Friendship Day Urdu Poetry: पढ़िए फ्रेंडशिप डे पर उर्दू शायरी के कुछ बेहतरीन शेर

दुनिया के कई खूबसूरत रिश्तों में दोस्ती का रिश्ता भी बहुत अहम है. अगर यह कहें कि यही रिश्ता धर्मों को दीवार को सबसे ज्यादा गिराता है तो कुछ गलत नहीं होगा.  वह रिश्ता, जो ऊपर वाला बनाकर नहीं भेजता बल्कि हम खुद उसे अपने लिए चुनते है.

Friendship Day Urdu Poetry: पढ़िए फ्रेंडशिप डे पर उर्दू शायरी के कुछ बेहतरीन शेर
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नई दिल्ली: दुनिया के कई खूबसूरत रिश्तों में दोस्ती का रिश्ता भी बहुत अहम है. अगर यह कहें कि यही रिश्ता धर्मों को दीवार को सबसे ज्यादा गिराता है तो कुछ गलत नहीं होगा.  वह रिश्ता, जो ऊपर वाला बनाकर नहीं भेजता बल्कि हम खुद उसे अपने लिए चुनते है. इस रिश्ते की खासियर है कि उम्र के साथ इसके मायने भी बदलते रहते हैं. स्कूल में कुछ, कॉलेज में कुछ, ऑफिस में कुछ मायने होते हैं. 

आधिकारिक तौर पर इंटरनेशनल फ्रेंडशिप डे 30 जुलाई को मनाया जाता है. भारत और बांग्लादेश सहित कई अन्य देशों में फ्रेंडशिप डे अगस्त के पहले रविवार को मनाते हैं. आज के इस खास मौके पर हम आपको दोस्ती के संबंधित उर्दू शायरी के जखीरे से कुछ चुनिंदा शेर (Urdu Poetry On Friendship Day) लेकर आए हैं. जो आपको कहीं भी शेयर करने पड़ सकते हैं. पढ़ें शेर. 

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पढ़ें दोस्ती पर लिखे गए कुछ शेर (Urdu Poetry On Friendship Day In Hindi)

दोस्ती जब किसी से की जाए 
दुश्मनों की भी राय ली जाए 

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे 
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों 

तुम तकल्लुफ़ को भी इख़्लास समझते हो 'फ़राज़' 
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला 

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला 
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला 

पत्थर तो हज़ारों ने मारे थे मुझे लेकिन 
जो दिल पे लगा आ कर इक दोस्त ने मारा है 

अगर तुम्हारी अना ही का है सवाल तो फिर 
चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिए 

यूँ लगे दोस्त तिरा मुझ से ख़फ़ा हो जाना 
जिस तरह फूल से ख़ुशबू का जुदा हो जाना 

हम को यारों ने याद भी न रखा 
'जौन' यारों के यार थे हम तो 

दिल अभी पूरी तरह टूटा नहीं 
दोस्तों की मेहरबानी चाहिए 

दुश्मनों से प्यार होता जाएगा 
दोस्तों को आज़माते जाइए 

दाग़ दुनिया ने दिए ज़ख़्म ज़माने से मिले 
हम को तोहफ़े ये तुम्हें दोस्त बनाने से मिले 

तुझे कौन जानता था मिरी दोस्ती से पहले 
तिरा हुस्न कुछ नहीं था मिरी शाइरी से पहले

मुझे दोस्त कहने वाले ज़रा दोस्ती निभा दे 
ये मुतालबा है हक़ का कोई इल्तिजा नहीं है 

वो कोई दोस्त था अच्छे दिनों का 
जो पिछली रात से याद आ रहा है 

दोस्तों को भी मिले दर्द की दौलत या रब 
मेरा अपना ही भला हो मुझे मंज़ूर नहीं 

दुश्मनों के साथ मेरे दोस्त भी आज़ाद हैं 
देखना है खींचता है मुझ पे पहला तीर कौन 

भूल शायद बहुत बड़ी कर ली 
दिल ने दुनिया से दोस्ती कर ली 

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