. देवी ने उन्हें अपना दूध पिलाया और पालने में झूला झुलाने लगीं.

देवियों को मांगनी पड़ी क्षमा
त्रिदेवों की दशा नारद समेत देवी सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती घबराकर अनुसूया के पास पहुंची. क्षमा मांगते हुए उनके पतियों को वापस लौटाने को कहा. प्रभु की लीला अभी पूरी नहीं हुई थी. उन्होंने अनुसूया के मन में प्रेरणा डाली. अनूसूया ने कहा- देवियों बालक रूप में, मेरे लिए तो तीनों पुत्र समान हैं. इसलिए मेरे लिए अंतर कर पाना असंभव है. आप पतिव्रता देवियां हैं. इस रूप में भी आप अपने पतियों को पहचान सकती हैं. आप अपने पति चुन लें.

त्रिदेवों के अंश से उत्पन्न हुए अनुसया के पुत्र
तीनों देवियों ने एक-एक बालक उठा लिया. त्रिदेव अपने असली रूप में आए. सरस्वती ने शिवजी को, लक्ष्मी ने ब्रह्मा को और पार्वती ने विष्णु को उठा लिया था. तीनों लज्जित हुईं. उन्होंने अनुसूया के सतीत्व को प्रणाम किया. त्रिदेवों ने अनुसूया से वरदान मांगने को कहा.

अनुसूया ने मांगा कि तीनों के अंश उनके संतान के रूप में जन्म लें. वरदान देकर त्रिदेव अपनी पत्नियों समेत चले गए. ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा, विष्णुजी के अंश से दत्तात्रेय और शिवजी के अंश से दुर्वासा मुनि ने देवी अनुसूया के घर में जन्म लिया. ये तीनों त्रिदेवों के अंशावतार कहे जाते हैं.