कृषि विधेयकों पर क्या है किसानों की चिताएं, विस्तार से जानिए पूरी बात

जिन तीन विधेयकों के जरिए कृषि सुधार का दावा किया जा रहा है वह हैं,  द फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फेसिलिटेशन) बिल 2020, द फार्मर्स (एम्पॉवरमेंट एंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑफ प्राइज एश्योरेंस एंड फार्म सर्विसेस बिल 2020 और द एसेंशियल कमोडिटीज (अमेंडमेंट) बिल 2020. 

कृषि विधेयकों पर क्या है किसानों की चिताएं, विस्तार से जानिए पूरी बात

नई दिल्लीः केंद्र सरकार की केंद्रीय मंत्रिमंडल से हरसिमरत कौर बादल ने इस्तीफा दे दिया. सरकार में वे फूड प्रॉसेसिंग इंडस्ट्रीज मिनिस्टर थीं. हरसिमरत कौर बादल के इस्तीफे से NDA की पेसानी पर पसीना आ गया है. इसकी वजह है कि इस्तीफे तक गई ये बगावत कहीं आगे बढ़कर NDA से नाता तोड़ने वाली न बन जाए. 

CM अमरिंदर की चुनौती थोड़ी रंग लाई
NDA का यह डर भी वाजिब है, क्योंकि इस्तीफा कोरी गप नहीं है, बल्कि पंजाब के सीएम कैप्टन अमरिंदर की उस चुनौती का जवाब है जो उन्होंने अकाली दल को दी थी. गुरुवार को कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि बादल परिवार अब भी सरकार के साथ चिपके हुए है, जबकि मोदी सरकार किसानों के खिलाफ बिल ला रही है. 

उन्होंने कहा कि ऐसे में शिरोमणि अकाली दल के नौटंकी से पंजाब के किसानों का नुकसान वापस नहीं होगा, जो उन्होंने पहले किया है. उन्होंने चुनौती दी कि अगर वह किसानों के हित के साथ हैं तो उन्हें केंद्र से सहयोगी दल के रूप में अपना नाता तोड़ लेना चाहिए. हालांकि बात अभी इस्तीफे तक है, और अकाली दल ने यह कहा है कि वह NDA का समर्थन करती रहेगी. 

असली सवाल, विधेयकों का मसला क्या है?
तो मौजूदा दो मसलों में से एक मसला तो फिलहाल सुलझा कि अभी गठबंधन खतरे में नही है. अब आता है दूसरा मसला, यानी वह जिसके कारण यह चुनौती वाला दांव-पेच प्रकाश में आया. वह मसला है कृषि विधेयक.

 

आखिर उन कृषि विधेयकों में ऐसा क्या है, जिसे लेकर हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश तक के किसान खेतों से निकलकर सड़क पर आ रहे हैं और विपक्षी दल दूर से ही उनका नेतृत्व कर रहे हैं. 

अध्यादेश के तौर पर जारी हुए थे विधेयक
दरअसल कृषि से जुड़ा यह मसला एक नहीं तीन विधेयकों का है. इनकी कहानी को समझने के लिए हमें कुछ महीने पीछे की ओर चलना होगा, जब देश में लॉकडाउन था. इन तीन विधेयकों को अध्यादेश के तौर पर लॉकडाउन के दौरान जारी किया गया था.

इसके जरिए किसानों की आय बढ़ाने, फसल या उत्पाद का रिस्क खत्म करने और फसल का सही मूल्य मिलने की दिशा में सही कदम बढ़ाने की तैयारी थी. कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने भी अध्यादेश जारी करते हुए ऐसा ही कहा था. 

एक नहीं, तीन कृषि विधेयक हैं विरोध की वजह
जिन तीन विधेयकों के जरिए कृषि सुधार का दावा किया जा रहा है वह हैं,  द फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फेसिलिटेशन) बिल 2020, द फार्मर्स (एम्पॉवरमेंट एंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑफ प्राइज एश्योरेंस एंड फार्म सर्विसेस बिल 2020 और द एसेंशियल कमोडिटीज (अमेंडमेंट) बिल 2020. 

विरोध की असली वजह है MSP
इन्हें हिंदी में समझें तो पहला विधेयक है आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, दूसरा है कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक और तीसरा कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक.

इन तीनों ही बिलों को लेकर अलग-अलग समस्या हैं, लेकिन एक कॉमन समस्या जो कि इन विधेयकों के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन का आधार है, वह है न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी कि (MSP) 

किसानों के मन में हैं आशंकाएं
विश्लेषकों और चिंतकों का कहना है कि तीनों विधेयकों में न्यूनतम समर्थन मूल्य का एक बार भी उल्लेख नहीं है और इसी वजह से उन्हें यह डर है सरकार कहीं इनके जरिए एमएसपी (MSP) व्यवस्था ही खत्म तो नहीं कर देना चाह रही है.

हालांकि सरकार ने कहा है कि एमएसपी (MSP) को खत्म करने की कोई योजना नहीं है, लेकिन किसानों का कहना है कि इस विषय में उन्हें भरोसे में नहीं लिया गया है. 

हरसिमरत कौर ने भी इसलिए दिया है इस्तीफा
यहां तक कि गुरुवार को जब केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने इस्तीफा दिया तो उन्होंने भी कहा कि कृषि उत्पाद की मार्केटिंग (Marketing) के मुद्दे पर किसानों की आशंकाओं को दूर किए बिना भारत सरकार (Indian Government) ने बिल को लेकर आगे बढ़ने का फ़ैसला लिया है.

विरोध की मुख्य वजह भी यही है. 

अब बात आती है कि विधेयकों में क्या है? 
केंद्र सरकार कानून के तौर पर जो व्यवस्था लागू कर रही है, उसको मोटे-मोटे तौर पर देखें तो इनमें कुछ मूलभूत बदलाव कर नए प्रावधान लाए गए हैं. नियमानुसार, अब व्यापारी मंडी से बाहर भी किसानों की फसल खरीद सकेंगे. वर्तमान व्यवस्था में किसानों की फसल को सिर्फ मंडी से ही खरीदा जा सकता था. 

आवश्यक वस्तु से बाहर हुए दाल, आलू-प्याज
वहीं केंद्र ने अब दाल, आलू, प्याज, अनाज, खाद्य तेल आदि को आवश्यक वस्तु के नियम से बाहर कर इसकी स्टॉक सीमा खत्म कर दी है. इन दोनों के अलावा केंद्र सरकार ने कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग को बढ़ावा देने की भी नीति पर काम शुरू कर रही है. इस पर भी किसान नाराजगी जता रहे हैं. 

क्या है आवश्यक वस्तु अधिनियम
आवश्यक वस्तु के नियम को समझने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 पर नजर भी डाल लेनी चाहिए. आवश्यक वस्तु अधिनियम को 1955 में भारत की संसद ने पारित किया था. तब से सरकार इस कानून की मदद से 'आवश्यक वस्तुओं' का उत्पादन, आपूर्ति और वितरण को नियंत्रित करती है ताकि ये चीजें उपभोक्ताओं को सही दाम पर उपलब्ध हों.

सरकार अगर किसी चीज को 'आवश्यक वस्तु' घोषित कर देती है तो सरकार के पास अधिकार आ जाता है कि वह उस पैकेज्ड प्रॉडक्ट का अधिकतम खुदरा मूल्य तय कर दे. उस मूल्य से अधिक दाम पर चीजों को बेचने पर सजा हो सकती है. 

एसेंशियल कमोडिटी (अमेंडमेंट) ऑर्डिनेंस से इस बात का डर
आवश्यक वस्तु की सूची में वस्तु या उत्पाद का नाम आ जाने के बाद कालाबाजारी या जमाखोरी से उस वस्तु का सुरक्षा भी हो जाती है. जमाखोरी की वजह से इन चीजों की आपूर्ति प्रभावित होती है तो आम जनजीवन प्रभावित होगा.

ऐसे में अगर दाल, आलू, प्याज, अनाज, खाद्य तेल आवश्यक वस्तु की सूची से बाहर निकल गए तो उनकी जमाखोरी की आशंका बढ़ जाएगी. आलोचकों और विश्लेषकों का कहना है कि फूड सिक्योरिटी पूरी तरह खत्म हो जाएगी. 

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