दरबार मूव : परंपरा की आड़ में बेड़ा गर्क

करीब डेढ़ सौ साल पुरानी डोगरा परंपरा (दरबार मूव) को बरकरार रखते हए जम्मू एवं कश्मीर सरकार एक बार फिर जम्मू में अपना कामकाज बंद कर अगले छह महीने के लिए श्रीनगर शिफ्ट हो गई है। राज्यपाल, मुख्यमंत्री, उनके मंत्रिमंडल, शीर्ष नौकरशाहों और पुलिसकर्मियों सहित राज्य के शीर्ष कार्यालयों की शिफ्टिंग की यह प्रक्रिया डोगरा महाराज द्वारा 1872 में तब की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए शुरू की गई थी। बड़ा सवाल यह कि आज की परिस्थिति में सरकार इस परंपरा को क्यों ढो रही है?

आज अगर इस परंपरा को बंद कर दिया जाए तो हर साल खर्च होने वाले करीब 300 करोड़ रुपए अन्य विकास कार्यों पर खर्च किए जा सकते हैं। साथ ही एक जगह स्थायी सचिवालय बनने से जम्मू और श्रीनगर के लोग परेशानी से भी बच सकेंगे। शासन में पारदर्शिता और आपसी भाईचारी व सौहार्द के साथ-साथ राज्य की प्राकृतिक एवं भौगोलिक परिस्थितियों के चलते 1872 में डोगरा महाराज के शासनकाल में दरबार मूव (डोगरा परंपरा) को शुरू किया गया था। यह उस जमाने की बात थी लेकिन अब तो ई-गवर्नेंस का जमाना है। हर रिकार्ड एक क्लिक पर सामने आ जाता है। वातानुकूलित विधानसभा और कार्यालय में बैठकर सरकार काम करती है। सूचना एवं प्रौद्योगिकी के इस युग में राजधानियों को स्थानांतरित करने की दरबार मूव परंपरा बिल्कुल बेतुकी लगती है और मौज मस्ती का जरिया भी।

नजर दौराएं तो आप पाएंगे कि जम्मू कश्मीर देश का अकेला ऐसा राज्य है जिसका सचिवालय छह महीने श्रीनगर और छह महीने जम्मू से काम करता है। इसके साथ ही हाईकोर्ट सहित अन्य विभाग शीतकाल में जम्मू शिफ्ट किए जाते हैं। हर साल अप्रैल माह के आखिरी सप्ताह में इसे छह महीने के लिए श्रीनगर शिफ्ट कर दिया जाता है। डोगरा महाराजा के शासनकाल में राजकाज की शिफ्टिंग का काम बैल गाड़ी और घोड़ा गाड़ी से होता था। उस समय दोनों जगह महाराजा का दरबार शिफ्ट होने के बाद एक बड़ा समारोह आयोजित किया जाता था।

लेकिन तब की परंपरा को बरकरार रखते हुए आज भी सचिवालय सहित अन्य प्रमुख कार्यालयों में कार्य करने वाले करीब 8000 दरबार मूव कर्मचारियों को तमाम भत्तों के साथ शिफ्ट किया जाता है। ये कर्मचारी परिवार सहित आते हैं। करीब 75 हजार दैनिक वेतन भोगियों को जम्मू और श्रीनगर में अलग-अलग रखा जाता है। इस दौरान हुआ पूरा खर्च सरकार वहन करती है। पैंथर्स पार्टी के अध्यक्ष बलवंत सिंह मनकोटिया का मानना है कि सरकारों में सियासी इच्छाशक्ति की कमी से 3000 करोड़ी की भारी भरकम राशि के दुरुपयोग को नहीं रोका जा रहा है। जम्मू में भी सचिवालय समेत अन्य ढांचा मौजूद है और श्रीनगर में भी। दोनों जगह 12 महीने सचिवालय काम करने चाहिए। इससे 300 करोड़ की बर्बादी तो रुकेगी ही, साथ ही इससे हजारों दैनिक वेतनभोगियों को नियमित किया जा सकेगा।

बहरहाल, जम्मू कश्मीर में भाजपा और पीडीपी की गठबंधन की सरकार है। प्रदेश के विकास को लेकर मिले जनादेश का सम्मान करते हुए मुफ्ती सरकार को इस दिशा में सोचना चाहिए कि आखिर हर साल 300 करोड़ रुपए की फिजूलखर्ची क्यों की जाए। इस बड़ी धनराशि को हर साल बचाकर बुनियादी सुविधाओं से वंचित सूबे की जनता के हित में खर्च किया जाए तो सरकार अपना धर्म भी पूरा कर सकेगी और भारतीय संविधान का सम्मान भी।