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ब्रज की गलियों में भक्ति-प्रेम के साथ व्यंग्य और हास्य की फुहार 'गली तमाशे वाली'

व्यंग्यकार ने लिखा है तो व्यंग्य की उम्मीद तो रहती है. अर्चना ने हास्य मिश्रित व्यंग्य का इस्तेमाल तो किया है पर व्यंग्य कम रहा, कई जगहों पर आते आते रह गया ..कहानी की कसावट भी थोड़ी कम रही. 

ब्रज की गलियों में भक्ति-प्रेम के साथ व्यंग्य और हास्य की फुहार 'गली तमाशे वाली'
भावना प्रकाशन से प्रकाशित 'गली तमाशे वाली' व्यंगकार अर्चना चतुर्वेदी का पहला पहला उपन्यास है.

यूं तो पूरा ही ब्रज देश ही नहीं दुनिया में एक धार्मिक स्थल के तौर पर जाना जाता है. हर महीने लाखों श्रद्धालु ब्रज की गलियों में अपने इष्ट को खोजते, उनकी पूजा-अर्चना करते मिल जाएंगे. कृष्ण की जन्मस्थली के साथ-साथ ब्रज की बोली भी लोगों को बहुत प्रिय है और ब्रज साहित्य का तो हिंदी साहित्य जगत में अलग ही स्थान है. महान कवि रसखान ने ब्रज की गलियों का वर्णन कुछ इस तरह किया है, 'मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गांव के ग्वारन.' 

कहते हैं कि ब्रज के हर गांव, हर गली में प्रेम और भक्ति का रंग बिखरा हुआ है. लेकिन इससे इतर ब्रज की एक गली इन दिनों चर्चा में है और वह है 'गली तमाशे वाली.' भावना प्रकाशन से प्रकाशित 'गली तमाशे वाली' व्यंगकार अर्चना चतुर्वेदी का पहला पहला उपन्यास है. अर्चना ने अपने इस उपन्यास में मथुरा शहर के तीस साल पहले के जीवन को दर्शाने का एक सुंदर प्रयास किया है. इस उपन्यास का सबसे मजबूत तथ्य है इसकी सधी हुई सहज भाषा. लेखिका ने बृज भाषा और खड़ी बोली के बीच एक अलग ही सहज भाषा में उपन्यास को लिखा है, जिसे समझने में पाठक को कोई मेहनत नहीं करनी पड़ेगी. 

उपन्यास के पन्ने दर पन्ने पलटते हुए आपके सामने ब्रज की गलियों का रेखाचित्र आपके सामने खिंचता चला जाएगा. इस उपन्यास के पात्र स्वाभाविक कलेवर में रह कर अभिव्यक्त हो रहे हैं. उपन्यास की घटनाएं, पात्रों के बीच के संवाद और आस-पास का माहौल बहुत ही जीवंत महसूस होता है. अर्चना चतर्वेदी को लोग व्यंग्यकार के रूप में पहचानते हैं. अपने आस-पास के परिवेश से ही पात्रों को उठा सहज भाषा में विसंगतियों पर चोट करना लेखिका को अलग पहचान देता है. 

कुछ प्रसंग तो बहुत ही करीने से उठाये गए हैं. जैसे- ‘अस्सी के दशक में जैसे शहर होते थे वैसा ही मथुरा भी था ऐसा कतई नहीं कहा जा सकता. मथुरा असल में वो शहर है जिसे तीनों लोकों से न्यारा कहा जाता है, कारण यहां के वाशिंदे जो अपनी हरकतों और आदतों की वजह से आसमान के सबसे चमकते सितारे की तरह अपनी अद्भुत चमक से दूर तक रौशनी बिखरते हैं.'

एक मिडिल क्लास परिवार की क्या क्या मजबूरियां क्या क्या मुसीबतें होती हैं ये बहुत ही संजीदगी से उठाया गया है. लेखक का किसी भी चरित्र को गढ़ने का अंदाज बहुत ही निराला है जैसे- “पाव भर के शरीर में करंट सीधा 440 वोल्ट का आता है दूसरों को हिलाने से पहले खुद ही हिल जाते हैं ...देखकर लगता है मानो “हाथ पांव कीर्तन कर रहे हैं और मुहं पंजीरी मांग रहा है’ पर जुबान ऐसी कि बड़े-बड़े युद्ध को न्योता दे आयें. वो जुबानी झगड़ा करने में विश्वास करते हैं.'

मथुरा की गलियों में किस तरह लोग एक दूसरे के साथ छेड़खानी कर अपना मनोरंजन करते थे. लोगों के माध्यम से उस वक्त के त्योहार और सामाजिक, राजनैतिक हालातों पर भी लेखक की पैनी नजर है. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद के हालात लेखक ने बहुत ही संजीदगी से दिखाए हैं. 

“अगले ही दिन से पूरे शहर में कर्फ्यू लग चुका था. दो-तीन दिन के अंदर ही लोगों को सब्जी और अन्य सामान की दिक्कत होने लगी. गली के कुछ मर्द इकट्ठे होकर गलियों के रास्ते निकल कर पल्लीपार यानी यमुना पार गए, वहां पर कर्फ्यू का असर नहीं था,  वहां से ढेर सारी सब्जियां खरीद कर ले आये जो गली के सब लोगों ने खरीद ली. गयाप्रसाद जी की आटा चक्की थी. अब लोगों के घर आटा भी खत्म हो रहा था. जिस जिस के पास गेहू रखे थे वो उन्हें पीसने को बोल रहे थे लेकिन कर्फ्यू के हालत में दुकान कैसे खुलती? तब कैलाश ने कहा कि रात को कर्फ्यू में थोड़ी ढील होगी तब कोशिश करेंगे. कैलाश और पप्पू ने उस रात दुकान अंदर से बंद करके रात भर गेहूं पीसा और सुबह सबको आटा मिला.”

उस वक्त बिजली की कमी थी और गर्मियों में लोग छतों पर सोते थे. इस सीन को भी सुंदर ढंग से पेश किया है - “बेटा अभी छत गरम होयगी जे बाल्टी भरी है ले जाओ नैक छत छिड़क दो ..फिर मैं आके गद्दा बिछा दूंगी....गुड्डो बेटी तू नैक खूंजो (सुराही) भर के रख ले पानी ठंडो है जायगो. और सब बहन-भैया आके ब्यारु कर लो बत्ती कौ भरोसो ना है फिर कुप्पी की रौशनी में खाने में मछर कुच्हर गिरेंगे.”

व्यंग्यकार ने लिखा है तो व्यंग्य की उम्मीद तो रहती है. अर्चना ने हास्य मिश्रित व्यंग्य का इस्तेमाल तो किया है पर व्यंग्य कम रहा, कई जगहों पर आते आते रह गया ..कहानी की कसावट भी थोड़ी कम रही. फिर भी बहुत दिनों बाद ब्रज भाषा में लिखा यह उपन्यास सहज ही पाठक को आकर्षित करेगा.