डियर जिंदगी : किनारे कब छूटेंगे..

आत्‍मा और एकांत (ग्‍लैमर के शोर से दूर किया गया चुनाव) से किए गए निर्णय मनुष्‍य के उस राह पर आगे बढ़ने के प्रस्‍थान बिंदु हैं, जहां वह जाना चाहता है. इसलिए अपने निर्णय हमें खुद करने होंगे.

Dayashankar Mishra दयाशंकर मिश्र | Updated: Nov 7, 2017, 02:40 PM IST
डियर जिंदगी : किनारे कब छूटेंगे..

असल में, जिंदगी में संयोग जैसी कोई चीज होती ही नहीं है. अगर कुछ होता है, तो वह है साहस! दुनिया के वह सभी नाम जिनके साथ महानता, नवीनता और कुछ नया करने जैसे काम जुड़े हैं, उनके साथ सबसे बड़ा शब्‍द साहस ही रहा है. पहली नजर में हम अक्‍सर इसे ठीक से पहचान नहीं पाते. हम प्रतिभाशाली, परिश्रमी और कथित 'तेज दिमाग' जैसी चीजों से कहीं अधिक प्रभावित होते हैं. जबकि हमें जो हासिल करना है, जो हम हासिल कर पाते हैं, उसमें सबसे बड़ा तत्‍व साहस होता है.

मेरे एक मित्र इंजीनियर बनना चाहते थे. वह एक डॉक्‍टर परिवार से हैं. परिवार उनको डॉक्‍टर हीबनाना चाहता था, वह मना नहीं कर सके. इसलिए उनकी चाहत के साथ 'थे' चस्‍पा हो गया. वह अपने पिता को नहीं मना सके. इसलिए डॉक्‍टर बनने चल दिए. यह बात अलग है कि वहां मन कभी लगा ही नहीं और आखिर में एक ऐसे पेशे से जुड़े, जो उनकी चाहतों से दूर -दूर तक कोई वास्‍ता नहीं रखता था.

आज संपन्‍नता की छाया तले भी वह जीवन से असंतुष्‍ट हैं. उनके स्‍वभाव में खिन्‍नता का स्‍थायीभाव आ गया है. नाराजगी बढ़ गई, अपने आप से. किसी और से नहीं. वह अब तक अतीत की गलियों में भटक रहे हैं. दुख को अपने गले में मफलर की तरह टांगे घूम रहे हैं. मेरे मित्र भले पिता और परिवार को दोषी ठहराते रहें, लेकिन मेरी नजर में असल दोषी कोई और नहीं वह खुद हैं.

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स्‍वयं से नाराजगी सबसे ज्‍यादा खतरनाक है. दूसरे से नाराजगी तो आसानी से जाहिर हो जाती है, लेकिन अपने प्रति रूठा मन, आत्‍मा तक को दूषि‍त कर देता है. इसकी छाया सुख के प्रकाश में सबसे बड़ी बाधा है.

मेरे इन मित्र जैसे आपके भी मित्र हो सकते हैं. होते ही हैं. लेकिन सच पूछिए तो मुझे ऐसे लोगों से कभी हमदर्दी नहीं होती. क्‍योंकि जिसमें साहस नहीं, अगर वह सही रास्‍ते पर निकला भी तो कोई गारंटी नहीं कि सफर पर रहे ही. मंजिल तक पहुंचे ही. और इसके साथ यह भी ध्‍यान रहे कि जिसे अपने सपनों पर भरोसा नहीं होता. उसके सपनों पर दुनिया कैसे भरोसा करेगी.

'अलकेमिस्‍ट' के लिए लोकप्रिय पाउलो कोएलो से लेकर सचिन तेंदुलकर और महेंद्र सिंह धोनी तक ने जो कुछ हासिल किया, उसमें उनके गुणों से अधिक योगदान उस साहस का है, जो उनने उस रास्‍ते को चुनते हुए, उस पर टिके रहकर दिखाया, जिस पर जाने के पक्ष में उनके साथ आरंभ में कोई नहीं था.

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आत्‍मा और एकांत (ग्‍लैमर के शोर से दूर किया गया चुनाव) से किए गए निर्णय मनुष्‍य के उस राह पर आगे बढ़ने के प्रस्‍थान बिंदु हैं, जहां वह जाना चाहता है. इसलिए अपने निर्णय हमें खुद करने होंगे. भले ही उनका आज कितना ही विरोध क्‍यों न हो, लेकिन अगर वह हमारे मिजाज, सपनों की धुरी पर बुने गए हैं तो उन रास्‍तों को देर सबेर मंजिल मिल ही जाएगी. जो जितनी आसानी से मिल जाती है, उस मंजिल की कीमत उतनी ही कम होती है.

बिना पर्वतों पर गए, दुर्गम जंगलों से गुजरे कोई भी पर्वतारोही नहीं बन सकता. इसलिए जीवन में खतरों के प्रति हमेशा समर्पित रहें. उनके लिए खुद को तैयार करते रहें. किनारों पर बैठकर केवल नाव गिनी जा सकती है, समंदर नहीं.

इसलिए, अपने निर्णय खुद करना सीखें. हो सकता है, कुछ गलत हों. सारे गलत हों, लेकिन यह फि‍र भी कुछ निर्णय न कर पाने से तो बेहतर ही होगा. इससे जिंदगी में आप कम से कम खुद से कभी नाराज नहीं रहेंगे. जिंदगी में हमेशा इस संतोष के साथ जिएंगे, 'जो चाहा, वह किया. जैसा चाहा, वैसा जिया.' यह जीवन में हासिल होने वाले सबसे बड़े सुखों में से एक होगा. यह कभी आपको खुद से नाराज नहीं रहने देगा.

कोशिश, में जो कशिश और संतोष है, उसके लिए पूरी जिंदगी दांव पर लगाई जा सकती है. यकीन रखें, यह दांव कभी खाली नहीं जाता.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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