डियर जिंदगी: कौन है जो अच्‍छाई को चलन से बाहर कर रहा है…

अर्थशास्‍त्र के नियम की जिंदगी के कॉलम में चर्चा इसलिए हो रही है, क्‍योंकि ग्रेशम का दिया यह नियम अर्थशास्‍त्र की हदों को पार करते हुए जिंदगी में बाढ़ के पानी की तरह दाखिल हो गया है. बाढ़ का पानी जिसके आने की सूचना तो सबको होती है, लेकिन लोग उसे जानते हुए भी अनदेखा किए रहते हैं. मानकर चलते हैं, अरे! यहां तक इस बार नहीं आएगा.

डियर जिंदगी: कौन है जो अच्‍छाई को चलन से बाहर कर रहा है…

अर्थशास्‍त्र का एक प्रसिद्ध और लोकप्रिय नियम है. बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है. इसका सरल अर्थ है, हमारे पास अच्‍छे नोट भी होते हैं, लेकिन हम उन्‍हें अपने पास सहेजने के चक्‍कर में असल में बाजार से ही गायब कर देते हैं. इसलिए बाजार में अक्‍सर हमें मैले-कुचैले और काफी हद तक गंदे कहे जा सकने वाले नोट मिलते हैं.

विशेषज्ञों का तो यहां तक कहना है कि नोट उन सबसे अधिक गंदी, संक्रमित चीजों में से है, जिसके संपर्क में आने के बाद आपको हाथ धोने की सहज जरूरत महसूस नहीं होती, लेकिन ऐसा करना सेहत के लिए बुरा नहीं है.

फि‍लहाल अर्थशास्‍त्र के नियम की जिंदगी के कॉलम में चर्चा इसलिए हो रही है, क्‍योंकि ग्रेशम का दिया यह नियम अर्थशास्‍त्र की हदों को पार करते हुए जिंदगी में बाढ़ के पानी की तरह दाखिल हो गया है. बाढ़ का पानी जिसके आने की सूचना तो सबको होती है, लेकिन लोग उसे जानते हुए भी अनदेखा किए रहते हैं. मानकर चलते हैं, अरे! यहां तक इस बार नहीं आएगा.

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हम सब जिंदगी को बुरे अनुभवों, हादसों, अपवादों पर आधारित अनुभवों के आधार पर चलाने में जुट गए हैं. यह काफी हद तक बुरी मुद्रा के अच्‍छी मुद्रा को चलन से बाहर करने जैसा ही है. हमने खराब चीजों, अनुभवों को पैमाना बना लिया है.

मिसाल के लिए शर्माजी से पड़ोसी तिवारीजी के बड़े अच्‍छे संबंध थे. दोनों परिवार के बीच घोर पारिवारिक संबंध थे. संकट के साथी थे. दोनों ने न जाने कितनी बार एक-दूसरे की मदद ‘आउट ऑफ टर्न’ जाकर की. एक दिन किसी बात पर शर्माजी इस कदर नाराज हुए कि तिवारीजी के बड़े हो चुके बेटे जो उनको छोटा ही लगता था, एक थप्‍पड़ एक चपत लगा दी. जो वह बचपन में भी कर देते थे. लेकिन तिवारीजी का बेटा बड़ा हो चुका था, उसे इस बात का इतना बुरा लगा कि दोनों परिवार के दशकों के संबंध उस छोटी-सी घटना से तबाह हो गए. 

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कई बरस बाद शर्माजी और तिवारीजी एक शादी में मिले, परिवार से दूर. तब जाकर कुछ बर्फ पिघली. दोनों खूब रोए. मन हल्‍का हुआ. इस संतोष के साथ विदा हुए कि ‘जी’ हल्‍का हो गया, काश! साथ जिंदगी की बही नदी में आए छोटे तूफान को ठीक से संभाला गया होता. काश! ऐसा हुआ होता.

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जीवन में जैसे-जैसे तनाव का दायरा बढ़़ता जा रहा है, उसे संभालने की क्षमता न्‍यूनतम की ओर बढ़ती जा रही है. हम तनाव, संकट को स्‍नेह, प्रेम और आत्‍मीयता के साथ संभालने की क्षमता खोते जा रहे हैं. इससे हम जिंदगी को उन अनुभवों, हादसों की आंच में झोकते जा रहे हैं, जो जीवन का स्‍थाई भाव नहीं हैं. वह किसी तरह अनजाने में, दुर्घटनावश ही सही जीवन में शामिल हो गए. उन्‍हें जिंदगी में प्रेम, विश्‍वास और भरोस से रिप्‍लेस नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन हम निरंतर ऐसा करने की ओर बढ़ रहे हैं. जो जीवन को तनाव, डिप्रेशन और आत्‍महत्‍या की ओर धकेलने का काम कर रहे हैं.

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इसलिए किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले जीवन की इस शिक्षा, अनुभव की ओर देखिए जो आपके साथ हमेशा हैं, जिनकी छांव में आप पले-बढ़ें हैं, न कि उनकी ओर जिनकी धूप से आप बेचैन, परेशान रहे हैं.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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