पर्यावरण समस्या से अब तक हो चुकी हैं 1 लाख मौतें: रिपोर्ट

जलवायु परिवर्तन की समस्या से पूरा विश्व परेशान है. न सिर्फ प्रकृत्ति बल्कि लोगों की स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ते प्रदूषण के साथ बढ़ती चली जा रही हैं. खासकर बच्चों और बुजुर्गों पर इसका असर काफी ज्यादा ही हो रहा है. यह एक अमेरिकी रिपोर्ट में साफ दर्शाया गया कि इससे भारत को अब तक कितना नुकसान हो चुका है.  

पर्यावरण समस्या से अब तक हो चुकी हैं 1 लाख मौतें: रिपोर्ट

नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन से जो चीज सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही है, वो है फसल. फसल की पैदावार खराब होती चली जा रही है जिससे बड़ी संख्या में लोग कुपोषित होते चले जा रहे हैं. यह कोई सुनी-सुनाई बात नहीं. इसकी पुष्टि की है अमेरिका के जलवायु परिवर्तन के खतरों की जांच करते हुए तैयार की गई एक रिपोर्ट में जिसका नाम है "द लांस काउंटडाउन". इस रिपोर्ट को मुख्य रूप से पांच केंद्रबिंदुओं पर तैयार किया गया है. पहला है क्लाइमेट चेंज यानी मौसम में बदलाव, प्लानिंग एंड हेल्थ, अर्थव्यवस्था, खर्च और पांचवा राजनीतिक ईच्छा या इसे प्रयास ही कह लें. 

आज से 70 साल बाद बढ़ जाएगा चार डिग्री तापमान

"द लांस काउंटडाउन" की तैयार की गई रिपोर्ट में 35 अन्य संस्थाएं और 120 से भी ज्यादा विशेषज्ञों के सहयोग से तैयार की गई है. रिपोर्ट में तकरीबन 41 संकेतों का वार्षिक विश्लेषण किया गया है. रिपोर्ट की सह लेखिका पूर्णिमा प्रभाकरण कहती हैं कि 'द लांस काउंटडाउन' रिपोर्ट बच्चों के स्वस्थ्य से जुड़े खोज के अलावा कृषि संबंधी खोज, जनसंख्या और प्रदूषण से संबंधित खोजों के बारे में बताता है. इस शोध में यह देखा गया है कि अगर दुनिया इसी तरह प्रदूषण को बढ़ाती रही और आगे बढ़ती रही तो न केवल बचपन बल्कि सभी जीवों की जिंदगी प्रभावित होगी. ग्लोबल वार्मिंग लगातार बढ़ता ही जा रहा है जिसे अगर रोका नहीं गया तो आज के दिन जन्म लेने वाला कोई बच्चा अपने 70वें जन्मदिन पर तकरीबन चार डिग्री ज्यादा का तापमान या गर्मी सहेगा. इस खतरनाक हीट स्ट्रोक से बीमारियां तो जो बढ़ेंगी सो अलग खाद्य पदार्थों का उत्पादन भी कम होगा. 

फसलों में गिरावट से अनाज की समस्या भी अधिक

वहीं पर्यावर्णविद गिरीश रावत कहते हैं कि रिपोर्ट के मुताबिक 1960 के दशक के बाद से भारत में कई फसलों के उत्पादन में औसतन 2 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. मक्का और चावल के उत्पादन में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई है. चार प्रमुख फसल जिसे इस्तेमाल में लाया जाता है जैसे गेहूं में 6 फीसदी की, मक्का में 7.4 फीसदी, चावल में 3.2 फीसदी और सोयाबीन में 3.1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. धरती के बढ़ते तापमान से कृषि क्षेत्र में काफी घाटा देखने को मिल रहा है. अगर ठोस कदम नहीं उठाये गए तो आनेवाले समय में इससे होने वाले नुकसान में और बढ़ोत्तरी होने की सम्भावना है.

कोयले के धुएं से अब तक तकरीबन 1 लाख लोगों की मौतें

भारत में कोयले के धुएं से 97 हजार 400 से ज़्यादा लोगों की मौतें अब तक हो चुकी है. वही दूसरी ओर भारत में कोयला आधारित ऊर्जा आपूर्ति में 11% की बढ़ोत्तरी ही हुई है बजाए कि कम होने के. भारत में प्रदूषण से जीवन, स्वास्थ्य के मुद्दों, जलवायु समस्याओं के अलावा पारिस्थितिकी चुनौतियों से भी काफी नुकसान होगा. फसलों में गिरावट लगातार समस्या का कारण बनी हुई है. 

गेहूं  में 6 फीसदी, 
मक्का में 7.4 फीसदी, 
चावल में 3.2 फीसदी, 
सोयाबीन में 3.1 फीसदी तक का घाटा हुआ है. 
बढ़ते तापमान से कृषि में काफी नुकसान हुआ है. 

आने वाले वक्त में स्थिति और गंभीर होने की संभावनाजताई जा रही है. वक्त रहते अगर चेत नहीं जाएंगे तो समस्याएं और भी भारी रूप ले सकती हैं. 

क्यों जरूरी है पर्यावरण की समस्या का जल्द समाधान ?

पर्यावरण की समस्या के चलते देशों की अर्थव्यवस्था काफी प्रभावित हो रही है. जरूरी है कि कार्बन उत्सर्जन को कम किया जाए. पेरिस समझौते में सभी देशों ने जो कार्बन कट की प्रतिबद्धता जाहिर की थी, वह सब अभी ठंडे बस्ते में चला गया है. न ही अक्षय ऊर्जा के प्रयोग में ही ज्यादा बढ़ोत्तरी हुई है ना ही वैकल्पिक उपायों में. भारत में पश्चिमी राज्यों में अक्षय ऊर्जा के उपयोगों के बढ़ाए जाने की संभावना बहुत ज्यादा है. राजस्थान, गुजरात और पंजाब जैसे राज्य इस क्षेत्र में आगे बढ़ तो रहे हैं, लेकिन इतना काफी नहीं है. वैश्विक मंचों पर ज्लद से जल्द किसी आपसी सहमति का बनना और इस पर काम किया जाना बेहद आवश्यक हो गया है.